आभा सिन्हा, पटना I
भारतीय संस्कृति में नवरात्र केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं है, बल्कि आत्मशुद्धि, संयम, साधना और शक्ति जागरण का महापर्व है। वर्ष में दो बार आने वाला यह नौ दिवसीय अनुष्ठान मनुष्य को अपने भीतर की ऊर्जा, श्रद्धा और भक्ति को जागृत करने का अवसर देता है।
नवरात्र के प्रत्येक दिन देवी के एक विशेष स्वरूप की पूजा की जाती है, जो जीवन के अलग-अलग आयामों का प्रतिनिधित्व करता है। पहले तीन दिनों में शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी और चंद्रघंटा की उपासना के बाद चौथे दिन साधक प्रवेश करता है एक अत्यंत महत्वपूर्ण चरण में, वह है माँ कूष्मांडा की आराधना।
नवरात्र के चौथे दिन पूजित माँ कूष्मांडा को सृष्टि की आदिशक्ति माना जाता है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, जब ब्रह्मांड का कोई अस्तित्व नहीं था और चारों ओर केवल अंधकार था, तब माँ ने अपनी मंद मुस्कान (ईषत् हास्य) से ब्रह्मांड की रचना की। इसी कारण उनका नाम पड़ा कूष्मांडा यानि ‘कु’ (थोड़ा), ‘उष्मा’ (ऊर्जा), ‘अंड’ (ब्रह्मांड) अर्थात, जिसने अपनी सूक्ष्म ऊर्जा से ब्रह्मांड की उत्पत्ति की।
माँ कूष्मांडा को एकमात्र ऐसी देवी माना जाता है जिनका निवास सूर्यमंडल के भीतर है। उनका तेज इतना प्रखर है कि सूर्य भी उसी से प्रकाशित होता है। उनका स्वरूप सूर्य के समान तेजस्वी है। उनके प्रभाव से दसों दिशाएं आलोकित रहती हैं। समस्त प्राणियों में ऊर्जा और जीवन शक्ति उन्हीं से आती है। यह मान्यता दर्शाती है कि माँ केवल धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि कॉस्मिक एनर्जी (ब्रह्मांडीय शक्ति) की प्रतीक हैं।
माँ कूष्मांडा को अष्टभुजा देवी भी कहा जाता है क्योंकि उनके आठ हाथ होते हैं। उनके हाथ में है कमंडल, धनुष, बाण, कमल पुष्प, अमृतपूर्ण कलश, चक्र, गदा और जपमाला। जपमाला विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सिद्धि और ध्यान का प्रतीक है। उनका वाहन है सिंह (शक्ति और साहस का प्रतीक) और प्रिय भोग कुम्हड़ा (कुष्मांड)। भारतीय संस्कृति में कुम्हड़े को “कुष्मांड” कहा जाता है, इसलिए देवी का नाम भी इससे जुड़ा हुआ है।
नवरात्र के चौथे दिन साधक का ध्यान अनाहत चक्र (हृदय चक्र) पर केंद्रित होता है। अनाहत चक्र के गुण है प्रेम, करुणा, संतुलन, भावनात्मक शुद्धता। माँ कूष्मांडा की साधना से साधक के भीतर सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है। मानसिक शांति आती है।आत्मिक जागरण होता है।
माँ कूष्मांडा की पूजा स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करने के बाद पूजा स्थान को शुद्ध कर देवी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करना चाहिए। मां को पुष्प (विशेषकर लाल), धूप, दीप, कुम्हड़ा (भोग), फल और मिठाई, गंगाजल अर्पित करना चाहिए। दीप प्रज्वलित कर, देवी का ध्यान करने के बाद मंत्रों का जप कर, भोग अर्पित करना चाहिए, इसके बाद आरती।
माँ कूष्मांडा का मुख्य मंत्र है “या देवी सर्वभूतेषु माँ कूष्माण्डा रूपेण संस्थिता”। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥ शुभदायक मंत्र है सुरासम्पूर्ण कलशं रुधिराप्लुतमेव च। दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे॥ पूजा मंत्र है “ॐ कूष्माण्डायै नमः” ध्यान मंत्र है “वन्दे वांछित कामार्थे चन्द्रार्घकृत शेखराम्। सिंहरूढ़ा अष्टभुजा कूष्माण्डा यशस्वनीम्॥”
नवरात्र के दौरान साधक को सात्विक जीवन अपनाना चाहिए। दूध, फल, गंगाजल, नींबू पानी का सेवन करना चाहिए और तामसिक भोजन, लहसुन-प्याज, क्रोध और नकारात्मक विचार से परहेज करना चाहिए। जो भक्त श्रद्धा और शुद्ध मन से माँ की पूजा करता है, उसे रोगों से मुक्ति, आयु में वृद्धि, यश और सम्मान, मानसिक शांति, समृद्धि और सफलता मिलती है। माँ अत्यंत सरलता से प्रसन्न होने वाली देवी हैं। थोड़ी सी भक्ति से भी वे भक्तों को आशीर्वाद देती हैं।
माँ कूष्मांडा का स्वरूप केवल धार्मिक नहीं है, बल्कि गहरे वैज्ञानिक अर्थ भी समेटे हुए है। ब्रह्मांड की उत्पत्ति (Big Bang जैसी अवधारणा), ऊर्जा का स्रोत, प्रकाश और जीवन का आधार दर्शाता है कि भारतीय ऋषियों ने हजारों वर्ष पहले ही कॉस्मिक ऊर्जा को देवी स्वरूप में समझ लिया था।
नवरात्र का चौथा दिन माँ कूष्मांडा पूजा यह संदेश देता है कि जीवन में चाहे कितना भी अंधकार क्यों न हो, एक छोटी सी सकारात्मक ऊर्जा उसे प्रकाश में बदल सकती है। माँ कूष्मांडा केवल एक देवी नहीं है, बल्कि सृजन की शक्ति, ऊर्जा का स्रोत और जीवन का आधार हैं। उनकी आराधना से न केवल भौतिक सुख मिलते हैं, बल्कि आत्मिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति भी प्राप्त होती है।
