मजबूत स्केल्स वाला रहस्यमयी और दुर्लभ जीव है - “पैंगोलिन”

Jitendra Kumar Sinha
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पृथ्वी पर पाए जाने वाले जीव-जंतुओं की दुनिया बेहद अद्भुत और विविधतापूर्ण है। इसी दुनिया का एक अनोखा और रहस्यमयी जीव है “पैंगोलिन”। इसे आम बोलचाल में “स्केली एंटीटर” भी कहा जाता है, क्योंकि इसका भोजन मुख्य रूप से चींटियां और दीमक होते हैं। “पैंगोलिन” अपनी विशिष्ट शारीरिक बनावट और व्यवहार के कारण वैज्ञानिकों तथा प्रकृति प्रेमियों के लिए हमेशा आकर्षण का केंद्र रहा है। इस जीव की सबसे खास बात है इसका शरीर, जो मजबूत केराटिन से बने ओवरलैपिंग स्केल्स से ढका होता है। यही स्केल्स इसे शिकारियों से बचाने का प्राकृतिक कवच प्रदान करते हैं। दुनिया भर में “पैंगोलिन” की कुल आठ प्रजातियां पाई जाती हैं, जो एशिया और अफ्रीका के विभिन्न हिस्सों में निवास करती हैं।


“पैंगोलिन” का शरीर देखने में काफी अनोखा होता है। इसके पूरे शरीर पर बड़े और मजबूत स्केल्स होते हैं, जो केराटिन नामक पदार्थ से बने होते हैं। यही पदार्थ मनुष्यों के बाल और नाखूनों में भी पाया जाता है। इन स्केल्स की विशेषता यह है कि वे एक-दूसरे के ऊपर ओवरलैप होकर लगे रहते हैं, जिससे “पैंगोलिन” का शरीर एक मजबूत कवच जैसा बन जाता है। जब कोई शिकारी इस पर हमला करने की कोशिश करता है, तो “पैंगोलिन” तुरंत अपने शरीर को गोल आकार में समेट लेता है। इस स्थिति में उसके कठोर स्केल्स बाहर की ओर हो जाते हैं और शिकारी उसके नरम हिस्सों तक नहीं पहुंच पाते। “पैंगोलिन” के पास दांत नहीं होते हैं, जो इसे अन्य स्तनधारियों से अलग बनाता है। भोजन करने के लिए यह अपनी लंबी और बेहद चिपचिपी जीभ का उपयोग करता है। इसकी जीभ शरीर से भी लंबी हो सकती है, जिससे यह आसानी से चींटियों और दीमकों को पकड़ लेता है।


“पैंगोलिन” का मुख्य भोजन चींटियां और दीमक हैं। यही कारण है कि यह अधिकतर ऐसे क्षेत्रों में पाया जाता है जहां इन कीड़ों की भरपूर मात्रा होती है। यह अपने मजबूत पंजों से दीमक के टीले या चींटी के बिल को तोड़ता है और फिर अपनी लंबी जीभ को अंदर डालकर भोजन निकालता है। इसकी जीभ पर चिपचिपा पदार्थ होता है, जिससे बड़ी संख्या में कीड़े एक साथ चिपक जाते हैं। चूंकि इसके दांत नहीं होते हैं, इसलिए यह भोजन को चबाता नहीं है। बल्कि निगलने के बाद पेट में मौजूद मजबूत मांसपेशियां और छोटे पत्थर जैसे कण भोजन को पचाने में मदद करते हैं।


दुनिया में “पैंगोलिन” की कुल आठ प्रजातियां पाई जाती हैं। इनमें से चार एशिया में और चार अफ्रीका में रहती हैं। एशियाई प्रजातियां में इंडियन पैंगोलिन, फिलिपिनो पैंगोलिन, सुंडा पैंगोलिन और चाइनीज पैंगोलिन शामिल हैं ।  अफ्रीकी प्रजातियां में ब्लैक-बेलीड पैंगोलिन, वाइट-बेलीड पैंगोलिन, जायंट ग्राउंड पैंगोलिन और टेमिन्क्स पैंगोलिन शामिल हैं। इन प्रजातियों के आकार, रंग और आवास में थोड़ा अंतर होता है, लेकिन उनकी मूल विशेषताएं लगभग समान रहती हैं।


“पैंगोलिन” स्वभाव से बेहद शर्मीले और एकांतप्रिय जीव होते हैं। वे आमतौर पर अकेले रहते हैं और दिन के समय बिलों या पेड़ों की खोखलियों में छिपे रहते हैं। ये मुख्य रूप से रात्रिचर (Nocturnal) होते हैं, यानि रात में सक्रिय रहते हैं। अंधेरा होते ही ये भोजन की तलाश में बाहर निकलते हैं। इनकी छिपकर रहने की आदत के कारण वैज्ञानिकों के लिए इनके जीवन और व्यवहार का अध्ययन करना काफी कठिन होता है। यही वजह है कि इनकी वास्तविक संख्या और आबादी के बारे में सटीक जानकारी जुटाना भी चुनौतीपूर्ण है।


“पैंगोलिन” मुख्य रूप से ट्रॉपिकल जंगलों, घने वन क्षेत्रों और सवाना में पाए जाते हैं। एशिया में ये भारत, चीन, फिलीपींस, इंडोनेशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया के अन्य देशों में मिलते हैं। वहीं अफ्रीका में यह महाद्वीप के कई हिस्सों में फैले हुए हैं। इनका आवास ऐसा होता है जहां जमीन नरम हो और कीटों की भरपूर उपलब्धता हो। कई प्रजातियां जमीन के अंदर बिल बनाकर रहती हैं, जबकि कुछ पेड़ों पर रहने के लिए अनुकूलित होती हैं। “पैंगोलिन” दुनिया के सबसे अधिक तस्करी किए जाने वाले वन्य जीवों में से एक है। इसके स्केल्स और मांस की अवैध मांग के कारण इनकी संख्या तेजी से घट रही है। प्राकृतिक संतुलन बनाए रखने के लिए इन जीवों का संरक्षण बेहद जरूरी है। कई देशों में अब इनके शिकार और व्यापार पर सख्त प्रतिबंध लगाए गए हैं।


“पैंगोलिन” प्रकृति का एक अद्भुत और अनोखा जीव है, जिसकी बनावट और जीवनशैली इसे अन्य स्तनधारियों से अलग बनाती है। इसके मजबूत स्केल्स, लंबी जीभ और रात्रिचर व्यवहार इसे विशिष्ट बनाते हैं। हालांकि आज यह जीव कई खतरों का सामना कर रहा है। इसलिए जरूरी है कि हम इसके संरक्षण के प्रति जागरूक हों और प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र की इस महत्वपूर्ण कड़ी को बचाने में अपना योगदान दें।



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