चीन ने अंतरिक्ष में भेजा ‘आर्टिफिशियल इंसानी भ्रूण’

Jitendra Kumar Sinha
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मानव सभ्यता हजारों वर्षों से पृथ्वी पर विकसित हुई है। यहां का गुरुत्वाकर्षण, वातावरण, जलवायु और जैविक परिस्थितियां इंसानी जीवन की बुनियाद रही हैं। लेकिन जैसे-जैसे विज्ञान आगे बढ़ रहा है, वैसे-वैसे यह सवाल भी गहराता जा रहा है कि क्या मानव जाति हमेशा पृथ्वी तक सीमित रहेगी? यदि भविष्य में पृथ्वी किसी वैश्विक आपदा, जलवायु संकट, क्षुद्रग्रह टकराव या संसाधनों की कमी का सामना करे, तो क्या इंसान किसी दूसरे ग्रह पर जाकर अपनी सभ्यता कायम रख सकेगा? इसी सवाल का जवाब खोजने के लिए चीन ने एक ऐसा प्रयोग शुरू किया है जिसने दुनिया के वैज्ञानिकों को हैरान कर दिया है। अब तक अंतरिक्ष में इंसान, रोबोट, उपग्रह और प्रयोगशालाएं भेजी जाती थी, लेकिन पहली बार चीन ने आर्टिफिशियल इंसानी भ्रूण को अंतरिक्ष में भेजा है। यह प्रयोग केवल वैज्ञानिक जिज्ञासा नहीं है बल्कि मानव इतिहास की दिशा बदलने वाला कदम माना जा रहा है।


चीन ने अपने कार्गो अंतरिक्ष मिशन तियानझोऊ-10 के जरिए कई वैज्ञानिक प्रयोगों को अपने स्पेस स्टेशन तक पहुंचाया। इन्हीं प्रयोगों में सबसे चर्चित रहा कृत्रिम मानव भ्रूण पर अध्ययन। इस मिशन का मुख्य उद्देश्य केवल अंतरिक्ष स्टेशन को खाद्य सामग्री या उपकरण पहुंचाना नहीं था, बल्कि भविष्य की अंतरिक्ष सभ्यता की संभावनाओं को जांचना भी था। वैज्ञानिक यह समझना चाहते हैं कि क्या अंतरिक्ष में मानव विकास संभव है? क्या शून्य गुरुत्वाकर्षण में भ्रूण सामान्य रूप से विकसित हो सकता है? कॉस्मिक रेडिएशन का प्रभाव क्या होगा? क्या भविष्य में चंद्रमा या मंगल ग्रह पर जन्म संभव होगा? ये प्रश्न आज विज्ञान कथा जैसे लगते हैं, लेकिन चीन इन्हें प्रयोगशाला में बदल रहा है।


इस प्रयोग को लेकर सबसे बड़ी गलतफहमी यही है कि चीन ने "असली मानव बच्चा" अंतरिक्ष में भेज दिया है। ऐसा नहीं है। प्रोजेक्ट मैनेजर यू लेकियान के अनुसार, वैज्ञानिक स्टेम सेल्स की मदद से एक ऐसा ढांचा तैयार करते हैं जो शुरुआती मानव भ्रूण जैसा व्यवहार करता है। इसे वैज्ञानिक भाषा में "Embryo-like Structure" कहा जाता है। इनकी कुछ विशेषताएं होती हैं. यह शुरुआती भ्रूण की तरह कोशिकीय गतिविधि दिखाता है। कोशिकाओं का विभाजन होता है। जैविक संकेत उत्पन्न होते हैं और विकास के शुरुआती चरणों की नकल करता है। लेकिन इनमें वास्तविक इंसान बनने की क्षमता नहीं होती है। इसलिए यह नैतिक और कानूनी विवादों से कुछ हद तक बच जाता है।


स्टेम सेल्स मानव शरीर की ऐसी कोशिकाएं हैं जो विभिन्न प्रकार की कोशिकाओं में बदल सकती हैं। इन्हें शरीर की “मास्टर सेल्स” भी कहा जाता है। वैज्ञानिक विशेष परिस्थितियों में इन्हें नियंत्रित करके विभिन्न जैविक संरचनाएं तैयार कर सकते हैं। प्रक्रिया कुछ इस प्रकार काम करती है कि पहले स्टेम सेल्स को लैब में विकसित किया जाता है। फिर उन्हें खास जैव-रासायनिक संकेत दिए जाते हैं। इसके बाद कोशिकाएं स्वयं एक संरचना बनाने लगती हैं जो प्राकृतिक भ्रूण जैसी दिखती है। यहीं से वैज्ञानिक मानव विकास के शुरुआती रहस्य समझने लगते हैं।


धरती पर हर जीव गुरुत्वाकर्षण के साथ विकसित हुआ है। लगभग 3.7 अरब वर्षों के विकासक्रम में शरीर की प्रत्येक कोशिका पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के अनुरूप ढली है। लेकिन अंतरिक्ष में स्थिति पूरी तरह बदल जाती है। मुख्य चुनौतियां हैं अंतरिक्ष में वस्तुएं लगभग भारहीन हो जाती हैं। जबकि शरीर में रक्त प्रवाह बदल जाता है। हड्डियां कमजोर होने लगती हैं। मांसपेशियां सिकुड़ती हैं और कोशिकाओं का व्यवहार बदलता है। यदि वयस्क शरीर प्रभावित होता है तो भ्रूण पर प्रभाव और भी गहरा हो सकता है।


पृथ्वी को उसका चुंबकीय क्षेत्र खतरनाक विकिरण से बचाता है। अंतरिक्ष में सौर विकिरण, गैलेक्सीय कॉस्मिक किरणें और उच्च ऊर्जा कण, सीधे जैविक संरचनाओं से टकराते हैं। ये डीएनए को नुकसान पहुंचा सकते हैं। भ्रूण जैसी संवेदनशील संरचना पर इसका असर बेहद गंभीर हो सकता है। धरती पर प्रयोगशाला में वैज्ञानिक तुरंत हस्तक्षेप कर सकते हैं। लेकिन अंतरिक्ष स्टेशन पर जगह सीमित, उपकरण सीमित और समय सीमित होता है। इसलिए वहां प्रयोग करना बहुत कठिन है।


यदि भविष्य में मानव जाति को मंगल या चंद्रमा पर बसना है, तो केवल लोगों को वहां भेजना पर्याप्त नहीं होगा। सभ्यता तब टिकेगी जब नई पीढ़ियां जन्म लें, बच्चे बड़े हों, समाज विकसित हो। यदि अगली पीढ़ी पैदा नहीं हो सकती, तो किसी ग्रह पर स्थायी बसावट संभव नहीं होगी। यही कारण है कि वैज्ञानिक इंसानी प्रजनन को अंतरिक्ष विज्ञान की सबसे महत्वपूर्ण चुनौती मानते हैं।


यह पहला मौका नहीं है जब अंतरिक्ष में प्रजनन से जुड़े प्रयोग हुए हों। वैज्ञानिक पहले इन जीवों पर अध्ययन कर चुके हैं चूहे, मछलिया, मेंढक, कीड़े, कीट। कुछ मामलों में भ्रूण बने भी। लेकिन समस्याएं सामने आईं। विकास बाधित हुआ, कोशिकाओं में असामान्य बदलाव आए, जन्म के बाद स्वास्थ्य प्रभावित हुआ, इंसानों के मामले में चुनौती कहीं अधिक जटिल है।


वैज्ञानिक मानते हैं कि भविष्य में मंगल मानव बसावट का सबसे बड़ा उम्मीदवार है। कारण- वहां दिन की अवधि पृथ्वी जैसी है, बर्फ मौजूद है, संसाधनों की संभावना है। लेकिन मंगल की अपनी समस्याएं है। गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी का केवल 38 प्रतिशत, पतला वातावरण, खतरनाक रेडिएशन और अत्यधिक ठंड। यदि वहां बच्चों का जन्म ही संभव न हो तो पूरी योजना विफल हो सकती है।


जैसे ही चीन के प्रयोग की जानकारी सामने आई, नैतिक बहस भी शुरू हो गई। कई विशेषज्ञ सवाल उठा रहे हैं कि क्या मानव भ्रूण जैसी संरचनाओं का प्रयोग उचित है? क्या भविष्य में वास्तविक भ्रूण पर परीक्षण होंगे? क्या वैज्ञानिक सीमाएं पार कर रहे हैं? समर्थकों का कहना है कि यह शोध मानव अस्तित्व के भविष्य के लिए आवश्यक है। विरोधियों का तर्क है कि विज्ञान को कुछ सीमाएं नहीं लांघनी चाहिए।


चीन का यह प्रयोग केवल एक वैज्ञानिक परीक्षण नहीं है। यह मानव सभ्यता के उस भविष्य की झलक है जिसमें इंसान केवल पृथ्वी का प्राणी नहीं रहेगा। आज अंतरिक्ष में कृत्रिम भ्रूण भेज रहे हैं। कल शायद चंद्रमा पर बच्चे जन्म लें और आने वाले समय में मंगल पर नई सभ्यताएं बसे। लेकिन अभी रास्ता लंबा है। एक प्रश्न अभी भी बाकी है कि क्या इंसान वास्तव में पृथ्वी छोड़कर अंतरिक्ष में अपनी अगली पीढ़ी बसाने के लिए तैयार है? यह प्रश्न आने वाले दशकों में विज्ञान, नैतिकता और मानवता, तीनों की सबसे बड़ी परीक्षा बन सकता है।



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