केजरीवाल को झटका: जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने रिक्यूजल की मांग ठुकराई

Jitendra Kumar Sinha
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दिल्ली हाई कोर्ट में कथित शराब नीति मामले से जुड़े एक अहम घटनाक्रम में पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को बड़ा झटका लगा, जब जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने खुद को केस की सुनवाई से अलग करने (रिक्यूजल) की उनकी मांग खारिज कर दी। यह मामला उस समय सामने आया जब ट्रायल कोर्ट पहले ही केजरीवाल समेत 23 आरोपियों को आरोपमुक्त कर चुका था, लेकिन सीबीआई ने उस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी, जिसकी सुनवाई जस्टिस शर्मा की बेंच के सामने चल रही है।


केजरीवाल और अन्य नेताओं ने जस्टिस शर्मा पर निष्पक्षता को लेकर सवाल उठाते हुए उनसे केस से हटने की अपील की थी। उन्होंने कई तर्क दिए, जिनमें यह आरोप भी शामिल था कि जज के कुछ पुराने फैसले और परिस्थितियां उनके खिलाफ पूर्वाग्रह दर्शाती हैं। साथ ही, उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें निष्पक्ष सुनवाई की उम्मीद नहीं है, इसलिए केस किसी दूसरी बेंच को सौंपा जाना चाहिए।


हालांकि, जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने इन सभी दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया और स्पष्ट कहा कि केवल आशंका या आरोप के आधार पर किसी जज को केस से अलग नहीं किया जा सकता। उन्होंने यह भी कहा कि वे बिना किसी दबाव या प्रभाव के मामले की सुनवाई जारी रखेंगी और सीबीआई की याचिका पर फैसला करेंगी। जज ने यह भी टिप्पणी की कि ऐसे आधार पर रिक्यूजल की मांग करना न्यायिक संस्था पर ही सवाल खड़ा करने जैसा है, जो स्वीकार्य नहीं हो सकता।


सुनवाई के दौरान जस्टिस शर्मा ने अपने लंबे न्यायिक अनुभव का हवाला देते हुए कहा कि उन्होंने अपने करियर में कई परीक्षाएं पास की हैं और अब यह सवाल उठाना कि उन्हें किसी पक्षकार की अपेक्षाओं के अनुसार खुद को साबित करना पड़े, न्यायपालिका की गरिमा के खिलाफ है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि इस तरह की याचिकाएं न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश हो सकती हैं।


इस पूरे मामले में केजरीवाल ने पहले चीफ जस्टिस को पत्र लिखकर केस ट्रांसफर करने की मांग की थी, जिसे खारिज कर दिया गया। इसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का रुख भी किया और फिर हाई कोर्ट में ही रिक्यूजल की याचिका दायर की, जिस पर अब फैसला आ चुका है।


अंततः कोर्ट के इस फैसले से साफ हो गया कि शराब नीति मामले की सुनवाई अब उसी बेंच के सामने जारी रहेगी और न्यायपालिका ने यह स्पष्ट संदेश दिया है कि केवल शक या आरोप के आधार पर न्यायिक प्रक्रिया को बदला नहीं जा सकता।


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