बिहार सहित पूरे देश में 20 मई को दवा व्यापार बंद रहने की घोषणा ने स्वास्थ्य क्षेत्र और आम जनता दोनों का ध्यान आकर्षित किया है। यह बंद ऑल इंडिया ऑर्गेनाइजेशन ऑफ केमिस्ट्स एंड ड्रगिस्ट्स (AIOCD) के आह्वान पर किया जा रहा है, जिसे बिहार केमिस्ट्स एंड ड्रगिस्ट्स एसोसिएशन सहित विभिन्न राज्य संगठनों का समर्थन प्राप्त है। इस हड़ताल के पीछे कई गंभीर मुद्दे हैं, जिनमें अवैध ई-फार्मेसी संचालन, सरकारी अधिसूचनाओं का विरोध और बड़े कॉरपोरेट घरानों की बढ़ती दखल शामिल है।
इस देशव्यापी बंद का मुख्य उद्देश्य दवा व्यापारियों की उन मांगों को सामने लाना है, जिन्हें वे लंबे समय से उठा रहे हैं। अवैध ई-फार्मेसी का मुद्दा- दवा व्यापारियों का कहना है कि देश में कई ई-फार्मेसी प्लेटफॉर्म बिना स्पष्ट नियमों और लाइसेंसिंग के काम कर रहे हैं। इससे न केवल पारंपरिक मेडिकल स्टोरों पर असर पड़ रहा है, बल्कि मरीजों की सुरक्षा भी खतरे में पड़ सकती है। बिना डॉक्टर की पर्ची के दवाओं की ऑनलाइन बिक्री गंभीर स्वास्थ्य जोखिम पैदा कर सकती है।
28 अगस्त 2018 की अधिसूचना का विरोध- व्यापारी संगठन 28 अगस्त 2018 को जारी उस अधिसूचना का विरोध कर रहे हैं, जिसमें ई-फार्मेसी के लिए कुछ नियम प्रस्तावित किए गए थे। उनका मानना है कि यह अधिसूचना पूरी तरह से स्पष्ट और संतुलित नहीं है तथा इससे छोटे व्यापारियों के हितों की अनदेखी होती है। जीएसआर 220 (ई) अधिसूचना की वापसी की मांग- 26 मार्च 2020 को जारी जीएसआर 220 (ई) अधिसूचना के तहत दवा वितरण से जुड़े कुछ प्रावधानों में बदलाव किए गए थे। दवा व्यापारी इसे अपने व्यवसाय के लिए हानिकारक मानते हैं और इसकी वापसी की मांग कर रहे हैं।
कॉरपोरेट कंपनियों का दबाव- बड़े कॉरपोरेट समूहों द्वारा ‘शिकारी मूल्य निर्धारण’ (Predatory Pricing) को भी हड़ताल का एक प्रमुख कारण बताया गया है। दवा व्यापारियों का आरोप है कि बड़ी कंपनियां अत्यधिक छूट देकर बाजार पर कब्जा करना चाहती हैं, जिससे छोटे और मध्यम स्तर के केमिस्ट दुकानदारों का अस्तित्व खतरे में पड़ रहा है।
बिहार में इस हड़ताल का व्यापक प्रभाव देखने को मिल सकता है। राज्य में हजारों दवा दुकानें एक दिन के लिए बंद रहेगी। बिहार केमिस्ट्स एंड ड्रगिस्ट्स एसोसिएशन के प्रशासनिक सचिव तरुण कुमार के अनुसार, यह बंद पूरी तरह से शांतिपूर्ण रहेगा और इसका उद्देश्य सरकार तक अपनी आवाज पहुंचाना है। हालांकि, कुछ आवश्यक सेवाओं जैसे अस्पतालों के भीतर की दवा दुकानों को आंशिक छूट दी जा सकती है, ताकि आपातकालीन मरीजों को परेशानी न हो।
दवा व्यापार बंद का सबसे बड़ा असर आम लोगों पर पड़ सकता है, खासकर उन मरीजों पर जो रोजाना दवाओं पर निर्भर हैं। नियमित दवाएं लेने वाले मरीजों को पहले से दवा खरीदने की सलाह दी जा रही है। आपात स्थिति में दवाओं की उपलब्धता सीमित हो सकती है। ग्रामीण क्षेत्रों में इसका असर अधिक गंभीर हो सकता है, जहां पहले से ही स्वास्थ्य सुविधाएं सीमित हैं, इसलिए स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि लोगों को घबराने की जरूरत नहीं है, बल्कि पहले से तैयारी कर लेना ही बेहतर विकल्प है।
यह हड़ताल केवल एक दिन का विरोध नहीं है, बल्कि यह सरकार और दवा व्यापारियों के बीच लंबे समय से चल रहे मतभेदों का परिणाम है। सरकार जहां डिजिटल स्वास्थ्य सेवाओं और ई-फार्मेसी को बढ़ावा देना चाहती है, वहीं पारंपरिक दवा विक्रेता इसे अपने अस्तित्व के लिए खतरा मानते हैं। इस टकराव में संतुलन बनाना बेहद जरूरी है, ताकि तकनीकी प्रगति के साथ-साथ छोटे व्यापारियों के हित भी सुरक्षित रह सकें।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस समस्या का समाधान संवाद और संतुलित नीति निर्माण से ही संभव है। सरकार को ई-फार्मेसी के लिए स्पष्ट और सख्त नियम बनाने चाहिए। पारंपरिक दवा दुकानों को भी डिजिटल प्लेटफॉर्म से जोड़ने के प्रयास किए जा सकते हैं। कॉरपोरेट कंपनियों के लिए निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा के नियम लागू करने होंगे।
20 मई को होने वाला दवा व्यापार बंद केवल एक हड़ताल नहीं, बल्कि भारतीय स्वास्थ्य व्यवस्था और व्यापारिक संतुलन से जुड़ा एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। यह घटना दर्शाती है कि तकनीकी बदलाव और पारंपरिक व्यवसायों के बीच संतुलन बनाना कितना आवश्यक है। यदि सरकार और व्यापारी संगठन मिलकर समाधान निकालते हैं, तो यह न केवल व्यापारियों बल्कि आम जनता के हित में भी होगा।
