भारतीय राजनीति और नारी-शक्ति

Jitendra Kumar Sinha
0

 



 

भारतीय लोकतंत्र में महिलाओं की भूमिका हमेशा से महत्वपूर्ण रही है, लेकिन उनकी वास्तविक राजनीतिक भागीदारी और सशक्तिकरण के बीच एक गहरी खाई दिखाई देती है। लंबे समय से महिलाओं को राजनीतिक रूप से जागरूक और सक्रिय नागरिक के रूप में प्रस्तुत किया गया है, लेकिन जब बात प्रतिनिधित्व और निर्णय लेने की शक्ति की आती है, तो स्थिति उतनी उत्साहजनक नहीं दिखती।


हाल के वर्षों में महिलाओं से जुड़े विधेयकों, विशेषकर आरक्षण से संबंधित प्रस्तावों, ने राजनीतिक विमर्श को नई दिशा दी है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि इन विधेयकों का इस्तेमाल कई बार वास्तविक परिवर्तन की बजाय राजनीतिक रणनीति के रूप में किया गया दिखता है।


1990 के दशक तक भारतीय राजनीति में महिलाओं की उपस्थिति सीमित थी। वे मुख्यतः प्रतीकात्मक भूमिकाओं में दिखाई देती थी। पंचायत स्तर पर आरक्षण ने पहली बार महिलाओं को राजनीतिक मंच पर आने का अवसर दिया।  73वें और 74वें संविधान संशोधन ने महिलाओं के लिए आरक्षण सुनिश्चित किया। लाखों महिलाएं पहली बार सत्ता में किसी रूप से जुड़ी। इससे सामाजिक संरचना में भी बदलाव आया। लेकिन यह भी देखा गया कि कई मामलों में महिलाएं “प्रॉक्सी” के रूप में काम कर रही थी, जहां वास्तविक निर्णय उनके पुरुष परिजन लेते थे।


महिला आरक्षण विधेयक लंबे समय से चर्चा में रहा है। इसे महिलाओं के सशक्तिकरण की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम माना गया है, लेकिन इसके बार-बार लटकने और अंततः राजनीतिक परिस्थितियों में इस्तेमाल होने ने कई सवाल खड़े किए हैं। जैसा कि देखा गया है कि बिल के गिरते ही पोस्टरों का छपना यह संकेत देता है कि यह केवल एक नीति नहीं, बल्कि एक सुनियोजित राजनीतिक गतिविधि थी। क्या राजनीतिक दल वास्तव में महिलाओं को सशक्त करना चाहते हैं? या यह केवल चुनावी लाभ के लिए उठाया गया मुद्दा था?


आज महिला मतदाता भारतीय चुनावों में निर्णायक भूमिका निभा रही हैं। कई राज्यों में महिलाओं का मतदान प्रतिशत पुरुषों से अधिक हो गया है। राजनीतिक दल अब उन्हें एक “निर्णायक वोट बैंक” के रूप में देख रहे हैं। क्या इस विधेयक के गिरने का असर राज्यों के चुनावों पर पड़ेगा। संभवत कुछ हद तक भावनात्मक प्रतिक्रिया देखने को मिल सकती है। लेकिन चुनावी परिणाम कई अन्य कारकों पर भी निर्भर करते हैं, जिसमें स्थानीय मुद्दे, नेतृत्व, गठबंधन आदि।


क्या महिलाओं को छल का एहसास है? यह एक महत्वपूर्ण और जटिल प्रश्न है। आज की महिला अधिक शिक्षित है। सूचना तक उसकी पहुंच अधिक है। सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए वह राजनीतिक रूप से अधिक जागरूक है। नब्बे के दशक की तुलना में आज महिलाएं अपने अधिकारों को लेकर अधिक सजग हैं। राजनीतिक निर्णयों पर सवाल उठा रही हैं और केवल “लाभार्थी” नहीं, बल्कि “निर्णायक” बनना चाहती हैं।


हर चुनाव में महिलाओं के लिए योजनाएं घोषित की जाती हैं। लेकिन उनका क्रियान्वयन अधूरा रहता है।  महिला नेताओं को आगे करना, महिला सशक्तिकरण के नाम पर अभियान चलाना। लेकिन जमीनी स्तर पर बदलाव धीमा रहता है। मीडिया इस पूरे विमर्श को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। बिल के गिरते ही पोस्टरों का छपना यह दर्शाता है कि यह एक पूर्व नियोजित रणनीति थी। जनता की भावनाओं को तुरंत प्रभावित करने का प्रयास किया गया। 


भारतीय राजनीति में नारी-शक्ति का सवाल अब केवल एक “मुद्दा” नहीं रहा, बल्कि यह लोकतंत्र की गुणवत्ता का पैमाना बन चुका है। महिलाओं को लंबे समय तक प्रतीकात्मक रूप से इस्तेमाल किया गया, लेकिन अब स्थिति बदल रही है। महिलाएं अब केवल वोटर नहीं, बल्कि विचारशील नागरिक और संभावित नेता हैं। उन्हें लगातार छला नहीं जा सकता। राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि अब “प्रदर्शन” नहीं, बल्कि “परिवर्तन” की राजनीति करनी होगी।



एक टिप्पणी भेजें

0टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें (0)

#buttons=(Ok, Go it!) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Learn More
Ok, Go it!
To Top