मदर्स डे - ममता, त्याग और सभ्यता की पवित्र धरोहर है “माँ”

Jitendra Kumar Sinha
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आभा सिन्हा, पटना 

दुनिया के हर इंसान की जिन्दगी में यदि कोई एक ऐसा शब्द है, जिसे सुनते ही मन में सुरक्षा, अपनापन, करुणा और निस्वार्थ प्रेम की अनुभूति होती है, तो वह शब्द है ‘मां’। ‘मां’ केवल जन्म देने वाली स्त्री नहीं होती है, बल्कि वह जीवन की पहली शिक्षक, पहला विद्यालय, पहला चिकित्सक, पहला मित्र और सबसे बड़ी प्रेरणा होती है। मनुष्य का पहला स्पर्श ‘मां’ का होता है, पहला शब्द ‘मां’ से जुड़ा होता है और जीवन की पहली अनुभूति भी ‘मां’ के आंचल में ही मिलती है।


जब बच्चा बोलना नहीं जानता है, तब भी ‘मां’ उसकी हर जरूरत समझ लेती है। जब पूरी दुनिया किसी व्यक्ति को असफल मान लेती है, तब भी ‘मां’ को अपने बच्चे पर भरोसा रहता है। यही कारण है कि संसार की लगभग हर संस्कृति, हर धर्म और हर सभ्यता में ‘मां’ को सर्वोच्च सम्मान दिया गया है।


मदर्स डे केवल एक उत्सव नहीं है, बल्कि यह उस अनंत त्याग, संघर्ष, धैर्य और प्रेम को सम्मान देने का अवसर है, जो हर मां अपने परिवार और बच्चों के लिए करती है। यह दिन याद दिलाता है कि आधुनिक जीवन की भागदौड़ में कहीं उस व्यक्ति को नजरअंदाज तो नहीं कर रहे, जिसने अपनी पूरी जिन्दगी समर्पित कर दी।


आज तकनीक ने दुनिया को बदल दिया है। लोग मोबाइल और इंटरनेट के जरिए हजारों किलोमीटर दूर बैठे लोगों से जुड़े हुए हैं, लेकिन कई बार अपने ही घर में मौजूद ‘मां’ से दूर हो जाते हैं। ऐसे समय में मदर्स डे का महत्व और भी बढ़ जाता है। यह केवल उपहार देने या सोशल मीडिया पोस्ट करने का दिन नहीं है, बल्कि ‘मां’ के प्रति अपने कर्तव्यों को समझने और उन्हें महसूस कराने का दिन है कि वह जीवन में कितनी महत्वपूर्ण हैं।


भारतीय संस्कृति में मां को देवी का स्वरूप माना गया है। इसलिए कहा गया है कि ‘मातृ देवो भवः’। अर्थात मां को देवता के समान सम्मान दो। वेदों, पुराणों, रामायण, महाभारत और संत साहित्य में ‘मां’ के महत्व का विस्तार से वर्णन मिलता है। भगवान राम हो या श्रीकृष्ण, छत्रपति शिवाजी हो या स्वामी विवेकानंद,  हर महान व्यक्ति के जीवन में उनकी ‘मां’  की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।


आज जब समाज तेजी से बदल रहा है, संयुक्त परिवार टूट रहे हैं, रिश्तों में दूरी बढ़ रही है और वृद्धाश्रमों की संख्या बढ़ती जा रही है, तब ‘मां’ के महत्व पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। मदर्स डे केवल एक औपचारिक उत्सव बनकर न रह जाए, बल्कि यह सोच और व्यवहार में बदलाव का माध्यम बने, यही इसकी वास्तविक सार्थकता है।


‘मां’ के प्रति सम्मान की परंपरा नई नहीं है। यह मानव सभ्यता जितनी पुरानी है। प्राचीन यूनान में देवी रिया को देवताओं की माता माना जाता था और उनके सम्मान में विशेष उत्सव आयोजित किए जाते थे। इसी प्रकार प्राचीन रोम में ‘हिलारिया’ नामक पर्व मनाया जाता था, जो मातृत्व और देवी शक्ति को समर्पित था। 


भारत में भी प्राचीन काल से मातृत्व को अत्यंत पवित्र माना गया है। यहां धरती को ‘भारत माता’ कहा गया, नदियों को मां का दर्जा दिया गया और गाय को ‘गौ माता’ कहा गया। यह दर्शाता है कि भारतीय संस्कृति में मातृत्व केवल जैविक संबंध नहीं, बल्कि सृजन और पालन की संपूर्ण भावना का प्रतीक है।


आधुनिक मदर्स डे की शुरुआत अमेरिका से मानी जाती है। इसके पीछे एक महिला ‘एना जार्विस’ का नाम प्रमुख रूप से जुड़ा है। एना अपनी मां से बहुत प्रेम करती थी। उनकी मां ‘एन रीव्स जार्विस’ सामाजिक कार्यकर्ता थी और महिलाओं के स्वास्थ्य तथा बच्चों की देखभाल के लिए काम करती थी। 1905 में अपनी मां के निधन के बाद एना जार्विस ने एक ऐसा दिन घोषित कराने का अभियान शुरू किया, जो माताओं को सम्मान देने के लिए समर्पित हो। कई वर्षों के प्रयास के बाद 1914 में अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति वुडरो विल्सन ने मई के दूसरे रविवार को आधिकारिक रूप से मदर्स डे घोषित कर दिया। धीरे-धीरे यह परंपरा दुनिया के कई देशों में फैल गई।


भारत में पारंपरिक रूप से मां का सम्मान सदियों से किया जाता रहा है। हालांकि पश्चिमी प्रभाव के कारण आधुनिक स्वरूप में मदर्स डे मनाने की परंपरा पिछले कुछ दशकों में अधिक लोकप्रिय हुई। स्कूलों, कॉलेजों, सामाजिक संस्थाओं और मीडिया के माध्यम से यह दिन व्यापक रूप से मनाया जाने लगा है। लेकिन भारतीय संदर्भ में मदर्स डे का अर्थ केवल एक दिन का उत्सव नहीं है। यहां ‘मां’ को जीवनभर सम्मान देने की परंपरा रही है। भारतीय परिवारों में ‘मां’ घर की धुरी होती है। वह केवल भोजन बनाने या बच्चों की देखभाल करने वाली नहीं है, बल्कि परिवार की भावनात्मक शक्ति होती है।


भारतीय संस्कृति में ‘मां’ को भगवान से भी ऊंचा स्थान दिया गया है। उपनिषदों में कहा गया है कि ‘मातृ देवो भवः, पितृ देवो भवः’। इसका अर्थ है कि मां और पिता को देवताओं के समान सम्मान देना चाहिए। ‘मां’ को सबसे पहले इसलिए रखा गया है क्योंकि बच्चा सबसे पहले उसी के संपर्क में आता है। उसका शरीर, उसका मन, उसकी भावनाएं और उसका संस्कार,  सब कुछ मां से प्रभावित होता है।


रामायण में माता कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा के चरित्र मातृत्व के विभिन्न रूपों को दर्शाते हैं। माता कौशल्या का वात्सल्य, सुमित्रा का त्याग और कैकेयी की महत्वाकांक्षा,  तीनों मातृत्व के अलग-अलग पक्षों को प्रस्तुत करते हैं। महाभारत में कुंती का चरित्र संघर्ष और धैर्य का प्रतीक है। उन्होंने विपरीत परिस्थितियों में अपने पुत्रों का पालन-पोषण किया और उन्हें धर्म के मार्ग पर चलने की शिक्षा दी।


यदि भारतीय इतिहास में किसी मां के योगदान को सबसे अधिक याद किया जाता है, तो वह हैं माता जीजाबाई। उन्होंने बालक शिवाजी को केवल युद्ध कौशल ही नहीं, बल्कि राष्ट्रभक्ति, धर्म और न्याय की शिक्षा भी दी। कहा जाता है कि शिवाजी के व्यक्तित्व निर्माण में जीजाबाई की सबसे बड़ी भूमिका थी।स्वामी विवेकानंद ने कई बार कहा था कि उनके व्यक्तित्व और विचारों के पीछे उनकी मां भुवनेश्वरी देवी का बड़ा योगदान है। उनकी मां ने उन्हें आत्मविश्वास, निर्भीकता और सेवा की भावना सिखाई।


आज समाज में ऐसी महिलाओं की संख्या भी बढ़ रही है, जो अकेले अपने बच्चों का पालन-पोषण कर रही हैं। तलाक, पति की मृत्यु या अन्य कारणों से वे अकेले जीवन का सामना करती हैं। आर्थिक, सामाजिक और मानसिक चुनौतियों के बावजूद वे अपने बच्चों को बेहतर जीवन देने की कोशिश करती हैं। ऐसी माताएं समाज के लिए प्रेरणा हैं।


‘मां’ और बच्चे का रिश्ता दुनिया के सबसे मजबूत रिश्तों में से एक माना जाता है। वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि जन्म के बाद बच्चे का मानसिक और भावनात्मक विकास उसकी ‘मां’ से मिले प्रेम और सुरक्षा पर बहुत निर्भर करता है। जब बच्चा डरता है, तो मां का आंचल उसे सुरक्षा देता है। जब वह असफल होता है, तो मां उसे हिम्मत देती है। जब पूरी दुनिया आलोचना करती है, तब भी मां अपने बच्चे का साथ नहीं छोड़ती है।


मनोवैज्ञानिकों के अनुसार जिन बच्चों को बचपन में मां का प्यार और भावनात्मक सहयोग मिलता है, वे अधिक आत्मविश्वासी और संतुलित व्यक्तित्व वाले बनते हैं। इसके विपरीत जिन बच्चों को भावनात्मक उपेक्षा मिलती है, उनमें मानसिक तनाव और असुरक्षा की भावना अधिक पाई जाती है।भारतीय समाज में यह मान्यता बहुत गहरी है कि मां की दुआ इंसान के जीवन को बदल सकती है। चाहे व्यक्ति कितना भी बड़ा क्यों न हो जाए, उसकी सफलता के पीछे मां की प्रार्थना और आशीर्वाद की भूमिका अवश्य होती है।


पहले संयुक्त परिवारों में मां को भावनात्मक और सामाजिक सहयोग मिलता था। दादी, चाची, बुआ और अन्य महिलाएं बच्चों की परवरिश में सहयोग करती थी। लेकिन आज एकल परिवारों के बढ़ने से मां की जिम्मेदारियां और बढ़ गई हैं। 


आज महिलाएं हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं। वे डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, सैनिक, पत्रकार और प्रशासक के रूप में देश की सेवा कर रही हैं। लेकिन इसके साथ ही उन्हें परिवार और बच्चों की जिम्मेदारी भी निभानी पड़ती है। कामकाजी माताओं के सामने समय प्रबंधन सबसे बड़ी चुनौती है। कई बार वे अपराधबोध महसूस करती हैं कि वे बच्चों को पर्याप्त समय नहीं दे पा रही। ऐसे में परिवार और समाज का सहयोग बहुत जरूरी हो जाता है।


आज बच्चों का बचपन मोबाइल और इंटरनेट के बीच बीत रहा है। मां के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह बच्चों को तकनीक का सही उपयोग सिखाए और उन्हें संस्कारों से जोड़े रखे। मां को अब केवल खाना बनाना और बच्चों को स्कूल भेजना ही नहीं, बल्कि उनके मानसिक स्वास्थ्य, ऑनलाइन सुरक्षा और भावनात्मक संतुलन का भी ध्यान रखना पड़ता है।


यह आधुनिक समाज की सबसे दुखद सच्चाइयों में से एक है कि जिन माता-पिता ने पूरी जिन्दगी अपने बच्चों के लिए समर्पित कर दी, वही बुजुर्ग अवस्था में अकेले पड़ जाते हैं। कई मामलों में बच्चे अपने करियर और निजी जीवन में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि वे अपने माता-पिता के लिए समय नहीं निकाल पाते हैं। भारत जैसे देश में जहां मां-बाप की सेवा को सबसे बड़ा धर्म माना गया, वहां वृद्धाश्रमों की संख्या बढ़ना चिंताजनक है। यह केवल आर्थिक समस्या नहीं है, बल्कि भावनात्मक संकट भी है। कई बुजुर्ग माताएं केवल इसलिए वृद्धाश्रम में रह रही हैं क्योंकि उनके बच्चे उन्हें बोझ समझने लगे हैं। यह स्थिति समाज के नैतिक पतन को दर्शाती है।


हिंदी साहित्य में मां की ममता और त्याग को अनेक कवियों और लेखकों ने अमर किया है। मैथिलीशरण गुप्त, महादेवी वर्मा, प्रेमचंद और हरिवंश राय बच्चन जैसे साहित्यकारों ने मां के महत्व को अपने लेखन में विशेष स्थान दिया है। महादेवी वर्मा ने मां की करुणा और संवेदना को बहुत मार्मिक ढंग से चित्रित किया है। प्रेमचंद की कहानियों में गरीब मां का संघर्ष और त्याग अक्सर दिखाई देता है।


भारतीय फिल्मों में मां का चरित्र हमेशा महत्वपूर्ण रहा है। निरूपा रॉय से लेकर रीमा लागू और फरीदा जलाल तक, कई अभिनेत्रियों ने मां की भूमिका को यादगार बनाया। फिल्म ‘दीवार’ का संवाद ‘मेरे पास मां है’  भारतीय समाज में मां के महत्व को बहुत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करता है। आधुनिक फिल्मों में भी मां के संघर्ष और भावनाओं को प्रमुखता से दिखाया जा रहा है। भारतीय लोकगीतों में मां का उल्लेख अत्यंत भावुक रूप में मिलता है। गांवों में आज भी ऐसे गीत गाए जाते हैं, जिनमें मां की ममता, विदाई का दर्द और बेटे-बेटी के प्रति उसका प्रेम झलकता है।



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