राजनीति का बदलता स्वरूप - जब विचारधारा इंसानियत पर भारी पड़ने लगे

Jitendra Kumar Sinha
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मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। उसका जीवन केवल उसके व्यक्तिगत अस्तित्व तक सीमित नहीं होता है, बल्कि परिवार, समाज, राष्ट्र और सम्पूर्ण मानवता से जुड़ा होता है। इन्हीं संबंधों और व्यवस्थाओं को सुचारू रूप से संचालित करने के लिए विभिन्न प्रकार की नीतियाँ और व्यवस्थाएँ विकसित हुईं, जिनमें राजनीति का विशेष स्थान है। राजनीति का मूल उद्देश्य समाज और राज्य के हित में ऐसी व्यवस्था स्थापित करना था जिससे न्याय, समानता, सुरक्षा और विकास सुनिश्चित हो सके। प्राचीन भारतीय चिंतन में राजनीति को राजधर्म का अंग माना गया, जिसका केंद्र बिंदु जनकल्याण था।


किन्तु वर्तमान समय में राजनीति का स्वरूप तेजी से बदलता दिखाई दे रहा है। अब राजनीति केवल शासन चलाने का माध्यम नहीं रह गई है, बल्कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अपनी पैठ बना चुकी है। स्थिति यह है कि परिवारों से लेकर मित्रताओं तक, कार्यालयों से लेकर सामाजिक संगठनों तक, और यहां तक कि न्याय तथा शिक्षा जैसी संस्थाओं तक राजनीतिक सोच और राजनीतिक पक्षधरता का प्रभाव दिखाई देने लगा है।


समस्या राजनीति के अस्तित्व में नहीं है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब राजनीति विचारों के स्तर से निकलकर व्यक्ति के चरित्र का स्थायी हिस्सा बन जाती है। जब कोई व्यक्ति स्वयं को किसी विचारधारा, दल या नेता से इस सीमा तक जोड़ लेता है कि वह सत्य, न्याय और मानवता से अधिक महत्व अपने राजनीतिक पक्ष को देने लगे, तब राजनीति समाज के लिए विषधर का रूप धारण कर लेती है। आज यही स्थिति हमारे सामने खड़ी है।


राजनीति शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है- राज और नीति। अर्थात् राज्य को चलाने की नीति। इसका उद्देश्य समाज को दिशा देना, संसाधनों का न्यायपूर्ण वितरण करना और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना था। भारतीय इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं जहाँ राजनीति जनसेवा का पर्याय थी। राजा को प्रजा का पालक माना जाता था। कौटिल्य के अर्थशास्त्र से लेकर महात्मा गांधी के विचारों तक राजनीति का मूल आधार लोककल्याण ही रहा। महात्मा गांधी ने कहा था कि  "राजनीति धर्म से अलग नहीं हो सकती, क्योंकि धर्म का अर्थ मानवता और नैतिकता है।" लेकिन आज राजनीति का अर्थ बदल चुका है। अब राजनीति का संबंध अक्सर सत्ता, प्रभाव, प्रचार और व्यक्तिगत हितों से जोड़कर देखा जाने लगा है। राजनीतिक दलों का समर्थन करना या किसी विचारधारा से सहमत होना लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा है, लेकिन जब यह समर्थन अंधभक्ति में बदल जाता है, तब समस्या शुरू होती है। आज कई लोग सत्य और असत्य का निर्णय तथ्यों के आधार पर नहीं, बल्कि इस आधार पर करते हैं कि बात उनके पसंदीदा नेता या दल के पक्ष में है या विरोध में।


लोकतंत्र में विभिन्न विचारधाराओं का होना आवश्यक है। विविधता लोकतंत्र की शक्ति है। लेकिन जब विचारधारा व्यक्ति की पहचान बन जाती है, तब वह अन्य सभी मानवीय गुणों पर हावी होने लगती है। आज व्यक्ति का मूल्यांकन उसके चरित्र, ईमानदारी, परिश्रम और व्यवहार से कम तथा उसकी राजनीतिक निष्ठा से अधिक किया जाने लगा है। यदि कोई व्यक्ति आपके राजनीतिक विचारों से सहमत है, तो वह अच्छा माना जाता है। यदि असहमत है, तो उसकी हर अच्छाई भी संदेह के घेरे में आ जाती है। यह प्रवृत्ति समाज के लिए अत्यंत खतरनाक है क्योंकि इससे व्यक्ति स्वतंत्र सोचने की क्षमता खो देता है। वह यह नहीं सोचता कि क्या सही है और क्या गलत। वह केवल यह सोचता है कि उसके पक्ष ने क्या कहा है।


सभ्यता का विकास सत्य की खोज के कारण हुआ है। वैज्ञानिक खोजों से लेकर सामाजिक सुधारों तक, हर परिवर्तन सत्य को स्वीकार करने की क्षमता के कारण संभव हुआ। लेकिन वर्तमान समय में सत्य स्वयं संकट में दिखाई देता है। अब सत्य का मूल्य उसकी वास्तविकता से नहीं, बल्कि उसके राजनीतिक उपयोग से तय किया जाता है। यदि कोई तथ्य हमारे पक्ष में हो तो वह सत्य है। यदि वही तथ्य विरोधी पक्ष के पक्ष में चला जाए तो वह झूठ, षड्यंत्र या प्रचार बन जाता है। यह स्थिति अत्यंत चिंताजनक है। क्योंकि जब समाज सत्य से दूर होने लगता है, तब न्याय कमजोर पड़ जाता है और विवेक समाप्त होने लगता है। सत्य को स्वीकार करने का साहस लोकतंत्र की सबसे बड़ी आवश्यकता है। लेकिन आज सत्य से अधिक महत्वपूर्ण राजनीतिक सुविधा बन गई है।


कभी परिवार वह स्थान था जहाँ विभिन्न विचारों के लोग भी प्रेमपूर्वक रहते थे। मतभेद होते थे, लेकिन मनभेद नहीं होते थे। आज स्थिति बदल रही है। राजनीतिक बहसें परिवारों को विभाजित कर रही हैं। मित्रताएँ टूट रही हैं। रिश्तेदारों के बीच दूरी बढ़ रही है। सोशल मीडिया ने इस प्रवृत्ति को और तेज कर दिया है। एक पोस्ट, एक टिप्पणी या एक राजनीतिक मतभेद वर्षों पुराने संबंधों को समाप्त कर देता है। लोग अब यह नहीं देखते कि सामने वाला व्यक्ति वर्षों से उनका मित्र या परिजन है। वे केवल यह देखते हैं कि उसकी राजनीतिक सोच क्या है। यह स्थिति सामाजिक ताने-बाने को कमजोर कर रही है। समाज केवल विचारों से नहीं, बल्कि संबंधों से बनता है। जब संबंध कमजोर पड़ते हैं, तब समाज भी कमजोर हो जाता है।


सोशल मीडिया आधुनिक युग की सबसे प्रभावशाली शक्ति बन चुका है। इसने सूचना को लोकतांत्रिक बनाया है, लेकिन इसके साथ कई चुनौतियाँ भी पैदा हुई हैं। आज सोशल मीडिया का बड़ा हिस्सा राजनीतिक युद्धभूमि में बदल गया है। यहाँ तर्क कम और आरोप अधिक दिखाई देते हैं। संवाद कम और ट्रोलिंग अधिक होती है। तथ्य कम और भावनात्मक उत्तेजना अधिक होती है। लोग अपने विचारों से भिन्न किसी भी राय को सुनने के लिए तैयार नहीं होते। वे विरोधी विचारों को समझने के बजाय उन्हें अपमानित करने का प्रयास करते हैं। परिणामस्वरूप समाज में ध्रुवीकरण बढ़ रहा है। लोग अलग-अलग विचारधारात्मक खेमों में बंटते जा रहे हैं।


लोकतंत्र का आधार जागरूक नागरिक होता है। लेकिन जब नागरिक प्रश्न पूछना छोड़ देता है और केवल समर्थन या विरोध तक सीमित हो जाता है, तब लोकतंत्र कमजोर होने लगता है। अंधभक्ति किसी भी विचारधारा, दल या नेता के लिए खतरनाक है। क्योंकि अंधभक्ति व्यक्ति की विवेकशीलता को समाप्त कर देती है। ऐसा व्यक्ति अपने पसंदीदा पक्ष की हर गलती को सही ठहराने लगता है। वह नैतिकता के बजाय निष्ठा को महत्व देता है। इतिहास गवाह है कि अंधभक्ति ने अनेक समाजों को विनाश की ओर धकेला है। जहाँ प्रश्न पूछने की स्वतंत्रता समाप्त होती है, वहाँ लोकतंत्र भी धीरे-धीरे कमजोर पड़ जाता है।


किसी भी राष्ट्र की मजबूती उसकी न्याय व्यवस्था पर निर्भर करती है। न्याय तभी संभव है जब निर्णय तथ्यों और कानून के आधार पर लिए जाएँ। लेकिन जब समाज का बड़ा हिस्सा हर मुद्दे को राजनीतिक दृष्टि से देखने लगे, तब न्याय की अवधारणा भी प्रभावित होने लगती है। लोग किसी निर्णय की वैधता को उसके कानूनी आधार पर नहीं, बल्कि उसके राजनीतिक प्रभाव के आधार पर आंकने लगते हैं। यह प्रवृत्ति न्याय व्यवस्था के प्रति विश्वास को कमजोर कर सकती है। इसलिए आवश्यक है कि समाज न्याय और राजनीति के बीच संतुलन बनाए रखे।


मानवता का मूल आधार संवेदना है। दूसरों के दुख को समझना, उनकी सहायता करना और उनके प्रति करुणा रखना ही मनुष्य को श्रेष्ठ बनाता है। लेकिन जब राजनीति जीवन का केंद्र बन जाती है, तब संवेदनाएँ पीछे छूटने लगती हैं। दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं पर भी लोगों की पहली प्रतिक्रिया यह नहीं होती कि पीड़ित की सहायता कैसे की जाए। वे पहले यह देखने लगते हैं कि घटना से किस राजनीतिक पक्ष को लाभ या हानि होगी। यह सोच मानवता के लिए अत्यंत घातक है। क्योंकि जब दुख और पीड़ा भी राजनीतिक चश्मे से देखी जाने लगे, तब समाज अपनी आत्मा खोने लगता है।


विचारधाराएँ बदलती रहती हैं। सरकारें आती-जाती रहती हैं। नेता बदलते रहते हैं। लेकिन मानवता शाश्वत है। किसी भी सभ्य समाज की पहचान उसके राजनीतिक मतभेद नहीं, बल्कि उन मतभेदों के बावजूद बनी रहने वाली मानवीय संवेदनाएँ होती हैं। हम किसी विचार से असहमत हो सकते हैं, लेकिन किसी इंसान से घृणा करना आवश्यक नहीं है। हम राजनीतिक विरोधी हो सकते हैं, लेकिन मानवीय शत्रु नहीं। लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति इसी संतुलन में निहित है।


वर्तमान समय केवल राजनीतिक संघर्ष का समय नहीं है। यह मानवीय मूल्यों की परीक्षा का समय है। समाज को यह तय करना होगा कि वह राजनीति को अपने जीवन का साधन बनाएगा या अपना स्वामी। राजनीति आवश्यक है, लेकिन मानवता उससे कहीं अधिक आवश्यक है। विचारधारा महत्वपूर्ण है, लेकिन सत्य उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है। पक्षधरता स्वाभाविक है, लेकिन न्याय उससे ऊपर है। यदि हम राजनीति के कारण रिश्ते खो देंगे, संवेदनाएँ खो देंगे और सत्य को खो देंगे, तो अंततः हम स्वयं को भी खो देंगे। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि राजनीति को उसके उचित स्थान पर रखा जाए और मानवता को सर्वोच्च स्थान दिया जाए। क्योंकि अंत में इतिहास यह नहीं पूछेगा कि हम किस दल, नेता या विचारधारा के समर्थक थे। इतिहास यह पूछेगा कि कठिन समय में हमने इंसानियत को बचाया या नहीं और वास्तव में, इसी प्रश्न का उत्तर किसी समाज की सभ्यता का स्तर तय करता है।



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