क्या रोजमर्रा की चीजें समय से पहले बूढ़ा बना रही हैं? - ‘फॉरएवर केमिकल’ का अदृश्य खतरा

Jitendra Kumar Sinha
0

 


आधुनिक जीवन ने हमें असंख्य सुविधाएं दी हैं। रसोई में नॉन-स्टिक बर्तन, खाने को सुरक्षित रखने वाले फूड पैकेट, पानी से बचाने वाले कपड़े, दाग-धब्बों से सुरक्षित फर्नीचर और न जाने कितनी ऐसी चीजें हैं जो हमारी जिन्दगी को आसान बनाती हैं। लेकिन इन सुविधाओं के पीछे एक ऐसा वैज्ञानिक सच छिपा है जो चिंताजनक है। हाल के वर्षों में वैज्ञानिकों ने पाया है कि इन आधुनिक उत्पादों में इस्तेमाल होने वाले कुछ रसायन मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। इन रसायनों को “फॉरएवर केमिकल” कहा जाता है, क्योंकि ये पर्यावरण और शरीर में लंबे समय तक बना रहता है और आसानी से खत्म नहीं होता है।

चीन के शंघाई जियाओ तोंग यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन के शोधकर्ताओं ने एक महत्वपूर्ण अध्ययन में पाया कि ये रसायन शरीर में प्रवेश करके कोशिकाओं और अंगों को समय से पहले बूढ़ा बना सकता है। खासतौर पर 50 वर्ष की उम्र के आसपास के पुरुषों में इसका असर अधिक देखा गया है। यह खोज केवल एक वैज्ञानिक अध्ययन नहीं है, बल्कि आधुनिक सभ्यता के सामने खड़े एक बड़े स्वास्थ्य संकट की चेतावनी भी है। सवाल यह है कि आखिर ये फॉरएवर केमिकल क्या हैं, ये हमारे शरीर में कैसे पहुंचते हैं, और हम इससे कैसे बच सकते हैं?

फॉरएवर केमिकल दरअसल पर- और पॉलीफ्लुओरोएल्काइल सब्सटेंस (PFAS) नामक रसायनों का एक बड़ा समूह है। वैज्ञानिकों के अनुसार, इनकी संख्या हजारों में है। इन रसायनों की खासियत यह है कि ये बहुत स्थिर (stable) होते हैं। पानी और तेल को दूर रखते हैं। गर्मी और रासायनिक प्रतिक्रियाओं के प्रति अत्यधिक प्रतिरोधी होते हैं और प्राकृतिक रूप से आसानी से टूटते नहीं है। इन्हीं गुणों के कारण उद्योगों में इनका व्यापक उपयोग किया जाता है।

इन रसायनों में कार्बन और फ्लोरीन के बीच बेहद मजबूत रासायनिक बंध होता है। यह बंध प्रकृति में मौजूद सबसे मजबूत रासायनिक बंधों में से एक माना जाता है। इस वजह से ये पर्यावरण में दशकों तक बने रहते हैं। मिट्टी, पानी और हवा में फैल सकते हैं। जीवित प्राणियों के शरीर में जमा हो सकते हैं। इसी कारण इन्हें “फॉरएवर केमिकल” यानि हमेशा बने रहने वाले रसायन कहा जाता है।

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि ये रसायन केवल प्रयोगशालाओं या उद्योगों तक सीमित नहीं हैं। बल्कि हमारे रोजमर्रा के जीवन में इस्तेमाल होने वाली कई वस्तुओं में मौजूद हैं। रसोई में इस्तेमाल होने वाले नॉन-स्टिक तवे और कड़ाहियां PFAS रसायनों से बने कोटिंग से तैयार किए जाते हैं। इसका फायदा यह है कि खाना चिपकता नहीं है। तेल कम लगता है। सफाई आसान होती है।
लेकिन यदि ये कोटिंग खराब हो जाए या अत्यधिक गर्म हो जाए तो रसायन भोजन में मिल सकता है।

फास्ट फूड और पैक्ड फूड में इस्तेमाल होने वाले पैकेट, जैसे पिज्जा बॉक्स, बर्गर रैपर, पॉपकॉर्न बैग, ग्रीस-प्रूफ पेपर में तेल और पानी को रोकने के लिए PFAS का उपयोग किया जाता है। रेनकोट, जैकेट, स्पोर्ट्सवियर और आउटडोर कपड़ों को पानी और दाग से बचाने के लिए भी इन रसायनों का इस्तेमाल किया जाता है। दाग-प्रतिरोधी कार्पेट और सोफे भी अक्सर इन रसायनों से ट्रीट किए जाते हैं। हवाई अड्डों और सैन्य ठिकानों पर इस्तेमाल होने वाले कुछ अग्निशमन फोम में भी PFAS पाया जाता है।

वैज्ञानिकों के अनुसार, फॉरएवर केमिकल कई रास्तों से मानव शरीर में प्रवेश कर सकता है। सबसे सामान्य तरीका है भोजन। फूड पैकेजिंग से रसायन खाने में मिल सकते हैं। दूषित पानी से उगाई गई फसलें भी इन्हें अवशोषित कर सकती हैं।  कई देशों में जल स्रोतों में PFAS की मौजूदगी पाई गई है। यह रसायन औद्योगिक अपशिष्ट, फायरफाइटिंग फोम, प्लास्टिक कचरे से पानी में मिल सकता है। घर के अंदर की धूल में भी इन रसायनों के कण पाए जा सकते हैं। कुछ कॉस्मेटिक और कपड़ों के माध्यम से त्वचा के संपर्क में भी ये रसायन आ सकता है।

शंघाई जियाओ तोंग यूनिवर्सिटी के शोध में पाया गया कि फॉरएवर केमिकल शरीर की कोशिकाओं के डीएनए को प्रभावित कर सकता है। डीएनए हमारे शरीर का ब्लूप्रिंट होता है। यह तय करता है कि कोशिकाएं कैसे काम करेगी। जब PFAS शरीर में प्रवेश करता हैं तो वे कोशिकाओं में जमा हो सकता है। ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस बढ़ा सकता है। डीएनए की संरचना को नुकसान पहुंचा सकता है। इसका परिणाम होता है कि कोशिकाओं की मरम्मत क्षमता घट जाती है। अंगों की कार्यक्षमता कम होने लगती है। शरीर तेजी से बूढ़ा होने लगता है। इसे वैज्ञानिक भाषा में एक्सेलरेटेड एजिंग (accelerated aging) कहा जाता है।

शोध में पाया गया है कि पुरुषों पर इन रसायनों का प्रभाव महिलाओं की तुलना में अधिक हो सकता है। इसके पीछे कई कारण बताए गए हैं। पुरुषों और महिलाओं के हार्मोन अलग-अलग होते हैं।

PFAS रसायन हार्मोन प्रणाली को प्रभावित कर सकता है। पुरुषों का मेटाबॉलिज्म कुछ मामलों में अलग होता है, जिससे रसायनों का प्रभाव अलग तरीके से पड़ सकता है। कुछ अध्ययनों में पाया गया है कि ये रसायन पुरुषों के शरीर में लंबे समय तक जमा रह सकता है। वैज्ञानिकों ने पाया है कि लगभग 50 वर्ष की उम्र के आसपास पुरुषों में इन रसायनों का प्रभाव अधिक दिखाई देता है। इसकी वजहें हो सकती हैं हार्मोनल बदलाव, कोशिकाओं की मरम्मत क्षमता में कमी, लंबे समय तक रसायनों का जमा होना। जब ये सभी कारक मिलते हैं तो शरीर पर इसका असर तेज हो सकता है।

फॉरएवर केमिकल केवल उम्र बढ़ाने की प्रक्रिया को तेज नहीं करता है, बल्कि कई अन्य स्वास्थ्य समस्याओं से भी जुड़े पाए गए हैं। हृदय रोग- कुछ अध्ययनों में PFAS को दिल की बीमारियों से जोड़ा गया है। याददाश्त में कमी- मस्तिष्क की कोशिकाओं पर प्रभाव पड़ने से याददाश्त कमजोर हो सकती है। हार्मोनल असंतुलन- ये रसायन एंडोक्राइन सिस्टम को प्रभावित कर सकते हैं। प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर होना- इम्यून सिस्टम की कार्यक्षमता कम हो सकती है। कुछ कैंसर का खतरा- कुछ शोधों में PFAS को कैंसर के जोखिम से भी जोड़ा गया है।

फॉरएवर केमिकल केवल मानव स्वास्थ्य ही नहीं बल्कि पर्यावरण के लिए भी गंभीर खतरा है। ये मिट्टी में लंबे समय तक बने रहते हैं और फसलों में प्रवेश कर सकते हैं। नदियों और भूजल में इनकी मौजूदगी कई देशों में दर्ज की गई है। मछलियों और अन्य जीवों के शरीर में भी PFAS जमा हो सकता है।

पिछले कुछ वर्षों में कई देशों ने इन रसायनों को लेकर चिंता जताई है। यूरोप और अमेरिका में  PFAS पर नियंत्रण के लिए नियम बनाया जा रहा है। कुछ उत्पादों में इनके उपयोग पर प्रतिबंध लगाया गया है। वैज्ञानिकों का मानना है कि आने वाले समय में यह मुद्दा वैश्विक स्वास्थ्य संकट बन सकता है।

विशेषज्ञों के अनुसार, इन रसायनों से पूरी तरह बचना मुश्किल है क्योंकि ये पहले से ही पर्यावरण में फैल चुका है। लेकिन कुछ सावधानियां अपनाकर इनके प्रभाव को कम किया जा सकता है।

भारत में फॉरएवर केमिकल यानि PFAS (Per- and Polyfluoroalkyl Substances) का मुद्दा अभी शुरुआती चरण में चर्चा में आया है, लेकिन वैज्ञानिक शोध बताता है कि यह समस्या तेजी से बढ़ रही है। भारत में औद्योगिकीकरण, प्लास्टिक-आधारित उपभोक्ता वस्तुओं का बढ़ता उपयोग और कमजोर पर्यावरणीय निगरानी इस खतरे को और गंभीर बना सकता है।

भारत में PFAS प्रदूषण को लेकर किए गए कुछ वैज्ञानिक अध्ययनों ने चिंताजनक संकेत दिया है। एक अध्ययन में पाया गया है कि तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई के कई जल स्रोतों में PFAS रसायनों की मौजूदगी पाई गई। इनमें भूजल, झीलें और नदियां शामिल थी। कुछ नमूनों में PFAS की मात्रा 0.10 से 136.27 नैनोग्राम प्रति लीटर तक पाई गई है। ये रसायन अड्यार नदी, बकिंघम नहर और चेम्बरमबक्कम झील के पानी में भी मिला है।

एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार, कुछ स्थानों पर PFAS की मात्रा अमेरिकी पर्यावरण संरक्षण एजेंसी (EPA) के सुरक्षित स्तर से करीब 19,400 गुना अधिक पाई गई है, जिससे जल स्रोतों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल उठे हैं। सबसे बड़ी समस्या यह है कि सामान्य जल शोधन (water treatment) तकनीकें इन रसायनों को प्रभावी रूप से हटाने में सक्षम नहीं हैं।

भारत में कई उद्योग ऐसे हैं जहां PFAS आधारित रसायनों का इस्तेमाल होता है। इनमें प्रमुख हैं वस्त्र उद्योग (waterproof coating), चमड़ा उद्योग, कागज और पैकेजिंग उद्योग, धातु प्लेटिंग उद्योग, अग्निशमन फोम निर्माण। इन उद्योगों से निकलने वाला अपशिष्ट जल नदियों और भूजल में मिलकर PFAS प्रदूषण बढ़ा सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, खुले कचरा डंपिंग स्थल, औद्योगिक कचरा और बिना उपचार वाले सीवेज भी PFAS फैलने के बड़े स्रोत हैं।

एक और चिंता यह है कि कई देशों में PFAS पर कड़े नियम बनने के बाद कुछ कंपनियां उत्पादन इकाइयों को एशिया जैसे क्षेत्रों में स्थानांतरित कर रही हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार, यूरोप में बंद हुई PFAS उत्पादन इकाई की तकनीक और उपकरणों को महाराष्ट्र के लोटे औद्योगिक क्षेत्र में स्थानांतरित किया गया, जहां अब वही रसायन बनाए जा रहे हैं। पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि यदि भारत में नियम कमजोर रहे तो यह “पर्यावरणीय डंपिंग” का उदाहरण बन सकता है, जिसमें खतरनाक उद्योग कम नियम वाले देशों में स्थानांतरित हो जाते हैं।

भारत में PFAS को लेकर सबसे बड़ी समस्या यह है कि अभी तक इनके लिए व्यापक राष्ट्रीय नियम और निगरानी प्रणाली विकसित नहीं हुई है। कुछ प्रमुख समस्याएं है पीने के पानी में PFAS के लिए स्पष्ट राष्ट्रीय मानक सीमित हैं। नियमित निगरानी (monitoring) बहुत कम होती है। उद्योगों के अपशिष्ट पर विशेष नियंत्रण नहीं है। आम जनता में जागरूकता बहुत कम है। इसी कारण से कई विशेषज्ञ इसे भारत के लिए “उभरता हुआ पर्यावरणीय संकट” मानते हैं।

भारत में PFAS का संपर्क केवल पानी से नहीं है बल्कि कई उपभोक्ता उत्पादों से भी हो सकता है। उदाहरण के लिए नॉन-स्टिक बर्तन, फास्ट फूड पैकेजिंग, माइक्रोवेव पॉपकॉर्न बैग, दाग-प्रतिरोधी कपड़े, कॉस्मेटिक उत्पाद। इन उत्पादों के लगातार उपयोग से रसायन धीरे-धीरे शरीर में जमा हो सकता है। हालांकि समस्या बढ़ रही है, लेकिन भारत के वैज्ञानिक इसके समाधान पर भी काम कर रहे हैं।

हाल ही में भारत के वैज्ञानिकों ने PFAS को तोड़ने की एक नई तकनीक विकसित करने पर काम किया है। इस तकनीक में सूरज की रोशनी और सिल्वर नैनोक्लस्टर का उपयोग करके इन रसायनों के मजबूत कार्बन-फ्लोरीन बंध को तोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। यदि यह तकनीक सफल होती है तो भविष्य में जल शोधन संयंत्रों में इसका उपयोग किया जा सकता है।

यदि भारत में PFAS पर नियंत्रण नहीं किया गया तो आने वाले वर्षों में कई समस्याएं बढ़ सकती हैं। नदियों और भूजल में PFAS बढ़ने से पीने के पानी की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। मछलियों, फसलों और पशुओं के शरीर में PFAS जमा होकर भोजन के माध्यम से इंसानों तक पहुंच सकता है। इन रसायनों को कई बीमारियों से जोड़ा गया है, जैसे- कैंसर, हार्मोन असंतुलन, प्रजनन समस्याएं और प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर होना। वन्यजीवों और जलजीवों पर भी इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

विशेषज्ञों के अनुसार, भारत को इस समस्या से निपटने के लिए कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाने होंगे। PFAS के लिए राष्ट्रीय मानक और नियम बनाना होगा। जल स्रोतों की नियमित निगरानी करनी होगी। उद्योगों के अपशिष्ट पर कड़ा नियंत्रण रखना होगा। सुरक्षित जल शोधन तकनीकों का विकास करना होगा और जनता में जागरूकता बढ़ाना होगा।

फॉरएवर केमिकल का खतरा भारत में अभी पूरी तरह सामने नहीं आया है, लेकिन शुरुआती शोध संकेत दे रहा है कि यह समस्या धीरे-धीरे बढ़ रही है। जल स्रोतों में PFAS की मौजूदगी, औद्योगिक प्रदूषण और कमजोर नियमन भविष्य में इसे बड़ा स्वास्थ्य और पर्यावरण संकट बना सकता है। यदि समय रहते वैज्ञानिक शोध, सख्त नियम और जनजागरूकता पर ध्यान दिया जाए, तो इस खतरे को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।



एक टिप्पणी भेजें

0टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें (0)

#buttons=(Ok, Go it!) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Learn More
Ok, Go it!
To Top