बिहार की राजनीति यथार्थ, भ्रम और परिवर्तन का यक्ष प्रश्न है

Jitendra Kumar Sinha
0

 


राजनीति को यदि किसी प्राकृतिक तत्व से तुलना करनी हो, तो वह निश्चय ही आकाश में उमड़ते-घुमड़ते मेघों से की जा सकती है। मेघ स्वयं में स्थिर प्रतीत होते हैं, किन्तु वास्तव में वे वायु के वेग और दिशा पर निर्भर होकर गति करते हैं। उनकी चाल में एक रहस्य है, वे चलते हैं, परंतु ऐसा लगता है जैसे चन्द्रमा चल रहा हो। यह दृष्टिभ्रम ही वास्तविकता को ढक देता है। ठीक इसी प्रकार राजनीति में भी घटनाएँ घटती हैं, परंतु उनकी वास्तविक दिशा और प्रेरणा अक्सर दृष्टिगोचर नहीं होती है। जनता को लगता है कि नेता निर्णय ले रहे हैं, जबकि कई बार वे परिस्थितियों, समीकरणों और अदृश्य शक्तियों के प्रभाव में होते हैं। अद्वैत वेदांत की भाषा में इसे “अज्ञानजन्य अध्यास” कहा जाता है, जहाँ वास्तविकता पर भ्रम का आरोप हो जाता है। यही स्थिति राजनीति में भी है, विशेषकर बिहार की राजनीति में।


अद्वैत वेदांत के अनुसार, संसार में जो कुछ दिखाई देता है, वह पूर्ण सत्य नहीं है। उसमें एक मिथ्या तत्व होता है, अज्ञान के कारण उत्पन्न भ्रम। राजनीति में भी यही स्थिति देखने को मिलती है। जनता मानती है कि सत्ता स्थिर है, जबकि वह निरंतर बदलती रहती है। नेता अपने विचारों पर अडिग दिखते हैं, परंतु वे अक्सर परिस्थितियों के अनुसार बदलते हैं। गठबंधन स्थायी प्रतीत होते हैं, परंतु वे क्षणिक होते हैं। एक ऐसी स्थिति जहाँ हम वास्तविकता को समझ नहीं पाते हैं और अपने मन के अनुसार निष्कर्ष निकाल लेते हैं।


बिहार की राजनीति सदैव गतिशील रही है। यहाँ सत्ता परिवर्तन कोई असामान्य घटना नहीं है, बल्कि एक परंपरा बन चुकी है। स्वतंत्रता के बाद बिहार में एकदलीय प्रभुत्व था, जहाँ स्थिरता दिखाई देती थी। परंतु यह स्थिरता भी एक भ्रम थी, क्योंकि भीतर ही भीतर असंतोष पनप रहा था। 1990 के दशक में सामाजिक न्याय की राजनीति ने बिहार को एक नई दिशा दी। यह परिवर्तन अचानक नहीं था, बल्कि वर्षों से चल रहे सामाजिक संघर्ष का परिणाम था। 21वीं सदी में बिहार की राजनीति गठबंधनों पर आधारित हो गई है। यहाँ कोई भी दल पूर्ण बहुमत के साथ लंबे समय तक टिक नहीं पाया है।


आज की राजनीति में निर्णय अंतिम क्षणों में बदल जाते हैं, गठबंधन अचानक टूट जाते हैं और नेता अपने पुराने बयान भूल जाते हैं। यह सब उसी प्रकार है जैसे अचानक तेज हवा चलने पर मेघों का समूह बिखर जाता है।


बिहार में सत्ता परिवर्तन की संभावना हमेशा बनी रहती है। परंतु यह प्रश्न हमेशा अनुत्तरित रहता है कि क्या वास्तव में परिवर्तन होगा? क्योंकि कोई भी निष्कर्ष स्थायी नहीं होता है, क्योंकि राजनीतिक समीकरण हर पल बदलते हैं, क्योंकि जनता की भूमिका अप्रत्याशित होती है। यदि आज तय तिथि के अनुसार सब कुछ होता है, तो परिवर्तन संभव है। परंतु राजनीति में “यदि” सबसे बड़ा भ्रम है।


जनता राजनीति को समझने का प्रयास करती है, परंतु कई बार वह भी भ्रम का शिकार हो जाती है। मीडिया घटनाओं को इस प्रकार प्रस्तुत करता है कि वे वास्तविकता से भिन्न प्रतीत होती हैं। सोशल मीडिया के युग में अफवाहें तेजी से फैलती हैं और वे जनता की धारणा को प्रभावित करती हैं। जनता कई बार तर्क के बजाय भावनाओं के आधार पर निर्णय लेती है, जिससे भ्रम और बढ़ जाता है।


नेता स्वयं को निर्णयकर्ता के रूप में प्रस्तुत करते हैं, परंतु वे भी परिस्थितियों के बंधन में होते हैं। नेता योजनाएँ बनाते हैं, परंतु परिस्थितियाँ उन्हें बदलने पर मजबूर कर देती हैं। राजनीति में विचारधारा स्थिर नहीं होती है बल्कि वह समय के अनुसार बदलती है।


गठबंधन राजनीति मेघों के समूह की तरह है, वे साथ आते हैं, कुछ समय तक टिकते हैं फिर बिखर जाते हैं। इस प्रक्रिया में कोई स्थायित्व नहीं होता है। राजनीति में भविष्यवाणी करना अत्यंत कठिन है। सर्वे और आंकड़े अक्सर वास्तविकता को पूरी तरह नहीं दर्शाते। मानव व्यवहार को पूरी तरह समझना संभव नहीं है।


राजनीति में अज्ञानजन्य अध्यास का अर्थ है, वास्तविकता को समझे बिना निष्कर्ष निकालना, आंशिक जानकारी के आधार पर निर्णय लेना और भ्रम को सत्य मान लेना। राजनीति को समझने के लिए आवश्यक है कि तथ्यों का विश्लेषण करना, भावनाओं से दूरी बनाना और तर्कसंगत सोच रखना।


बिहार की राजनीति को भारत की राजनीति की प्रयोगशाला कहा जा सकता है, क्योंकि यहाँ नए समीकरण बनते हैं, पुराने गठबंधन टूटते हैं और सामाजिक बदलाव स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। परिवर्तन संभव है, परंतु वह निश्चित नहीं है। यह उसी प्रकार है जैसे मेघों का बरसना, संभावना तो होती है, परंतु निश्चितता नहीं।


राजनीति को समझने के लिए हमें यह स्वीकार करना होगा कि वह स्थिर नहीं है, वह पूर्णतः तर्कसंगत नहीं है, उसमें भ्रम और वास्तविकता का मिश्रण है। बिहार की राजनीति भी इसी नियम का पालन करती है। यहाँ हर दिन एक नई कहानी लिखी जाती है। अतः वर्तमान को समझने का प्रयास करना आवश्यक है, परंतु उसके आधार पर भविष्य का निश्चित निष्कर्ष निकालना “अज्ञानजन्य अध्यास” ही होगा।


यदि हम राजनीति को मेघों की भाँति देखें, तो हमें यह समझ में आएगा कि परिवर्तन स्वाभाविक है, अनिश्चितता अपरिहार्य है और भ्रम अनिवार्य है। इसी समझ के साथ यदि हम राजनीति को देखें, तो शायद हम उसके वास्तविक स्वरूप के थोड़ा और निकट पहुँच सकेंगे।



एक टिप्पणी भेजें

0टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें (0)

#buttons=(Ok, Go it!) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Learn More
Ok, Go it!
To Top