बिहार की राजधानी पटना सहित राज्य के विभिन्न शहरों में सार्वजनिक परिवहन का एक महत्वपूर्ण साधन बन चुके ई-रिक्शा अब किराया वृद्धि की दिशा में बढ़ रहे हैं। ऑटो चालकों द्वारा किराया बढ़ाने की घोषणा के बाद ई-रिक्शा चालक भी उसी राह पर चलने की तैयारी में हैं। ऑल इंडिया रोड ट्रांसपोर्ट वर्कर्स फेडरेशन के प्रांतीय महासचिव राजकुमार झा ने स्पष्ट किया है कि जिन मार्गों पर ऑटो और ई-रिक्शा दोनों संचालित होते हैं, वहां दोनों का किराया समान रखा जाता है। ऐसे में ऑटो का किराया बढ़ने पर ई-रिक्शा चालकों द्वारा भी पांच से दस रुपये तक किराया बढ़ाने की संभावना है।
पिछले कुछ वर्षों में महंगाई लगातार बढ़ी है। वाहन संचालन से जुड़े लगभग सभी खर्चों में वृद्धि हुई है। ई-रिक्शा चालकों को बैटरी चार्जिंग, बैटरी बदलने, मरम्मत, टायर, पार्ट्स और अन्य रखरखाव संबंधी खर्चों का सामना करना पड़ता है। इसके अलावा दैनिक जीवन की बढ़ती लागत ने भी चालकों की आर्थिक स्थिति को प्रभावित किया है। चालकों का कहना है कि वर्तमान किराया दरें कई वर्षों से लगभग स्थिर हैं, जबकि खर्चों में लगातार बढ़ोतरी हुई है। ऐसे में उनकी आय और व्यय के बीच संतुलन बिगड़ता जा रहा है। इसलिए वे किराया बढ़ाने को अपनी आर्थिक मजबूरी बता रहे हैं।
शहरी क्षेत्रों में कई ऐसे रूट हैं जहां ऑटो और ई-रिक्शा दोनों एक ही दूरी तक यात्रियों को ले जाते हैं। यात्रियों की सुविधा और प्रतिस्पर्धा को ध्यान में रखते हुए दोनों वाहनों का किराया सामान्यतः समान रखा जाता है। यदि ऑटो का किराया बढ़ता है और ई-रिक्शा का नहीं, तो यात्रियों का झुकाव ई-रिक्शा की ओर बढ़ सकता है। वहीं यदि ई-रिक्शा का किराया अधिक हो जाए तो यात्री ऑटो को प्राथमिकता दे सकते हैं। इस कारण दोनों परिवहन साधनों के बीच किराए का संतुलन बनाए रखना आवश्यक माना जाता है।
क्षेत्रीय परिवहन प्राधिकार (आरटीए) और परिवहन विभाग ने फिलहाल चालकों को आधिकारिक स्वीकृति मिलने तक किराया नहीं बढ़ाने का निर्देश दिया है। विभाग का मानना है कि किराया वृद्धि का निर्णय व्यापक अध्ययन और जनहित को ध्यान में रखकर लिया जाना चाहिए। सरकारी स्वीकृति के बिना मनमाने तरीके से किराया बढ़ाने से यात्रियों को परेशानी हो सकती है। इसलिए विभाग इस विषय पर विचार-विमर्श और आवश्यक प्रक्रियाओं के बाद ही अंतिम निर्णय लेना चाहता है।
किराया वृद्धि का सबसे सीधा प्रभाव आम यात्रियों पर पड़ेगा। विशेष रूप से छात्र, नौकरीपेशा लोग, छोटे व्यवसायी और दैनिक मजदूर ऐसे वर्ग हैं जो प्रतिदिन ई-रिक्शा या ऑटो का उपयोग करते हैं। यदि प्रति यात्रा पांच से दस रुपये की वृद्धि होती है तो नियमित यात्रा करने वाले लोगों का मासिक खर्च काफी बढ़ सकता है। उदाहरण के लिए, यदि कोई व्यक्ति प्रतिदिन दो बार ई-रिक्शा का उपयोग करता है, तो उसके मासिक परिवहन खर्च में सैकड़ों रुपये की अतिरिक्त बढ़ोतरी हो सकती है। हालांकि दूसरी ओर यह भी सच है कि यदि चालकों की आय पर्याप्त नहीं होगी तो वे गुणवत्तापूर्ण सेवा देने में कठिनाई महसूस करेंगे। इसलिए यात्रियों और चालकों दोनों के हितों के बीच संतुलन बनाना आवश्यक है।
ई-रिक्शा आज केवल एक परिवहन साधन नहीं बल्कि हजारों परिवारों की आजीविका का आधार बन चुके हैं। पर्यावरण के अनुकूल होने के कारण इन्हें सरकार द्वारा भी प्रोत्साहित किया जाता रहा है। ये कम दूरी की यात्रा के लिए सस्ती और सुविधाजनक सेवा उपलब्ध कराते हैं। पटना जैसे शहरों में रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड, बाजार और आवासीय क्षेत्रों को जोड़ने में ई-रिक्शा की महत्वपूर्ण भूमिका है। इसलिए इनके संचालन से जुड़े किसी भी निर्णय का व्यापक सामाजिक और आर्थिक प्रभाव पड़ता है।
ई-रिक्शा चालकों द्वारा किराया बढ़ाने की मांग वर्तमान आर्थिक परिस्थितियों से जुड़ी एक वास्तविक समस्या को दर्शाती है। बढ़ती महंगाई और संचालन लागत के कारण चालक अतिरिक्त किराए की मांग कर रहे हैं, जबकि यात्रियों के लिए यह अतिरिक्त आर्थिक बोझ बन सकता है। ऐसे में परिवहन विभाग की जिम्मेदारी है कि वह सभी पक्षों से चर्चा कर एक संतुलित और न्यायसंगत समाधान निकाले। किराया वृद्धि का निर्णय केवल चालकों की आय बढ़ाने तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि इसमें आम जनता की सुविधा, शहरी परिवहन व्यवस्था की स्थिरता और आर्थिक संतुलन को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। तभी सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था सुचारु और सभी के लिए लाभकारी बनी रह सकेगी।
