मध्य एशिया और ईरान के इर्द-गिर्द युद्ध केवल क्षेत्रीय संकट नहीं हैं, बल्कि इसकी गूंज 140 करोड़ भारतीयों के जीवन में भी सुनाई दे रही है। खाड़ी देशों में अस्थिरता, होर्मुज जलडमरूमध्य पर खतरा, कच्चे तेल की कीमतों में उछाल, शेयर बाजार की गिरावट और प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा। यह सभी ऐसे पहलू हैं जिसका सीधा और परोक्ष असर भारत पर पड़ना तय है। इसी पृष्ठभूमि में वर्ष का पहला चंद्रग्रहण और ‘रक्तचंद्रिका’ (Blood Moon) भी एक प्रतीकात्मक संदर्भ बनकर उभरते हैं। आकाश में लालिमा और धरती पर अनिश्चितता।
मध्य एशिया और पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) लंबे समय से भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का केंद्र रहा है। ईरान, सऊदी अरब, इजराइल और अमेरिका जैसे शक्तिशाली देशों की रणनीतिक इस क्षेत्र को विशेष रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य, जहाँ से दुनिया के कुल समुद्री तेल परिवहन का बड़ा हिस्सा गुजरता है, वैश्विक अर्थव्यवस्था की जीवनरेखा है। यदि इस जलमार्ग अस्थायी रूप से भी बाधित किया तो इसके दूरगामी प्रभाव होंगे और भारत इससे अछूता नहीं रह सकता है।
होर्मुज जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी को जोड़ता है। भारत अपने कुल कच्चे तेल का लगभग 50% इसी मार्ग से आयात करता है। तेल की आपूर्ति बाधित होने पर कीमतों में तेज उछाल, पेट्रोल-डीजल महंगे होने से महंगाई में वृद्धि, परिवहन लागत बढ़ने से वस्तुओं के दाम बढ़ना और चालू खाते के घाटे (Current Account Deficit) में वृद्धि। भारत पहले भी तेल संकटों से गुजरा है, लेकिन आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था में झटका अधिक तीव्र और त्वरित होगा।
खाड़ी देशों विशेषकर यूएई, सऊदी अरब, कुवैत, कतर और ओमान में 80 लाख से अधिक भारतीय कार्यरत हैं। ये प्रवासी हर वर्ष अरबों डॉलर भारत भेजते हैं, जिससे भारत दुनिया का सबसे बड़ा रेमिटेंस प्राप्त करने वाला देश है। युद्ध के कारण रोजगार में अस्थिरता, निकासी अभियान की आवश्यकता, विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव और घरेलू बेरोजगारी में संभावित वृद्धि। यदि हालात बहुत बिगड़ता हैं, तो भारत को ‘ऑपरेशन राहत’ जैसे मिशन दोहराना पड़ सकता है।
हालिया घटनाओं के बाद बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज और एनएसई में भारी गिरावट देखी गई है। एक ही दिन में 1200 अंकों की गिरावट तक यह दर्शाती है कि निवेशक वैश्विक अनिश्चितता से चिंतित हैं। विदेशी निवेशकों की बिकवाली, रुपये पर दबाव, सोना और सुरक्षित निवेश साधनों की मांग में वृद्धि, आईटी और तेल आयात-निर्भर कंपनियों पर असर, अल्पकाल में अस्थिरता और दीर्घकाल में संरचनात्मक बदलाव संभव हैं।
भारत ने हाल के वर्षों में ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण किया गया है रूस, अमेरिका और अफ्रीका से आयात बढ़ाया है। सामरिक तेल भंडार (Strategic Petroleum Reserve) का उपयोग, नवीकरणीय ऊर्जा पर जोर, कूटनीतिक संतुलन बनाए रखना और प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा के लिए विशेष तंत्र। भारत की विदेश नीति ‘संतुलन’ पर आधारित है। ईरान और खाड़ी देशों दोनों से संबंध बनाए रखना उसकी प्राथमिकता है।
महंगाई दर में वृद्धि, विकास दर (GDP) पर दबाव, राजकोषीय घाटे में वृद्धि, ऊर्जा संक्रमण की रफ्तार तेज होना, यदि संकट लंबा चला तो भारत को वैकल्पिक ऊर्जा और घरेलू उत्पादन को और तेज करना होगा।
वर्ष का पहला चंद्रग्रहण और पूर्ण ग्रहण के दौरान चंद्रमा ‘रक्तचंद्रिका’ जैसा दिखाई दिया। जब पृथ्वी सूर्य और चंद्रमा के बीच आ जाती है और पृथ्वी का वायुमंडल लाल प्रकाश को चंद्रमा तक पहुंचाता है, तो चंद्रमा लालिमा लिए दिखता है। भारतीय परंपरा में ग्रहण का विशेष महत्व है- ध्यान, जप और आत्मचिंतन का समय माना जाता है।
इतिहास गवाह है कि चाहे वह प्रथम विश्व युद्ध हो, द्वितीय विश्व युद्ध या खाड़ी युद्ध, हर संघर्ष का वैश्विक प्रभाव हुआ है। युद्ध सीमाओं में नहीं बंधता है। ऊर्जा, व्यापार, मुद्रा और मनोविज्ञान, सब प्रभावित होता है।
भारत की अर्थव्यवस्था पहले से अधिक लचीली है। विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत है। लेकिन वैश्विक संकट में पूर्ण सुरक्षा संभव नहीं है। ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में प्रगति पर है। कूटनीतिक संतुलन बना हुआ है और घरेलू बाजार की मजबूती दिख रही है।
मध्य एशिया की जंग भले ही हजारों किलोमीटर दूर हो, लेकिन उसका प्रभाव भारत के घर-घर तक पहुंच सकता है। तेल की कीमतें, महंगाई, शेयर बाजार, प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा, हर मोर्चे पर सतर्कता आवश्यक है।
