महंगाई - सुधा दूध और बस किराये में बढ़ोतरी से आम आदमी की जेब पर बढ़ेगी दोहरी बोझ

Jitendra Kumar Sinha
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बिहार में आम लोगों की जेब पर महंगाई का एक और बड़ा झटका पड़ने जा रहा है। पहले से बढ़ती रोजमर्रा की लागत, महंगे खाद्य पदार्थ, ईंधन और घरेलू खर्चों से जूझ रहे लोगों के लिए अब दूध और परिवहन दोनों की कीमतों में वृद्धि नई चुनौती बनकर सामने आई है। राज्य में सुधा दूध के दाम प्रति लीटर 3 से 4 रुपये तक बढ़ने की तैयारी है, वहीं सरकारी बसों का किराया भी एक जून से 15 प्रतिशत तक बढ़ाया जा सकता है। इन दोनों फैसलों का असर केवल उपभोक्ताओं तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका प्रभाव परिवारों के मासिक बजट, व्यापारिक गतिविधियों और दैनिक जीवन पर भी दिखाई देगा।


यह वृद्धि ऐसे समय में हो रही है जब आम नागरिक पहले से ही महंगाई की बढ़ती रफ्तार से परेशान हैं। दूध जैसे आवश्यक खाद्य पदार्थ और बस जैसी सार्वजनिक परिवहन सेवाएं हर वर्ग के जीवन से सीधे जुड़ी हुई हैं। ऐसे में कीमतों में वृद्धि केवल एक आर्थिक निर्णय नहीं बल्कि सामाजिक प्रभाव वाला विषय भी बन जाता है।


बिहार स्टेट मिल्क को-ऑपरेटिव फेडरेशन यानि कॉम्फेड की बोर्ड बैठक में सुधा दूध की कीमतों में वृद्धि पर सहमति बन चुकी है। हालांकि आधिकारिक आदेश जारी होना बाकी है, लेकिन सूत्रों के अनुसार प्रति लीटर दूध की कीमत में 3 से 4 रुपये तक बढ़ोतरी लगभग तय मानी जा रही है।


सुधा दूध बिहार ही नहीं बल्कि झारखंड और अन्य राज्यों में भी बड़े स्तर पर उपयोग किया जाता है। राज्य के लाखों परिवार रोजाना सुधा दूध पर निर्भर हैं। ऐसे में कीमत बढ़ने का असर सीधे आम लोगों के रसोई बजट पर पड़ेगा। फिलहाल वर्तमान में सुधा के प्रमुख उत्पादों की कीमतें हैं- सुधा गोल्ड फुल क्रीम दूध- 65 रुपये प्रति लीटर, सुधा शक्ति- 57 रुपये प्रति लीटर और गाय का दूध- 54 रुपये प्रति लीटर। यदि कीमतों में प्रस्तावित वृद्धि लागू होती है तो इनकी दरें और अधिक बढ़ जाएंगी।


सूत्रों के अनुसार सिर्फ दूध ही नहीं बल्कि सुधा के अन्य उत्पादों जैसे- घी, पेड़ा, दही, लस्सी, मिठाइयां, मक्खन की कीमतों में भी वृद्धि की संभावना है। इसका अर्थ यह है कि महंगाई का प्रभाव केवल एक उत्पाद तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि पूरी दुग्ध श्रृंखला प्रभावित होगी। त्योहारों, विवाह समारोहों और घरेलू उपयोग में इन उत्पादों की बड़ी खपत होती है। इसलिए कीमतों में बदलाव का असर व्यापक स्तर पर महसूस किया जाएगा।


दूध की कीमत बढ़ाने के पीछे कई कारण बताए जा रहे हैं। इनमें सबसे प्रमुख है उत्पादन लागत में वृद्धि। पिछले कुछ वर्षों में पशुओं के चारे की कीमत में भारी बढ़ोतरी हुई है। मक्का, भूसा, दाना और खनिज मिश्रण महंगे हुए हैं। इससे पशुपालकों का खर्च बढ़ा है। दूध संग्रहण और परिवहन के लिए बड़ी मात्रा में वाहनों का उपयोग होता है। पेट्रोल, डीजल और सीएनजी महंगे होने से परिवहन लागत भी बढ़ी है। मध्य पूर्व क्षेत्र में तनाव और अमेरिका-ईरान संघर्ष के कारण वैश्विक स्तर पर ऊर्जा बाजार प्रभावित हुआ है। तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव का असर भारत के परिवहन और लॉजिस्टिक क्षेत्र पर भी पड़ा है। दूध उत्पादक किसान लंबे समय से बेहतर भुगतान की मांग कर रहे थे। उनका तर्क था कि बढ़ती लागत के बावजूद उन्हें उचित लाभ नहीं मिल रहा है।


दूध की कीमत बढ़ने का एक सकारात्मक पक्ष यह भी है कि पशुपालकों और दूध उत्पादकों को अधिक भुगतान मिलेगा। अधिकारियों के अनुसार, किसानों को प्रति लीटर 2 से 3.25 रुपये अधिक मिलेंगे। खुदरा विक्रेताओं को 15 पैसे प्रति लीटर अतिरिक्त मार्जिन मिलेगा। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को कुछ राहत मिलने की उम्मीद है। बिहार जैसे राज्य में जहां लाखों परिवार पशुपालन से जुड़े हैं, वहां यह फैसला किसानों की आय बढ़ाने में मदद कर सकता है।


यदि पिछले वर्षों के आंकड़ों पर नजर डालें तो दूध की कीमतों में लगातार वृद्धि देखी गई है। पिछले तीन वर्षों में दूध की कीमतों में लगभग 14 रुपये प्रति लीटर तक बढ़ोतरी हो चुकी है। यह प्रश्न भी उठने लगा है कि क्या लगातार बढ़ती कीमतों के बावजूद आम आदमी की आय उसी अनुपात में बढ़ रही है? महंगाई का सबसे अधिक असर मध्यम और निम्न आय वर्ग पर पड़ता है क्योंकि उनकी आय सीमित होती है जबकि खर्च लगातार बढ़ते रहते हैं।


सुधा केवल एक ब्रांड नहीं बल्कि बिहार की दुग्ध अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन चुका है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार प्रतिदिन 183.5 लाख लीटर सुधा दूध की बिक्री होती है। लगभग 22 लाख लीटर दूध का संग्रह किया जाता है और लाखों परिवार इससे प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हैं। इस विशाल नेटवर्क को संचालित करने के लिए परिवहन, प्रसंस्करण और वितरण पर भारी लागत आती है।


दूध के साथ-साथ परिवहन विभाग भी लोगों को महंगाई का झटका देने जा रहा है। एक जून से सरकारी बसों के किराये में 15 प्रतिशत तक वृद्धि की तैयारी चल रही है। यह वृद्धि लगभग छह वर्षों के बाद की जा रही है। विभाग का कहना है कि लगातार बढ़ती परिचालन लागत के कारण किराये में संशोधन आवश्यक हो गया है।


बस परिचालन में कई खर्च शामिल होते हैं, ईंधन की लागत बस सेवा की सबसे बड़ी लागत होती है। हाल के समय में ईंधन महंगा होने से परिवहन कंपनियों पर दबाव बढ़ा है। वाहनों के पार्ट्स, टायर, मरम्मत और कर्मचारियों के वेतन में भी वृद्धि हुई है। यदि लंबे समय तक किराया नहीं बढ़ाया जाए तो परिवहन सेवाएं घाटे में जा सकती हैं। इन्हीं कारणों से विभाग किराया संशोधन कर रहा है।


परिवहन विभाग की योजना के अनुसार किराया वृद्धि अलग-अलग श्रेणियों में लागू होगी। इनमें शामिल हैं साधारण बस, डीलक्स बस, वातानुकूलित बस, नगरीय बस सेवा अर्थात ग्रामीण से शहरी यात्रियों तक सभी प्रभावित होंगे।


बस किराया बढ़ने का सबसे अधिक असर उन लोगों पर पड़ेगा जो रोजाना यात्रा करते हैं। जैसे-नौकरीपेशा लोग, छात्र, छोटे व्यवसायी और दैनिक मजदूर।  यदि कोई व्यक्ति प्रतिदिन बस से कार्यालय आता-जाता है तो मासिक खर्च में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है। छात्रों के लिए भी यह चिंता का विषय है क्योंकि कई विद्यार्थी रोज लंबी दूरी तय कर स्कूल और कॉलेज पहुंचते हैं।


आर्थिक विशेषज्ञ मानते हैं कि महंगाई केवल खर्च नहीं बढ़ाती बल्कि इसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी पड़ता है। जब लोगों को लगता है कि हर चीज लगातार महंगी होती जा रही है तो वे भविष्य को लेकर अधिक चिंतित हो जाते हैं। इसके परिणामस्वरूप, बचत कम होती है, खरीदारी घटती है, आर्थिक गतिविधियां प्रभावित होती हैं और उपभोक्ता विश्वास कमजोर होता है।


सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि किसानों, उत्पादकों और उपभोक्ताओं के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। यदि कीमत नहीं बढ़ती तो किसानों को नुकसान होता है। यदि कीमत बढ़ती है तो उपभोक्ता प्रभावित होते हैं। ऐसे में सरकार को ऐसी नीतियां बनानी होंगी जो उत्पादन लागत कम करें जैसे-  पशु चारे पर सहायता, ईंधन लागत नियंत्रण, बेहतर सप्लाई चेन और दुग्ध प्रसंस्करण तकनीक में सुधार।


सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या आने वाले दिनों में महंगाई की यह रफ्तार थमेगी? आर्थिक परिस्थितियों को देखते हुए फिलहाल ऐसा आसान नहीं लगता। वैश्विक तनाव, ईंधन कीमतों में उतार-चढ़ाव और बढ़ती उत्पादन लागत आगे भी कीमतों को प्रभावित कर सकती है। हालांकि यदि सरकार और उद्योग मिलकर लागत कम करने के उपाय करें तो उपभोक्ताओं को राहत मिल सकती है।


दूध और बस किराये में प्रस्तावित वृद्धि केवल मूल्य संशोधन नहीं बल्कि आम आदमी के जीवन से जुड़ा बड़ा मुद्दा है। एक तरफ पशुपालकों और सेवा प्रदाताओं को राहत देने की आवश्यकता है तो दूसरी ओर उपभोक्ताओं की आर्थिक क्षमता भी सीमित है। महंगाई का बोझ धीरे-धीरे जीवन के हर क्षेत्र तक पहुंचता है। रसोई से लेकर सफर तक, हर जगह बढ़ते खर्च लोगों के बजट को प्रभावित करते हैं। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार और संबंधित संस्थाएं इस संतुलन को किस प्रकार बनाए रखती हैं, ताकि विकास और जनहित दोनों साथ चल सके।



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