सनातन संस्कृति की दृष्टि में प्रकृति, चेतना और मानव जीवन का संबंध

Jitendra Kumar Sinha
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विश्व पर्यावरण दिवस आज केवल एक अंतरराष्ट्रीय आयोजन या औपचारिक कार्यक्रम भर नहीं रह गया है। यह मानव सभ्यता के अस्तित्व, प्रकृति के संरक्षण और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से जुड़ा एक गंभीर विषय बन चुका है। संसार का प्रत्येक देश पर्यावरण संरक्षण के लिए नई-नई योजनाएँ बना रहा है। वैज्ञानिक जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग, वनों की कटाई, जल प्रदूषण, वायु प्रदूषण और जैव विविधता के विनाश पर चिंता व्यक्त कर रहे हैं। सरकारें करोड़ों-अरबों रुपये खर्च कर पर्यावरण संतुलन बनाए रखने का प्रयास कर रही हैं। किन्तु यदि हम भारतीय संस्कृति और विशेष रूप से सनातन परंपरा की ओर दृष्टि डालें, तो स्पष्ट होता है कि जिन सिद्धांतों को आज आधुनिक विश्व खोज रहा है, उन्हें हमारे ऋषि-मुनियों ने हजारों वर्ष पूर्व ही समझ लिया था। सनातन संस्कृति ने प्रकृति को केवल संसाधन नहीं माना, बल्कि उसे चेतन सत्ता और देवत्व का स्वरूप प्रदान किया। यही कारण है कि यहाँ पृथ्वी माता है, नदियाँ मातृस्वरूप हैं, पर्वत देवता हैं, वृक्ष पूजनीय हैं और समस्त जीव-जगत ईश्वर की सृष्टि का अभिन्न अंग माना गया है।


ऋग्वेद तथा अथर्ववेद में वर्णित "भूमि सूक्त" मानव और प्रकृति के संबंध का अद्भुत दर्शन प्रस्तुत करता है। हजारों वर्ष पूर्व रचित इस सूक्त में पृथ्वी को माता और मानव को उसका पुत्र बताया गया है। "माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः" अर्थात् पृथ्वी मेरी माता है और मैं उसका पुत्र हूँ। यह केवल एक धार्मिक वाक्य नहीं है, बल्कि पर्यावरणीय उत्तरदायित्व का सर्वोच्च संदेश है। जिस प्रकार कोई पुत्र अपनी माता का सम्मान करता है, उसकी रक्षा करता है और उसके प्रति कृतज्ञ रहता है, उसी प्रकार मानव को भी पृथ्वी के प्रति अपना कर्तव्य निभाना चाहिए। आज का आधुनिक समाज पृथ्वी को संसाधनों का भंडार मानकर उसका अंधाधुंध दोहन कर रहा है। परिणामस्वरूप प्राकृतिक संतुलन बिगड़ रहा है। वहीं सनातन संस्कृति हमें सिखाती है कि प्रकृति का उपयोग करो, लेकिन उसका शोषण मत करो।


दुनिया की अधिकांश सभ्यताओं ने प्रकृति को जीतने का प्रयास किया, जबकि भारत की सनातन संस्कृति ने प्रकृति के साथ सहअस्तित्व का मार्ग चुना। यहाँ सूर्य देव हैं, चंद्र देव हैं, अग्नि देव हैं, वायु देव हैं, वरुण देव हैं। वृक्षों को देवताओं का निवास स्थान माना गया है। पीपल, बरगद, तुलसी, नीम आदि वृक्षों की पूजा केवल धार्मिक परंपरा नहीं बल्कि पर्यावरण संरक्षण की वैज्ञानिक व्यवस्था भी है। जब किसी वस्तु को देवत्व का स्थान दिया जाता है तो उसके प्रति सम्मान स्वतः उत्पन्न होता है। यही कारण था कि भारतीय समाज सदियों तक प्रकृति के साथ संतुलित जीवन जीता रहा।


आज अधिकांश लोग पर्यावरण को केवल पेड़-पौधों, नदियों और वायु की स्वच्छता तक सीमित समझते हैं। जबकि भारतीय दर्शन में पर्यावरण का अर्थ कहीं अधिक व्यापक है। पर्यावरण केवल बाहरी वातावरण नहीं है, बल्कि मनुष्य का आंतरिक वातावरण भी है। यदि नदियाँ स्वच्छ हों लेकिन मनुष्य का मन प्रदूषित हो, तो समाज स्वस्थ नहीं बन सकता। यदि वृक्ष हरे-भरे हों लेकिन विचार हिंसा, द्वेष और स्वार्थ से भरे हों, तो मानवता का कल्याण संभव नहीं है। इसलिए भारतीय संस्कृति बाह्य और आंतरिक दोनों प्रकार की शुद्धता पर बल देती है।


आज संसार में जितनी समस्याएँ दिखाई देती हैं, उनके मूल में मानव मन का प्रदूषण है। लालच ने जंगलों को काटा। स्वार्थ ने नदियों को प्रदूषित किया। अहंकार ने युद्ध पैदा किए। लोभ ने प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन कराया। ईर्ष्या और द्वेष ने सामाजिक विषमता को जन्म दिया। यदि मनुष्य का मन शुद्ध होता, तो शायद पर्यावरण संरक्षण के लिए अलग से अभियान चलाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती।


भगवान बुद्ध ने कहा था कि मन ही सभी कर्मों का मूल है। गीता भी मन को मानव जीवन का मित्र और शत्रु दोनों बताती है। जब मन शुद्ध होता है तो व्यवहार भी शुद्ध होता है। और जब व्यवहार शुद्ध होता है तो प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता स्वतः विकसित होती है।


सनातन संस्कृति ने जीवन को चार महत्वपूर्ण आधारों पर स्थापित किया है। मनुष्य जैसा भोजन करता है, वैसा ही उसका मन बनता है। सात्विक भोजन केवल स्वास्थ्य ही नहीं देता, बल्कि मन को भी शांत और निर्मल बनाता है। जीवनशैली का पर्यावरण से सीधा संबंध है। अनावश्यक उपभोग, अपव्यय और विलासिता प्रकृति पर अतिरिक्त दबाव डालती है। संयमित जीवन पर्यावरण संरक्षण का सबसे प्रभावी उपाय है। विचार ही कर्म का आधार हैं। सकारात्मक और लोककल्याणकारी विचार समाज को सही दिशा देते हैं। यदि हमारा व्यवहार प्रकृति, समाज और अन्य जीवों के प्रति संवेदनशील है, तो पर्यावरण संरक्षण स्वतः संभव हो जाता है।


भारतीय संस्कृति का प्रत्येक पर्व और उत्सव प्रकृति से जुड़ा हुआ है। वट सावित्री में बरगद की पूजा। तुलसी विवाह में तुलसी का सम्मान। छठ पर्व में सूर्य और जल का पूजन। नाग पंचमी में सर्पों के संरक्षण का संदेश। गोवर्धन पूजा में पर्वत और गौवंश के प्रति कृतज्ञता। ये सभी परंपराएँ प्रकृति और मानव के बीच सामंजस्य स्थापित करने का माध्यम हैं।


औद्योगिक क्रांति के बाद विकास की परिभाषा बदल गई। उत्पादन और उपभोग को प्रगति का मापदंड मान लिया गया। परिणामस्वरूप वनों की कटाई बढ़ी। नदियाँ प्रदूषित हुई। वायु गुणवत्ता बिगड़ी। जैव विविधता संकट में आई। ग्लोबल वार्मिंग बढ़ी। आज स्थिति यह है कि वैज्ञानिक पृथ्वी के भविष्य को लेकर गंभीर चेतावनी दे रहे हैं। किन्तु केवल तकनीकी समाधान पर्याप्त नहीं हैं। जब तक मानव के भीतर नैतिक और आध्यात्मिक चेतना का विकास नहीं होगा, तब तक समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है।


सनातन संस्कृति का मूल सिद्धांत है "ईशावास्यमिदं सर्वम्" अर्थात् यह सम्पूर्ण जगत ईश्वर से व्याप्त है। जब हम प्रत्येक वस्तु में ईश्वर का अंश देखते हैं, तब उसके प्रति सम्मान और संरक्षण की भावना स्वतः विकसित होती है। यही आध्यात्मिक दृष्टिकोण पर्यावरण संरक्षण को केवल सरकारी योजना नहीं बल्कि व्यक्तिगत जिम्मेदारी बना देता है।


विश्व पर्यावरण दिवस का वास्तविक उद्देश्य केवल पौधारोपण, भाषण या औपचारिक कार्यक्रम नहीं होना चाहिए। इसका उद्देश्य मानव और प्रकृति के बीच टूटते संबंधों को पुनः स्थापित करना होना चाहिए। सनातन संस्कृति हमें सिखाती है कि पृथ्वी केवल भूमि नहीं, माता है; जल केवल संसाधन नहीं, जीवन है; वायु केवल गैस नहीं, प्राण है; और प्रकृति केवल उपयोग की वस्तु नहीं, बल्कि हमारे अस्तित्व का आधार है। पर्यावरण प्रदूषण से उत्पन्न अधिकांश समस्याओं का समाधान विज्ञान खोज सकता है, किन्तु मन और मस्तिष्क के प्रदूषण से उत्पन्न समस्याओं का समाधान केवल आत्मचिंतन, नैतिकता और आध्यात्मिकता से ही संभव है। यदि हम अपने आहार, विहार, विचार और व्यवहार को शुद्ध बनाने का संकल्प लें, अपने मन को निर्मल रखें, प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का भाव विकसित करें और सनातन संस्कृति के पर्यावरणीय दर्शन को जीवन में उतारें, तभी विश्व पर्यावरण दिवस मनाना वास्तव में सार्थक होगा। "पृथ्वी की रक्षा केवल पेड़ लगाने से नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर प्रकृति के प्रति सम्मान जगाने से होगी।"



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