रेगिस्तान का ‘मोतियों का शहर’ - “पालमायरा”

Jitendra Kumar Sinha
0

 


सीरिया के विशाल रेगिस्तानी इलाके में स्थित प्राचीन शहर पालमायरा दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण पुरातात्विक धरोहरों में से एक रहा है। यह शहर कभी रोमन साम्राज्य और पूर्वी सभ्यताओं के बीच व्यापार का प्रमुख केंद्र था। ऊँटों के कारवां यहां से गुजरते थे और इसी कारण इसे “रेगिस्तान का मोती” भी कहा जाता था। पालमायरा की स्थापत्य कला में रोमन, फारसी और स्थानीय सीरियाई संस्कृति का अद्भुत मिश्रण दिखाई देता है। इसी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व को देखते हुए वर्ष 1980 में इसे यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया। हालांकि 2011 के बाद सीरिया में शुरू हुए गृहयुद्ध ने इस प्राचीन नगर को गहरी क्षति पहुंचाई और 2013 में इसे खतरे में पड़ी विश्व धरोहरों की सूची में डाल दिया गया।


गृहयुद्ध से पहले पालमायरा एक महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल था। यहां की विशाल स्तंभों वाली सड़कें, भव्य मंदिर, रोमन थिएटर और शानदार स्मारक प्राचीन सभ्यता की झलक दिखाते थे। यह शहर दूसरी और तीसरी शताब्दी में अपनी चरम समृद्धि पर था। उस समय पालमायरा की प्रसिद्ध रानी जेनोबिया ने रोमन साम्राज्य को चुनौती देकर एक स्वतंत्र साम्राज्य स्थापित करने का प्रयास किया था। शहर में स्थित टेम्पल ऑफ बेल, टेम्पल ऑफ बैलशामिन, टेट्रापाइलॉन, रोमन थिएटर और ट्रायम्फल आर्क जैसे स्मारक उस समय की भव्य वास्तुकला और धार्मिक आस्था के प्रतीक थे। यही स्मारक बाद में युद्ध के दौरान विनाश का सबसे बड़ा शिकार बने।


2015 में आतंकवादी संगठन आईएसआईएस (ISIS) ने पालमायरा पर कब्जा कर लिया। इस संगठन ने न केवल शहर को सैन्य दृष्टि से उपयोग किया बल्कि प्राचीन स्मारकों को भी निशाना बनाया। आईएसआईएस ने कई ऐतिहासिक इमारतों को डायनामाइट से उड़ा दिया। इनमें प्रमुख रूप से टेम्पल ऑफ बेल, टेम्पल ऑफ बैलशामिन, ट्रायम्फल आर्क, टेट्रापाइलॉन स्मारक और रोमन थिएटर शामिल थे। इसके अलावा पालमायरा के संग्रहालय को भी लूट लिया गया। कई दुर्लभ मूर्तियां और कलाकृतियां काले बाजार में बेच दी गईं। इस विनाश को दुनिया ने “सांस्कृतिक नरसंहार” कहा, क्योंकि यह सिर्फ इमारतों का नहीं बल्कि मानव इतिहास की धरोहर का विनाश था।


2016 और 2017 में सीरियाई सेना ने रूस के सैन्य सहयोग से पालमायरा को आईएसआईएस से वापस हासिल कर लिया। रूसी हवाई हमलों ने आतंकवादियों की ताकत को कमजोर किया और अंततः शहर को मुक्त कराया गया। हालांकि उस समय तक कई ऐतिहासिक स्मारक बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुके थे। विशेषज्ञों के अनुसार शहर को लगभग 20 से 30 प्रतिशत तक गंभीर नुकसान पहुंचा, लेकिन अच्छी बात यह रही कि लगभग 70 प्रतिशत संरचनाएं अब भी पुनर्निर्माण योग्य बची हुई हैं।


पालमायरा के पुनर्निर्माण के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई पहलें शुरू की गई हैं। इनमें सबसे चर्चित पहल “न्यू पालमायरा प्रोजेक्ट” है। इस परियोजना के तहत आधुनिक तकनीक का उपयोग करते हुए स्मारकों के 3-डी मॉडल तैयार किए गए हैं। पुराने फोटो, उपग्रह चित्र और डिजिटल स्कैनिंग के आधार पर प्राचीन इमारतों की संरचना को फिर से समझा जा रहा है। इस परियोजना का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अगर मूल संरचनाएं नष्ट हो गई हैं तो भी उनकी सटीक प्रतिकृति तैयार की जा सके।


पालमायरा के सबसे प्रसिद्ध स्मारकों में से एक आर्क ऑफ ट्रायंफ था, जिसे आईएसआईएस ने नष्ट कर दिया था। बाद में रूसी और इतालवी विशेषज्ञों की मदद से इस स्मारक को आंशिक रूप से बहाल किया गया। डिजिटल तकनीक और ऐतिहासिक अभिलेखों की सहायता से इसके कई हिस्सों का पुनर्निर्माण किया गया। यह प्रयास दुनिया के लिए एक प्रतीक बन गया कि युद्ध के बावजूद इतिहास को पूरी तरह मिटाया नहीं जा सकता।


पालमायरा का पुनर्निर्माण शुरू हो चुका है, लेकिन इसके सामने कई बड़ी चुनौतियां हैं। सीरिया की राजनीतिक अस्थिरता, आर्थिक संसाधनों की कमी, सुरक्षा की स्थिति और पुरातात्विक संरक्षण की जटिल प्रक्रियाएं। इन सबके कारण पुनर्निर्माण की गति धीमी है। विशेषज्ञों का मानना है कि पालमायरा को पूरी तरह पुनर्जीवित करने में कई दशक लग सकते हैं।


पालमायरा आज सिर्फ एक पुरातात्विक स्थल नहीं है, बल्कि यह मानव सभ्यता की दृढ़ता का प्रतीक बन चुका है। युद्ध ने इसकी पहचान को मिटाने की कोशिश की, लेकिन अंतरराष्ट्रीय समुदाय और विशेषज्ञों के प्रयास इसे फिर से जीवित करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। यदि पुनर्निर्माण सफल होता है तो पालमायरा एक बार फिर दुनिया को यह संदेश देगा कि सभ्यता और संस्कृति को पूरी तरह नष्ट करना संभव नहीं है। इतिहास चाहे जितनी बार टूटे, वह फिर से खड़ा होने की क्षमता रखता है।



एक टिप्पणी भेजें

0टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें (0)

#buttons=(Ok, Go it!) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Learn More
Ok, Go it!
To Top