समान कानून की दिशा में ऐतिहासिक कदम - “असम विधानसभा से हुआ यूसीसी बिल पास”

Jitendra Kumar Sinha
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असम विधानसभा ने बुधवार को समान नागरिक संहिता (यूसीसी) विधेयक पारित कर देश की राजनीति और सामाजिक विमर्श में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। इस कानून का उद्देश्य विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, गोद लेने और लिव-इन संबंधों जैसे व्यक्तिगत मामलों में सभी नागरिकों के लिए एक समान कानूनी व्यवस्था लागू करना है। इसके साथ ही असम, उत्तराखंड और गुजरात के बाद यूसीसी लागू करने वाला देश का तीसरा राज्य बन गया है। राज्य सरकार का कहना है कि यह कानून संविधान की भावना के अनुरूप है और इससे सभी नागरिकों को समान अधिकार एवं न्याय मिलेगा। हालांकि, इस कानून को लेकर समर्थन और विरोध दोनों देखने को मिल रहे हैं। विशेष बात यह है कि इस कानून को अनुसूचित जनजाति (एसटी) समुदायों पर लागू नहीं किया जाएगा।


समान नागरिक संहिता यानी यूनिफॉर्म सिविल कोड (यूसीसी) का अर्थ है कि देश या राज्य में रहने वाले सभी नागरिकों के लिए व्यक्तिगत मामलों से जुड़े कानून समान हो, चाहे उनका धर्म कोई भी हो। वर्तमान में भारत में विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और संपत्ति बंटवारे जैसे मामलों में अलग-अलग धर्मों के लिए अलग-अलग व्यक्तिगत कानून लागू हैं। यूसीसी लागू होने के बाद इन मामलों में एक समान कानून लागू होगा। इसका उद्देश्य धार्मिक आधार पर होने वाले कानूनी भेदभाव को समाप्त करना और सभी नागरिकों को समान न्याय प्रदान करना माना जा रहा है।


असम सरकार का कहना है कि यूसीसी महिलाओं के अधिकारों को मजबूत करेगा और समाज में समानता को बढ़ावा देगा। मुख्यमंत्री ने विधानसभा में कहा कि यह कानून किसी धर्म के खिलाफ नहीं है, बल्कि नागरिक अधिकारों को समान रूप से सुनिश्चित करने के लिए लाया गया है। सरकार का दावा है कि कई बार अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों के कारण महिलाओं को न्याय पाने में कठिनाई होती है। तलाक, बहुविवाह और संपत्ति में अधिकार जैसे मुद्दों पर समान कानून लागू होने से महिलाओं की स्थिति मजबूत होगी। इसके अलावा सरकार का मानना है कि आधुनिक समाज में सभी नागरिकों के लिए समान कानूनी व्यवस्था समय की मांग है।


असम यूसीसी कानून में अनुसूचित जनजाति समुदायों को विशेष छूट दी गई है। राज्य में बड़ी संख्या में आदिवासी और जनजातीय समुदाय निवास करते हैं जिनकी अपनी पारंपरिक सामाजिक और सांस्कृतिक व्यवस्थाएं हैं। सरकार ने स्पष्ट किया है कि जनजातीय समुदायों की सांस्कृतिक पहचान और परंपराओं की रक्षा के लिए उन्हें इस कानून के दायरे से बाहर रखा गया है। यह कदम इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि पूर्वोत्तर राज्यों में जनजातीय पहचान और सांस्कृतिक अधिकारों का मुद्दा अत्यंत संवेदनशील है।


यूसीसी बिल को लेकर विपक्षी दलों और कुछ सामाजिक संगठनों ने चिंता भी व्यक्त की है। उनका कहना है कि भारत जैसे विविधताओं वाले देश में अलग-अलग समुदायों की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं का सम्मान होना चाहिए। कुछ संगठनों का तर्क है कि यूसीसी लागू करने से धार्मिक स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है। वहीं दूसरी ओर समर्थकों का कहना है कि संविधान सभी नागरिकों को समान अधिकार देता है और समान नागरिक संहिता उसी दिशा में एक कदम है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले समय में यह मुद्दा राष्ट्रीय राजनीति में भी प्रमुख विषय बन सकता है।


समान नागरिक संहिता का विषय लंबे समय से देश में चर्चा का केंद्र रहा है। भारतीय संविधान के नीति निदेशक तत्वों में अनुच्छेद 44 के तहत राज्य को सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता लागू करने का प्रयास करने की बात कही गई है। हाल के वर्षों में कई राज्यों ने इस दिशा में पहल शुरू की है। उत्तराखंड सबसे पहला राज्य बना जिसने यूसीसी कानून लागू किया। अब असम के इस कदम के बाद अन्य राज्यों में भी इस विषय पर चर्चा तेज होने की संभावना है। केंद्र सरकार भी कई बार यूसीसी को लेकर अपनी सकारात्मक मंशा जाहिर कर चुकी है। ऐसे में आने वाले समय में यह मुद्दा और व्यापक राजनीतिक एवं सामाजिक बहस का विषय बन सकता है।


असम विधानसभा द्वारा यूसीसी बिल पारित किया जाना भारतीय राजनीति और कानून व्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है। सरकार इसे समानता और न्याय की दिशा में बड़ा कदम बता रही है, जबकि विरोधी पक्ष इसे सांस्कृतिक विविधता से जोड़कर देख रहा है। फिलहाल इतना तय है कि यूसीसी का मुद्दा आने वाले समय में देश की राजनीति, समाज और न्याय व्यवस्था में गहरी चर्चा का विषय बना रहेगा। असम का यह कदम अन्य राज्यों के लिए भी एक उदाहरण बन सकता है और देश में समान नागरिक संहिता की बहस को नई गति दे सकता है।



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