पेट के कीड़ों की दवा एल्बेंडाजोल जांच में हुई फेल

Jitendra Kumar Sinha
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उत्तर प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में मरीजों को वितरित की जाने वाली एल्बेंडाजोल 400 एमजी टैबलेट के सात बैच गुणवत्ता जांच में फेल पाए जाने के बाद स्वास्थ्य विभाग में हड़कंप मच गया है। यह दवा मुख्य रूप से पेट के कीड़े (कृमि संक्रमण) खत्म करने के लिए दी जाती है और बच्चों से लेकर वयस्कों तक में इसका व्यापक उपयोग होता है। जांच में दवा के निर्धारित मानकों पर खरी न उतरने के बाद उत्तर प्रदेश मेडिकल सप्लाइज कॉरपोरेशन लिमिटेड (UPMSCL) ने दवा आपूर्ति करने वाली कंपनी एफी पैरेंट्रल्स के खिलाफ बड़ी कार्रवाई करते हुए उसे तीन वर्ष के लिए ब्लैकलिस्ट कर दिया है।


सरकारी अस्पतालों में सप्लाई की गई एल्बेंडाजोल टैबलेट के कुछ बैचों की नियमित गुणवत्ता जांच कराई गई थी। लैब परीक्षण में पाया गया कि सात बैच निर्धारित गुणवत्ता मानकों को पूरा नहीं करते। इसके बाद संबंधित बैचों को उपयोग से रोकने और बाजार से हटाने की प्रक्रिया शुरू की गई। जांच रिपोर्ट मिलने के बाद यूपीएमएससीएल ने तत्काल कार्रवाई करते हुए कंपनी को नोटिस जारी किया और जवाब से संतुष्ट न होने पर उसे ब्लैकलिस्ट कर दिया। अब यह कंपनी अगले तीन वर्षों तक यूपीएमएससीएल की किसी भी दवा खरीद या आपूर्ति प्रक्रिया में भाग नहीं ले सकेगी।


एल्बेंडाजोल एक अत्यंत महत्वपूर्ण दवा है, जिसका उपयोग पेट में मौजूद विभिन्न प्रकार के कीड़ों को खत्म करने के लिए किया जाता है। भारत में बच्चों में कृमि संक्रमण एक आम समस्या है, जिसके कारण कुपोषण, कमजोरी, पेट दर्द, खून की कमी और पढ़ाई में एकाग्रता की कमी जैसी समस्याएं हो सकती हैं। राष्ट्रीय स्तर पर समय-समय पर चलाए जाने वाले कृमि मुक्ति अभियान में भी यही दवा बड़े पैमाने पर वितरित की जाती है। इसलिए इसकी गुणवत्ता में किसी भी प्रकार की कमी सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर चिंता का विषय मानी जाती है।


जब कोई दवा गुणवत्ता जांच में फेल होती है तो इसका अर्थ यह हो सकता है कि दवा में सक्रिय तत्व (Active Ingredient) निर्धारित मात्रा में नहीं है। दवा सही तरीके से घुल नहीं रही है। निर्माण प्रक्रिया में त्रुटि हुई है। दवा की प्रभावशीलता प्रभावित हो सकती है। भंडारण या पैकेजिंग में कमी हो सकती है। हालांकि यह जरूरी नहीं कि ऐसी दवा तुरंत नुकसान पहुंचाए, लेकिन उसकी उपचार क्षमता कम या समाप्त हो सकती है, जिससे मरीज को अपेक्षित लाभ नहीं मिलता।


यूपीएमएससीएल ने मामले को गंभीरता से लेते हुए दवा के संबंधित सात बैचों की आपूर्ति रोक दी गई। अस्पतालों को इन्हें उपयोग न करने के निर्देश दिए गए। कंपनी एफी पैरेंट्रल्स को तीन साल के लिए ब्लैकलिस्ट किया गया। भविष्य की खरीद प्रक्रियाओं से कंपनी को बाहर कर दिया गया। आवश्यकतानुसार अन्य कानूनी और वित्तीय कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू की गई। यह कार्रवाई इस बात का संकेत है कि सरकारी खरीद प्रणाली में गुणवत्ता मानकों से समझौता नहीं किया जाएगा।


विशेषज्ञों के अनुसार यदि किसी मरीज ने इन बैचों की दवा ली है तो घबराने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन यदि उपचार के बाद भी कीड़ों की समस्या बनी हुई है, तो चिकित्सक से दोबारा सलाह लेना उचित होगा। सरकारी अस्पतालों में आने वाले अधिकांश मरीज आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग से होते हैं और वे पूरी तरह सरकारी दवाओं पर निर्भर रहते हैं। ऐसे में दवाओं की गुणवत्ता सुनिश्चित करना स्वास्थ्य व्यवस्था की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।


यह मामला सरकारी दवा खरीद और निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल खड़े करता है। विशेषज्ञों का कहना है कि केवल खरीद प्रक्रिया ही नहीं, बल्कि नियमित सैंपलिंग, लैब परीक्षण और सप्लाई चेन की निगरानी को और मजबूत करने की जरूरत है। यदि गुणवत्ता जांच समय पर न होती, तो यह दवा लंबे समय तक मरीजों को दी जाती रहती। इसलिए निगरानी तंत्र का सक्रिय होना एक सकारात्मक पहलू भी माना जा रहा है।


स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए दवा निर्माण इकाइयों का नियमित ऑडिट हो। हर बैच की स्वतंत्र लैब जांच अनिवार्य हो। अस्पताल स्तर पर भी रैंडम सैंपलिंग की जाए। दोषी कंपनियों पर कड़ी आर्थिक और कानूनी कार्रवाई हो। मरीजों को शिकायत दर्ज कराने की सरल व्यवस्था मिले।


एल्बेंडाजोल 400 एमजी टैबलेट के सात बैचों का गुणवत्ता जांच में फेल होना केवल एक दवा का मामला नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य सुरक्षा से जुड़ा गंभीर मुद्दा है। यूपीएमएससीएल द्वारा कंपनी को ब्लैकलिस्ट करना एक सख्त संदेश है कि सरकारी अस्पतालों में दी जाने वाली दवाओं की गुणवत्ता से कोई समझौता स्वीकार नहीं किया जाएगा। अब जरूरत इस बात की है कि दवा निगरानी प्रणाली को और अधिक पारदर्शी, वैज्ञानिक और जवाबदेह बनाया जाए ताकि मरीजों का भरोसा बना रहे और उन्हें सुरक्षित एवं प्रभावी उपचार मिल सके।



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