देवताओं के नाम पर ली गई शपथ मान्य नहीं

Jitendra Kumar Sinha
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भारत एक लोकतांत्रिक गणराज्य है, जहाँ शासन व्यवस्था संविधान के अनुसार संचालित होती है। संविधान केवल कानूनों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह राष्ट्र के लोकतांत्रिक चरित्र, नागरिक अधिकारों और संस्थागत मर्यादाओं का आधार है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। वे जनता के विश्वास का प्रतिनिधित्व करते हैं और संविधान के प्रति अपनी निष्ठा व्यक्त करने के लिए विधिवत शपथ लेते हैं।


हाल ही में केरल हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए कहा कि स्थानीय निकायों के निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा कानून में निर्धारित प्रारूप से हटकर देवी-देवताओं अथवा अन्य व्यक्तियों के नाम पर ली गई शपथ वैध नहीं मानी जा सकती है। यह निर्णय केवल कानूनी दृष्टि से ही नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था, संवैधानिक मूल्यों और धर्मनिरपेक्षता के संदर्भ में भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।


यह मामला तिरुवनंतपुरम नगर निगम के कुछ पार्षदों से जुड़ा था। जानकारी के अनुसार, लगभग 20 पार्षदों ने निर्धारित प्रारूप के स्थान पर विभिन्न हिन्दू देवी-देवताओं, भारत माता, भारतंबा, गुरुदेव तथा कुछ राजनीतिक आंदोलनों के शहीदों के नाम पर शपथ ली थी। कानून में निर्धारित प्रारूप के अनुसार, निर्वाचित प्रतिनिधि या तो "ईश्वर की शपथ" लेते हैं अथवा "सत्यनिष्ठा से प्रतिज्ञान" करते हैं। लेकिन इन पार्षदों ने निर्धारित शब्दों के स्थान पर अन्य नामों का प्रयोग किया। इसके खिलाफ याचिका दायर की गई, जिस पर सुनवाई करते हुए केरल हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि शपथ का प्रारूप कानून द्वारा निर्धारित है और उसमें मनमाने ढंग से परिवर्तन नहीं किया जा सकता है।


लोकतंत्र में शपथ केवल एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं होती है। यह निर्वाचित प्रतिनिधि और संविधान के बीच एक नैतिक तथा कानूनी अनुबंध का प्रतीक होती है। जब कोई जनप्रतिनिधि शपथ लेता है, तो वह यह वचन देता है कि वह संविधान का सम्मान करेगा, अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से निर्वहन करेगा और कानून के दायरे में रहकर जनता की सेवा करेगा। यदि शपथ के प्रारूप में व्यक्ति अपनी पसंद के अनुसार बदलाव करने लगे, तो यह संवैधानिक प्रक्रिया की एकरूपता और वैधानिकता को प्रभावित कर सकता है। इसी कारण संविधान और विभिन्न कानूनों में शपथ का स्पष्ट प्रारूप निर्धारित किया गया है।


भारतीय संविधान के विभिन्न अनुच्छेदों तथा अनुसूचियों में राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, मंत्री, सांसद, विधायक, न्यायाधीश तथा अन्य संवैधानिक पदाधिकारियों के लिए शपथ के प्रारूप निर्धारित किए गए हैं। इन प्रारूपों में सामान्यतः दो विकल्प दिए जाते हैं पहला- "मैं ईश्वर की शपथ लेता हूँ।" और दूसरा- "मैं सत्यनिष्ठा से प्रतिज्ञान करता हूँ।" यह व्यवस्था इसलिए बनाई गई ताकि धार्मिक आस्था रखने वाले व्यक्ति ईश्वर की शपथ ले सकें और जो किसी विशेष धार्मिक विश्वास से नहीं जुड़े हैं, वे प्रतिज्ञान का विकल्प चुन सके। लेकिन किसी विशेष देवी-देवता, संत, महापुरुष, संगठन, राजनीतिक आंदोलन या अन्य व्यक्तियों का नाम जोड़ने की अनुमति कानून में नहीं दी गई है।


भारत का संविधान देश को एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के रूप में स्थापित करता है। धर्मनिरपेक्षता का अर्थ यह नहीं कि धर्म का विरोध किया जाए, बल्कि इसका अर्थ है कि राज्य सभी धर्मों के प्रति समान दृष्टिकोण रखे। यदि निर्वाचित प्रतिनिधियों को अपनी-अपनी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अलग-अलग देवी-देवताओं या धार्मिक प्रतीकों के नाम पर शपथ लेने की छूट दी जाए, तो इससे राज्य की धर्मनिरपेक्ष छवि प्रभावित हो सकती है। कल्पना कीजिए कि कोई व्यक्ति किसी विशेष देवी के नाम पर शपथ ले, दूसरा किसी संत के नाम पर, तीसरा किसी धार्मिक ग्रंथ के नाम पर और चौथा किसी राजनीतिक नेता के नाम पर। ऐसी स्थिति में शपथ की संवैधानिक एकरूपता समाप्त हो जाएगी। इसीलिए कानून ने एक सामान्य और सर्वमान्य प्रारूप निर्धारित किया है।


केरल हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया है कि शपथ कानून द्वारा निर्धारित प्रारूप में ही ली जानी चाहिए। निर्धारित शब्दों में मनमाना परिवर्तन स्वीकार्य नहीं है। किसी देवी-देवता, व्यक्ति, संगठन या अन्य नामों को जोड़ना वैधानिक प्रक्रिया के अनुरूप नहीं है। निर्वाचित प्रतिनिधियों को संविधान और कानून द्वारा निर्धारित व्यवस्था का पालन करना अनिवार्य है।


अदालत ने संबंधित पार्षदों द्वारा ली गई शपथ को अमान्य माना है और यह स्पष्ट संदेश दिया है कि संवैधानिक प्रक्रियाओं में व्यक्तिगत पसंद को कानून से ऊपर नहीं रखा जा सकता है।


इस मामले ने एक महत्वपूर्ण बहस को जन्म दिया है कि क्या किसी व्यक्ति की धार्मिक आस्था उसे शपथ के प्रारूप में परिवर्तन करने का अधिकार देती है? इस प्रश्न का उत्तर संविधान के ढांचे में निहित है। भारत में प्रत्येक नागरिक को अपनी धार्मिक मान्यताओं का पालन करने की स्वतंत्रता है। कोई व्यक्ति अपने निजी जीवन में किसी भी देवी-देवता, धर्मगुरु या आध्यात्मिक परंपरा का अनुसरण कर सकता है। लेकिन जब वह एक सार्वजनिक पद ग्रहण करता है, तब उसकी प्राथमिक निष्ठा संविधान और कानून के प्रति होती है। ऐसे में व्यक्तिगत आस्था को संवैधानिक प्रक्रिया के ऊपर नहीं रखा जा सकता।


लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति उसकी संस्थागत व्यवस्था होती है। यदि नियम सभी के लिए समान न हो, तो व्यवस्था में अराजकता पैदा हो सकती है। मान लीजिए कि शपथ के मामले में छूट दे दी जाए। तब भविष्य में कोई व्यक्ति किसी राजनीतिक दल, आंदोलन, संगठन या वैचारिक समूह के नाम पर भी शपथ लेने की मांग कर सकता है। ऐसी स्थिति लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता को प्रभावित कर सकती है। इसलिए नियमों का एक समान और निष्पक्ष होना आवश्यक है।


दुनिया के अधिकांश लोकतांत्रिक देशों में शपथ का एक निर्धारित प्रारूप होता है। कुछ देशों में धार्मिक शपथ का विकल्प होता है, जबकि कुछ में केवल प्रतिज्ञान की व्यवस्था है। लेकिन लगभग सभी देशों में शपथ के शब्द कानून द्वारा निर्धारित होते हैं और उनमें व्यक्तिगत संशोधन की अनुमति नहीं होती। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि सार्वजनिक पद ग्रहण करने वाले सभी व्यक्ति समान संवैधानिक मानकों का पालन करें।


केरल हाईकोर्ट का यह निर्णय केवल तिरुवनंतपुरम नगर निगम तक सीमित नहीं है। यह देशभर के निर्वाचित प्रतिनिधियों और सार्वजनिक पदाधिकारियों के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश है। यह फैसला बताता है कि संविधान सर्वोच्च है। व्यक्तिगत आस्था का सम्मान है, लेकिन सार्वजनिक दायित्व कानून के अनुसार निभाने होंगे। लोकतांत्रिक संस्थाओं की मर्यादा बनाए रखना सभी जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी है। संवैधानिक प्रक्रियाओं का पालन वैकल्पिक नहीं, बल्कि अनिवार्य है।


केरल हाईकोर्ट का निर्णय भारतीय लोकतंत्र की मूल भावना को मजबूत करने वाला माना जा सकता है। यह फैसला स्पष्ट करता है कि सार्वजनिक जीवन में संविधान और कानून सर्वोपरि हैं। धार्मिक आस्था प्रत्येक व्यक्ति का निजी विषय है, लेकिन जब बात संवैधानिक पद और सार्वजनिक दायित्व की आती है, तब निर्धारित नियमों का पालन करना अनिवार्य हो जाता है।


लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता है, बल्कि उन संस्थागत प्रक्रियाओं से चलता है जो सभी नागरिकों और जनप्रतिनिधियों के लिए समान रूप से लागू होती हैं। शपथ भी ऐसी ही एक प्रक्रिया है, जो संविधान के प्रति निष्ठा और लोकतांत्रिक मूल्यों के सम्मान का प्रतीक है। इस दृष्टि से देखा जाए तो केरल हाईकोर्ट का यह निर्णय केवल कानूनी आदेश नहीं है, बल्कि संविधान की सर्वोच्चता, धर्मनिरपेक्षता और लोकतांत्रिक अनुशासन की पुनर्पुष्टि है।



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