पारसी लोगों का 21 मार्च को “अंतरराष्ट्रीय नवरोज दिवस”

Jitendra Kumar Sinha
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मानव सभ्यता में कुछ त्योहार ऐसे होते हैं जो केवल तिथियों का परिवर्तन नहीं होता है, बल्कि जीवन की दिशा बदलने का संदेश देता है। “नवरोज” ऐसा ही एक पर्व है, जो केवल पारसी समुदाय का नव वर्ष नहीं है बल्कि प्रकृति, पुनर्जन्म और सकारात्मकता का उत्सव है। “नवरोज” का अर्थ होता है ‘नया दिन’, और इसी भावना के साथ यह पर्व नई शुरुआत, नई ऊर्जा और नई उम्मीदों का प्रतीक बनकर सामने आता है। यह पर्व बसंत ऋतु के आगमन के साथ मनाया जाता है, जब प्रकृति स्वयं नवजीवन का अनुभव करती है। पेड़ों पर नई पत्तियां आती हैं, फूल खिलते हैं और वातावरण में ताजगी भर जाती है। यही कारण है कि ‘नवरोज’ को प्रकृति और मानव जीवन के बीच गहरे संबंध का प्रतीक माना जाता है।

‘नवरोज’ का संबंध पारसी धर्म से है, जिसकी स्थापना महान पैगंबर जरथुस्त्र ने की थी। यह धर्म लगभग 3000 वर्ष पुराना है और इसे दुनिया के सबसे प्राचीन एकेश्वरवादी धर्मों में गिना जाता है। पारसी धर्म का मूल आधार अच्छाई और बुराई के बीच संघर्ष है, जिसमें अंततः अच्छाई की विजय होती है। इस धर्म के अनुयायी “अहुरा  मज्दा” को सर्वोच्च ईश्वर मानते हैं। पारसी धर्म का पवित्र ग्रंथ अवेस्ता है, जिसमें धार्मिक शिक्षाएं, प्रार्थनाएं और जीवन के सिद्धांत वर्णित हैं। यह ग्रंथ मानव जीवन को सत्य, धर्म और नैतिकता के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। ‘नवरोज’ केवल धार्मिक पर्व नहीं है, बल्कि इसका ऐतिहासिक महत्व भी अत्यंत समृद्ध है। पारसी मान्यताओं के अनुसार, प्राचीन ईरान के महान राजा जमशेद ने संसार को एक बड़े प्रलय से बचाया था। उसी दिन उन्होंने सिंहासन संभाला और उसी दिन को “जमशेद-ए-नवरोज” कहा गया। यह दिन केवल सत्ता परिवर्तन का प्रतीक नहीं था, बल्कि मानव जीवन में एक नई शुरुआत का संकेत भी था। इसी कारण ‘नवरोज’ को “जमशेदी नवरोज” भी कहा जाता है।

नवरोज का समय वसंत ऋतु के आरंभ से जुड़ा हुआ है। यह वह समय होता है जब दिन और रात बराबर होते हैं (वसंत विषुव)। इस समय पृथ्वी पर संतुलन और सामंजस्य का वातावरण बनता है। प्रकृति के इस संतुलन को मानव जीवन में अपनाने का संदेश ‘नवरोज’ देता है। यह पर्व सिखाता है कि जीवन में संतुलन, सामंजस्य और सकारात्मकता बनाए रखना कितना आवश्यक है। नवरोज से पहले लोग अपने घरों की साफ-सफाई करते हैं। इसे केवल भौतिक सफाई नहीं, बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक शुद्धि का प्रतीक माना जाता है। घरों को फूलों, रंगीन वस्त्रों और सुंदर सजावट से सजाया जाता है। इस दिन लोग नए कपड़े पहनते हैं, जो नई शुरुआत और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है। पारसी धर्म में अग्नि को पवित्र माना जाता है। ‘नवरोज’ के दिन लोग अग्नि मंदिर जाते हैं और वहां चंदन की लकड़ी अर्पित करते हैं। यह शुद्धता और ईश्वर के प्रति आस्था का प्रतीक है।

‘नवरोज’ के अवसर पर “हफ्त-सीन” नामक एक विशेष टेबल सजाई जाती है, जिसमें सात वस्तुएं रखी जाती हैं, जिनके नाम फारसी भाषा के “स” अक्षर से शुरू होते हैं। इनमें शामिल हैं सेब (स्वास्थ्य का प्रतीक), सौंफ (पवित्रता), सरसों का तेल (ऊर्जा), पानी (जीवन), अखरोट (बुद्धिमत्ता), सोने की मछली (जीवन और गति), दही (समृद्धि)। यह टेबल जीवन के विभिन्न पहलुओं, स्वास्थ्य, समृद्धि, ज्ञान और संतुलन, का प्रतिनिधित्व करती है। पारसी कैलेंडर में 360 दिन होते हैं। शेष पांच दिनों को “गाथा” के रूप में मनाया जाता है। इन दिनों में लोग अपने पूर्वजों को याद करते हैं और उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करते हैं। यह परंपरा अपने अतीत से जुड़े रहने और अपने पूर्वजों के योगदान को सम्मान देने की प्रेरणा देती है।

‘नवरोज’ से पहले बुधवार को लोग अलाव जलाते हैं और उसके ऊपर से कूदते हैं। यह परंपरा पिछले वर्ष की नकारात्मकता, दुख और समस्याओं को पीछे छोड़ने का प्रतीक है। यह एक प्रकार का शुद्धिकरण अनुष्ठान है, जिसमें व्यक्ति अपने जीवन से बुराइयों को दूर करने का संकल्प लेता है। ‘नवरोज’ के दिन पारसी परिवारों में विशेष व्यंजन बनाए जाते हैं। इसमें मीठे और नमकीन दोनों प्रकार के व्यंजन शामिल होते हैं। परिवार और मित्र एक साथ बैठकर भोजन करते हैं और खुशियां साझा करते हैं। यह सामाजिक एकता और प्रेम का प्रतीक है। भारत में पारसी समुदाय मुख्यतः भारत के पश्चिमी भागों में निवास करता है, विशेष रूप से मुंबई और गुजरात में। भारत में पारसी लोग “शहंशाही कैलेंडर” का पालन करते हैं, जिसके अनुसार ‘नवरोज’ अगस्त में मनाया जाता है। लेकिन कई पारसी मार्च में भी ‘नवरोज’ मनाते हैं। यह दोहरी परंपरा भारत की सांस्कृतिक विविधता को दर्शाती है।

नवरोज केवल पारसी समुदाय तक सीमित नहीं है। यह ईरान, मध्य एशिया, अफगानिस्तान, पाकिस्तान और अन्य कई देशों में बड़े उत्साह से मनाया जाता है। यह पर्व विभिन्न संस्कृतियों को जोड़ने का कार्य करता है और वैश्विक एकता का प्रतीक बन गया है। ‘नवरोज’ के महत्व को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र ने 21 मार्च को “अंतरराष्ट्रीय नवरोज दिवस” के रूप में मान्यता दी है। इसके साथ ही यूनेस्को ने इसे विश्व सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा घोषित किया है। यह दर्शाता है कि ‘नवरोज’ केवल एक धार्मिक त्योहार नहीं है, बल्कि मानव सभ्यता की साझा धरोहर है।

नवरोज को विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है, ‘नवरोज’, ‘नौरोज’, ‘जमशेदी नवरोज’, ‘पतेती’। इन सभी नामों के पीछे एक ही भावना है “नई शुरुआत और खुशहाली”। ‘नवरोज’ केवल उत्सव नहीं, बल्कि जीवन का दर्शन है। यह सिखाता है अतीत की गलतियों को भूलकर आगे बढ़ना। क्षमा करना और क्षमा मांगना। सकारात्मक सोच अपनाना और प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाना। आज के समय में जब दुनिया तनाव, संघर्ष और असंतुलन से जूझ रही है, ‘नवरोज’ का संदेश और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। यह पर्व एकजुटता, प्रेम और शांति का मार्ग दिखाता है। यह याद दिलाता है कि चाहे परिस्थितियां कैसी भी हो, नई शुरुआत हमेशा संभव है।



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