दूषित पानी से बढ़ता खतरा - “गुलेन बारी सिंड्रोम”

Jitendra Kumar Sinha
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भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियाँ समय-समय पर बदलती रहती हैं। कभी संक्रामक रोग तो कभी जीवनशैली से जुड़ी बीमारियाँ लोगों के लिए चिंता का कारण बनती हैं। हाल के वर्षों में एक ऐसी ही गंभीर और तेजी से उभरती बीमारी है “गुलेन बारी सिंड्रोम” (Guillain-Barré Syndrome - GBS)। बिहार समेत देश के कई राज्यों में इसके मामलों में अचानक वृद्धि ने स्वास्थ्य विशेषज्ञों और प्रशासन को सतर्क कर दिया है। राजधानी पटना के प्रमुख अस्पतालों में हर महीने दर्जनों मरीज इस बीमारी से पीड़ित होकर पहुँच रहे हैं। यह बीमारी सीधे तौर पर दूषित पेयजल, अस्वच्छ भोजन और संक्रमण से जुड़ी हुई मानी जा रही है। विशेष रूप से कंपीलोबैक्टर जेजुनी (Campylobacter jejuni) नामक बैक्टीरिया को इसका प्रमुख कारण माना जा रहा है।


गुलेन बारी सिंड्रोम एक दुर्लभ लेकिन गंभीर न्यूरोलॉजिकल (तंत्रिका तंत्र से जुड़ी) बीमारी है, जिसमें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली (इम्यून सिस्टम) गलती से अपने ही नसों (नर्व्स) पर हमला करने लगती है। शरीर की सुरक्षा प्रणाली (इम्यून सिस्टम) आमतौर पर बैक्टीरिया और वायरस से लड़ती है। लेकिन GBS में यही सिस्टम नसों की बाहरी परत (मायलिन शीथ) को नुकसान पहुँचाता है। इससे मांसपेशियों में कमजोरी और लकवा (paralysis) तक हो सकता है।


पटना के प्रमुख अस्पतालों के आंकड़े स्थिति की गंभीरता को दर्शाते हैं। IGIMS (इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान) में 50-60 मरीज प्रति माह, PMCH (पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल) में 25-30 मरीज, NMCH (नालंदा मेडिकल कॉलेज अस्पताल) में 20-25 मरीज और AIIMS पटना में 40-50 मरीज आ रहे हैं। इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि GBS अब एक स्थानीय नहीं बल्कि व्यापक सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या बनती जा रही है।


विशेषज्ञों के अनुसार, लगभग 70-80% मरीजों में पहले संक्रमण (infection) का इतिहास मिलता है। यह संक्रमण अक्सर होता है डायरिया (दस्त), वायरल बुखार और बैक्टीरियल संक्रमण से। यह बैक्टीरिया, दूषित पानी और भोजन के जरिए शरीर में प्रवेश करता है। पहले पाचन तंत्र (intestine) को संक्रमित करता है। 1-3 सप्ताह बाद शरीर की इम्यून प्रतिक्रिया नसों पर हमला शुरू कर देती है। संक्रमण का मुख्य कारण दूषित पेयजल, अधपका या कच्चा भोजन, खुले में रखा खाना, गंदे हाथों से खाना खाना और खराब स्वच्छता व्यवस्था है। ग्रामीण क्षेत्रों में खतरा अधिक होता है क्योंकि साफ पानी की कमी, खुले स्रोतों से पानी का उपयोग, स्वच्छता के प्रति जागरूकता की कमी रहती है।


GBS के लक्षण धीरे-धीरे शुरू होते हैं और तेजी से बढ़ सकते हैं। पैरों में झुनझुनी (tingling sensation), हल्की कमजोरी, चलने में कठिनाई, हाथों में सुन्नता इसके प्रमुख लक्षण है। मांसपेशियों की ताकत कम होना, संतुलन बिगड़ना, बोलने या निगलने में कठिनाई होना इसकी शुरुआती कारण होता है। वहीं गंभीर अवस्था में शरीर का लकवा (paralysis), सांस लेने में दिक्कत, ICU की जरूरत होती है। 


GBS का विकास तीन चरणों में होता है।  प्रारंभिक चरण (Initial Phase) संक्रमण के बाद शुरू होता है, 1-3 सप्ताह के अंदर लक्षण दिखते हैं। प्रगति चरण (Progressive Phase) में कमजोरी तेजी से बढ़ती है और कुछ दिनों से लेकर हफ्तों तक चलता है। रिकवरी चरण (Recovery Phase) में धीरे-धीरे सुधार होता है और कई महीनों से लेकर सालों तक लग सकता है।


यह तेजी से बढ़ने वाली बीमारी है। 20-30% मरीजों को ICU की जरूरत पड़ती है। कुछ मामलों में मरीज को वेंटिलेटर की जरूरत होती है। समय पर इलाज न मिलने पर मृत्यु का खतरा बना रहता है। विशेषज्ञों के अनुसार, दूषित पानी इसका सबसे बड़ा कारण बन रहा है। शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में खतरा बढ़ रहा है। मौसम परिवर्तन (बरसात) में मामलों में वृद्धि देखी जाती है। 


GBS का निदान क्लिनिकल जांच (Clinical Examination), नर्व कंडक्शन स्टडी (NCS), CSF टेस्ट (स्पाइनल फ्लूइड जांच), ब्लड टेस्ट तरीकों से किया जाता है। GBS का कोई सीधा इलाज नहीं है, लेकिन सही समय पर उपचार से मरीज ठीक हो सकता है। मुख्य उपचार है IVIG (Intravenous Immunoglobulin), Plasmapheresis (ब्लड फिल्टरिंग प्रक्रिया), फिजियोथेरेपी और ICU सपोर्ट। रिकवरी हल्के मामलों में  2-3 महीने, गंभीर मामलों में 6-12 महीने और कुछ मरीजों में स्थायी कमजोरी रह सकती है।


इससे बचाव के लिए उबला हुआ या फिल्टर किया पानी पिना चाहिए। खुले स्रोतों का पानी नही पिना चाहिए। पानी स्टोर करने के बर्तनों को साफ रखना चाहिए। अधपका मांस या भोजन न खाना चाहिए। सड़क किनारे खुले खाने से बचना चाहिए। ताजा और गर्म खाना खाना चाहिए। हाथ धोने की आदत डालना चाहिए। शौच के बाद और खाने से पहले हाथ अवश्य धोना चाहिए।


GBS जैसी बीमारी से बचने के लिए समाज की भागीदारी जरूरी है। स्कूलों में जागरूकता। पंचायत स्तर पर अभियान और मीडिया की भूमिका। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि डायरिया या बुखार के बाद कमजोरी महसूस हो तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। लक्षणों को नजरअंदाज करना खतरनाक हो सकता है।


गुलेन बारी सिंड्रोम एक गंभीर लेकिन रोकी जा सकने वाली बीमारी है। इसका सीधा संबंध जीवनशैली, स्वच्छता और पानी की गुणवत्ता से है। बिहार में बढ़ते मामलों ने यह साफ कर दिया है कि अब सिर्फ इलाज पर नहीं, बल्कि रोकथाम (prevention) पर भी ध्यान देना होगा। यदि समय रहते सही कदम उठाए जाएं, जैसे- स्वच्छ पानी, सुरक्षित भोजन और जागरूकता, तो इस बीमारी के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है। 



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