भारतीय सिनेमा में कोर्टरूम ड्रामा हमेशा दर्शकों को आकर्षित करते रहे हैं, क्योंकि इनमें कानून, भावनाएं, सच्चाई और रहस्य का अनोखा मिश्रण देखने को मिलता है। फिल्म “सिस्टम” भी इसी श्रेणी की एक ऐसी कोर्टरूम थ्रिलर ड्रामा फिल्म है, जो केवल मनोरंजन नहीं करती बल्कि देश की न्याय व्यवस्था पर तीखा तंज भी कसती है। फिल्म की कहानी रहस्य, कानूनी दांव-पेच और मानवीय भावनाओं से बुनी गई है, जो दर्शकों को शुरुआत से अंत तक बांधे रखने की क्षमता रखती है। फिल्म में मुख्य भूमिकाओं में सोनाक्षी सिन्हा और ज्योतिका नजर आती हैं, जबकि निर्देशन की जिम्मेदारी अश्विनी अय्यर तिवारी ने संभाली है। अपनी संवेदनशील और यथार्थवादी फिल्मों के लिए पहचानी जाने वाली अश्विनी इस बार एक गंभीर और रहस्यमयी विषय लेकर आई हैं।
फिल्म की कहानी दो महिलाओं के इर्द-गिर्द घूमती है, जिनकी दुनिया और उद्देश्य अलग-अलग हैं, लेकिन उनकी किस्मतें एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं। पहला किरदार है नेहा राजवंश का, जो एक प्रतिभाशाली और सिद्धांतों पर चलने वाली वकील है। नेहा न्याय में गहरा विश्वास रखती है और उसका मानना है कि कानून का उद्देश्य केवल अपराधियों को सजा देना नहीं, बल्कि सच को सामने लाना भी है। दूसरी ओर सारिका है, जो दिल्ली की एक तेज-तर्रार और बेहद समझदार स्टेनोग्राफर है। अदालत की कार्यवाही को बेहद ध्यान से देखने वाली सारिका केवल एक सामान्य कर्मचारी नहीं है। उसके व्यक्तित्व में कुछ ऐसा है जो उसे रहस्यमयी बनाता है। धीरे-धीरे कहानी आगे बढ़ती है और दर्शकों को महसूस होने लगता है कि सारिका कुछ छिपा रही है। उसका अदालत में काम करना महज एक नौकरी नहीं, बल्कि इसके पीछे कोई बड़ा कारण है।
फिल्म का सबसे रोचक पहलू सारिका का छिपा हुआ मकसद है। शुरुआत में वह एक सामान्य और जिम्मेदार स्टेनोग्राफर नजर आती है, लेकिन समय के साथ उसके व्यवहार में कई ऐसे संकेत दिखाई देते हैं जो दर्शकों की जिज्ञासा बढ़ाते हैं। क्या वह किसी से बदला लेना चाहती है? क्या उसका अतीत न्याय व्यवस्था से जुड़ा हुआ है? या फिर वह किसी ऐसी सच्चाई को सामने लाने आई है जिसे वर्षों से दबाया गया है? इन सवालों का जवाब जानने के लिए दर्शकों को फिल्म के अंत तक इंतजार करना पड़ता है। यही रहस्य फिल्म को साधारण कोर्टरूम ड्रामा से अलग बनाता है।
फिल्म का शीर्षक “सिस्टम” अपने आप में बहुत कुछ कह देता है। यहां केवल किसी व्यक्ति या केस की बात नहीं होती है, बल्कि उस व्यवस्था की चर्चा होती है जिसमें आम आदमी अक्सर खुद को असहाय महसूस करता है। फिल्म यह दिखाने की कोशिश करती है कि किस प्रकार न्याय प्रक्रिया कई बार इतनी जटिल और लंबी हो जाती है कि सच कहीं पीछे छूट जाता है। अदालतों की तारीखें, तकनीकी प्रक्रियाएं और व्यवस्था की कमियां कई बार न्याय को कमजोर कर देती हैं। फिल्म सीधे तौर पर किसी संस्था पर हमला नहीं करती, लेकिन घटनाओं और संवादों के माध्यम से यह दर्शकों को सोचने पर मजबूर करती है कि क्या न्याय हमेशा समय पर मिलता है?
फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसके कलाकार हैं। सोनाक्षी सिन्हा ने नेहा राजवंश के किरदार में गंभीरता और आत्मविश्वास को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया है। एक वकील के रूप में उनका स्क्रीन प्रेजेंस मजबूत दिखाई देता है। वहीं ज्योतिका ने सारिका के किरदार को बेहद संतुलित तरीके से निभाया है। उनके चेहरे के भाव और संवादों की प्रस्तुति रहस्य को अंत तक बनाए रखती है। उन्होंने यह साबित किया है कि अभिनय में गहराई केवल बड़े संवादों से नहीं, बल्कि छोटे-छोटे हावभाव से भी दिखाई जा सकती है। दोनों अभिनेत्रियों की स्क्रीन केमिस्ट्री फिल्म को और अधिक प्रभावशाली बनाती है।
अश्विनी अय्यर तिवारी ने हमेशा सामाजिक और भावनात्मक विषयों पर काम किया है, लेकिन इस बार उन्होंने थ्रिल और रहस्य को कहानी में प्रभावी ढंग से पिरोया है। फिल्म की गति संतुलित है और कोर्टरूम के दृश्य वास्तविक लगते हैं। संवादों में गंभीरता है, लेकिन उनमें भावनात्मक गहराई भी दिखाई देती है। निर्देशन का सबसे अच्छा पहलू यह है कि फिल्म केवल रहस्य पर निर्भर नहीं रहती, बल्कि अपने सामाजिक संदेश को भी मजबूती से सामने रखती है।
“सिस्टम” केवल एक कोर्टरूम थ्रिलर नहीं है, बल्कि व्यवस्था, न्याय और छिपे हुए सच की कहानी है। यह फिल्म दर्शकों को रोमांच देने के साथ-साथ उन्हें सोचने पर भी मजबूर करती है। फिल्म का सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सिस्टम सच में न्याय देता है, या कभी-कभी सच्चाई को भी संघर्ष करना पड़ता है?
