“मजबूर ये हालात है, कहने को बहुत कुछ है मगर किससे कहे…” यह सिर्फ एक भावनात्मक पंक्ति नहीं है, बल्कि आज के बिहार की राजनीति का जीवंत चित्र है। पटना एयरपोर्ट पर जब नीतीश कुमार पत्रकारों के सवालों से घिरे खड़े थे, तो उनकी मुस्कान में जितनी शालीनता थी, उतनी ही गहराई भी। सवाल सीधा था “क्या आप स्वेच्छा से मुख्यमंत्री पद छोड़ रहे हैं?” जवाब नहीं मिला, लेकिन उनकी चुप्पी ने ही बहुत कुछ कह दिया। यह घटना महज एक राजनीतिक यात्रा नहीं है, बल्कि बिहार की सत्ता के एक बड़े बदलाव की प्रस्तावना बन चुकी है।
पटना एयरपोर्ट पर पिछले दो दशकों में नीतीश कुमार को सैकड़ों बार देखा गया है। लेकिन इस बार का दृश्य अलग था। पत्रकारों की भीड़, कैमरों की चमक और सवालों की बौछार, सब कुछ संकेत दे रहे थे कि कुछ बड़ा होने वाला है। उनकी वही “मंद मुस्कान” और हाथ जोड़कर आगे बढ़ जाना, यह शैली उनके राजनीतिक जीवन की पहचान रही है। लेकिन इस बार इस मुस्कान के पीछे छिपी कहानी कहीं अधिक गंभीर थी।
दिल्ली पहुंचने के बाद नीतीश कुमार का छोटा सा बयान “उहां इतना दिन किये, अब यहां करेंगे…” ने पूरे राजनीतिक गलियारे में हलचल मचा दी। यह सिर्फ एक वाक्य नहीं था, बल्कि संकेत था कि अब उनका फोकस बिहार से निकलकर राष्ट्रीय राजनीति की ओर हो सकता है।
नीतीश कुमार ने पहली बार राज्यसभा सदस्य के रूप में शपथ ली। यह शपथ उपराष्ट्रपति के समक्ष हुई। इस दौरान कई बड़े नेता मौजूद थे, जिनमें शामिल थे जेपी नड्डा, निर्मला सीतारमन, ललन सिंह, संजय झा, सम्राट चौधरी। यह दृश्य अपने आप में बताता है कि यह सिर्फ एक औपचारिक शपथ नहीं, बल्कि सत्ता परिवर्तन का संकेत है।
राजनीतिक सूत्रों के अनुसार 13 अप्रैल को कैबिनेट बैठक के बाद इस्तीफा, 14-15 अप्रैल को नई सरकार का गठन होने की संभावना है। इस पूरी प्रक्रिया को देखकर लगता है कि सब कुछ पहले से तय योजना के तहत हो रहा है। आज सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि “बिहार किसके हवाले?” इसका उत्तर फिलहाल सिर्फ दो लोगों के पास माना जा रहा है नरेन्द्र मोदी-अमित शाह। बिहार की राजनीति में भाजपा की भूमिका अब निर्णायक होती दिख रही है।
नीतीश कुमार का राजनीतिक सफर भारतीय राजनीति के सबसे दिलचस्प अध्यायों में से एक है। 1990 के दशक में उभार, अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में मंत्री, 2005 में पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री, कई बार गठबंधन बदलना (NDA - UPA - महागठबंधन) प्रमुख पड़ाव है। उनकी राजनीति हमेशा “संतुलन” और “व्यवहारिकता” पर आधारित रही है।
नीतीश कुमार की सबसे बड़ी ताकत और कमजोरी, दोनों ही उनकी गठबंधन राजनीति रही है। उन्होंने भाजपा (NDA), राजद (महागठबंधन), कांग्रेस के साथ गठबंधन किया। हर बार उन्होंने “विकास” को आधार बताया, लेकिन आलोचकों ने इसे “राजनीतिक अवसरवाद” कहा।
भाजपा अब बिहार में “जूनियर पार्टनर” नहीं रहना चाहती है। अमित शाह और नरेन्द्र मोदी की रणनीति साफ दिख रही है- अपने नेतृत्व में सरकार, क्षेत्रीय दलों पर निर्भरता कम करना और नए चेहरे को आगे लाना।
बिहार की जनता इस बदलाव को लेकर दो हिस्सों में बंटी हुई है। एक वर्ग बदलाव को सकारात्मक मानता है, उसे नई ऊर्जा की उम्मीद दिखता है। वहीं, दूसरा वर्ग को अस्थिरता की आशंका है और विकास की गति पर सवाल खड़े होने की संभावना दिखता है।
विपक्ष, खासकर राजद और कांग्रेस, इस मौके को भुनाने की कोशिश में है। उनका मुख्य एजेंडा है भाजपा पर “सत्ता हथियाने” का आरोप और नीतीश कुमार की “मजबूरी” को मुद्दा बनाना। यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या यह उनके राजनीतिक करियर का अंत है? संभवतः नहीं। क्योंकि राज्यसभा में जाने के बाद वे राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय हो सकते हैं और “किंगमेकर” की भूमिका निभा सकते हैं।
आने वाले समय में बिहार की राजनीति में ये बदलाव दिख सकता हैं - भाजपा का पूर्ण नियंत्रण, क्षेत्रीय दलों की भूमिका में बदलाव और नए नेतृत्व का उभार।
पटना एयरपोर्ट की वह खामोश मुस्कान अब एक बड़े राजनीतिक तूफान में बदल चुकी है। नीतीश कुमार ने बिना ज्यादा बोले, एक ऐसा कदम उठाया है जो बिहार की राजनीति को पूरी तरह बदल सकता है। अब सबकी नजरें इस पर हैं कि 13 अप्रैल को क्या होता है? कौन बनता है नया मुख्यमंत्री और सबसे बड़ा कि बिहार किस दिशा में जाता है।
राजनीति में कभी भी कुछ स्थायी नहीं होता है- न दोस्ती, न दुश्मनी, न सत्ता। आज नीतीश कुमार दिल्ली में हैं, कल शायद कोई और होगा। लेकिन बिहार की जनता के लिए सबसे बड़ा सवाल वही रहेगा कि “क्या यह बदलाव उनके जीवन में सुधार लाएगा?”
