“पयाम्मल मंदिर”

Jitendra Kumar Sinha
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आभा सिन्हा, पटना


भारत की धार्मिक परंपराओं में भगवान श्रीराम के साथ-साथ उनके भाइयों का भी अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। जहाँ भगवान राम, लक्ष्मण और भरत की पूजा व्यापक रूप से होती है, वहीं चौथे भाई शत्रुघ्न के मंदिर बहुत कम देखने को मिलते हैं। ऐसे दुर्लभ और पवित्र स्थलों में से एक है केरल राज्य में स्थित “पयाम्मल मंदिर”, जो भगवान शत्रुघ्न को समर्पित है। 


यह मंदिर न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह भारत की सांस्कृतिक विविधता, वास्तुकला और रामायण परंपरा की जीवंत अभिव्यक्ति भी है। 


“पयाम्मल मंदिर” दक्षिण भारत के राज्य केरल के त्रिशूर जिले में स्थित है। यह क्षेत्र अपनी समृद्ध धार्मिक परंपराओं, मंदिरों और त्योहारों के लिए प्रसिद्ध है। यह मंदिर “नालंबलम” परंपरा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसमें भगवान राम और उनके तीनों भाइयों के चार अलग-अलग मंदिर शामिल हैं। त्रिप्रयार श्रीराम मंदिर (राम), कूडालमणिक्यम मंदिर (भरत), मूझिकुलम लक्ष्मण मंदिर (लक्ष्मण) और पयाम्मल मंदिर (शत्रुघ्न)। इन चारों मंदिरों की यात्रा को विशेष रूप से पवित्र माना जाता है, जिसे “नालंबलम यात्रा” कहा जाता है।


शत्रुघ्न का नाम ही उनके व्यक्तित्व को दर्शाता है- “शत्रुओं का विनाश करने वाला”। वे महाराज दशरथ के सबसे छोटे पुत्र और भगवान राम के प्रिय भाई थे। शत्रुघ्न की विशेषताएँ है कि वे अत्यंत विनम्र और समर्पित भाई हैं। भरत के प्रति अटूट निष्ठावान हैं। पराक्रमी योद्धा, धर्म और न्याय के रक्षक हैं। रामायण में उनका योगदान भले ही कम वर्णित हो, लेकिन वे सदैव धर्म की रक्षा के लिए तत्पर रहे। उन्होंने लवणासुर का वध कर मधुरा (मथुरा) में शांति स्थापित की।


“पयाम्मल मंदिर” का इतिहास प्राचीन काल से जुड़ा हुआ है। यह माना जाता है कि इस मंदिर की स्थापना हजारों वर्ष पहले हुई थी और यह रामायण कालीन परंपराओं से प्रेरित है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, इस मंदिर की स्थापना भगवान परशुराम द्वारा की गई थी। केरल के अधिकांश प्राचीन मंदिरों की तरह यह भी वैदिक परंपराओं का पालन करता है। मंदिर का पुनर्निर्माण कई बार हुआ, जिससे इसकी संरचना में समय-समय पर परिवर्तन आया। यह मंदिर सदियों से भक्तों की आस्था का केंद्र बना हुआ है।


केरल में एक विशेष परंपरा है जिसे “नालंबलम यात्रा” कहा जाता है। इसमें भक्त एक ही दिन में भगवान राम और उनके तीनों भाइयों के चारों मंदिरों के दर्शन करते हैं। यात्रा का क्रम होता है, सर्वप्रथम त्रिप्रयार श्रीराम मंदिर, दूसरा कूडालमणिक्यम (भरत), तीसरा मूझिकुलम (लक्ष्मण) और तब पयाम्मल (शत्रुघ्न)। 



यह यात्रा विशेष रूप से कार्किडक मास (मलयालम महीना) में की जाती है, जो आमतौर पर जुलाई-अगस्त के बीच आता है। ऐसा करने से पापों का नाश होता है। पारिवारिक सुख-शांति मिलती है। मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होता है।


“पयाम्मल मंदिर” की वास्तुकला पारंपरिक केरल शैली में बनी हुई है। लकड़ी और पत्थर का सुंदर संयोजन, ढलान वाली छतें (monsoon-friendly design), विस्तृत प्रांगण और पारंपरिक दीप स्तंभ (दीपस्तंभम) है। मंदिर का गर्भगृह अत्यंत पवित्र होता है, जहाँ भगवान शत्रुघ्न की मूर्ति स्थापित है।


“पयाम्मल मंदिर” में पूजा अत्यंत विधिपूर्वक और वैदिक रीति से की जाती है। मुख्य अनुष्ठान में शामिल है नित्य पूजा, अभिषेक, दीपाराधना और विशेष हवन। विशेष प्रसाद में शामिल है पायसम (मीठा प्रसाद), नारियल और फल। यहाँ के पुजारी परंपरागत ब्राह्मण परिवारों से आते हैं, जो पीढ़ियों से इस मंदिर की सेवा कर रहे हैं।


“पयाम्मल मंदिर” में कई धार्मिक उत्सव मनाए जाते हैं, जिसमें कार्किडक वावु (Karkidaka Vavu)- पितरों के श्राद्ध का विशेष दिन होता है और नालंबलम यात्रा का मुख्य समय रहता है। रामायण मासम- पूरे महीने रामायण का पाठ होता है और विशेष पूजा एवं भजन किया जाता है। मंदिर उत्सव- वार्षिक उत्सव में सांस्कृतिक कार्यक्रम के साथ पारंपरिक नृत्य और संगीत का आयोजन किया जाता है।


“पयाम्मल मंदिर” से कई चमत्कारिक कथाएँ जुड़ी हुई हैं कि भक्तों की मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं। कठिन परिस्थितियों में मार्गदर्शन मिलता है। मानसिक शांति और आत्मिक संतुलन प्राप्त होता है। स्थानीय लोग इसे अत्यंत शक्तिशाली और जागृत देवस्थान मानते हैं।


यह मंदिर केवल पूजा का स्थान नहीं है, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का केंद्र भी है। सामुदायिक एकता को बढ़ावा मिलता है, सांस्कृतिक परंपराओं का संरक्षण होता है और धार्मिक शिक्षा का प्रसार होता है। यहाँ होने वाले उत्सव और कार्यक्रम स्थानीय संस्कृति को जीवित रखते हैं।


आज के समय में भी “पयाम्मल मंदिर” अपनी प्राचीन परंपराओं को बनाए हुए है। डिजिटल दान प्रणाली, तीर्थयात्रियों के लिए सुविधाएँ और पर्यावरण संरक्षण प्रयास। यह मंदिर परंपरा और आधुनिकता का सुंदर संगम प्रस्तुत करता है।


निकटतम शहर त्रिशूर है और यहां पहुँचने के लिए सड़क मार्ग से अच्छी कनेक्टिविटी है। त्रिशूर रेलवे स्टेशन है और कोचीन इंटरनेशनल एयरपोर्ट है। 


“पयाम्मल मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति, रामायण परंपरा और आध्यात्मिकता का एक जीवंत प्रतीक है। भगवान शत्रुघ्न की पूजा यहाँ एक अनोखा अनुभव प्रदान करती है, जो भक्तों को विनम्रता, समर्पण और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है। पयाम्मल मंदिर की यात्रा  करने वाले को आध्यात्मिक शांति, सांस्कृतिक समृद्धि और धार्मिक अनुभव की मिलती है।



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