औद्योगिक प्रतिष्ठानों में कार्यरत कर्मचारियों की शिकायतों के त्वरित और निष्पक्ष समाधान के उद्देश्य से सरकार ने एक महत्वपूर्ण व्यवस्था लागू की है। अब ऐसे सभी औद्योगिक संस्थानों, जहां 20 या उससे अधिक कर्मचारी कार्यरत हैं, वहां शिकायत निवारण समिति (Grievance Redressal Committee) का गठन अनिवार्य होगा। यह कदम औद्योगिक संबंधों को मजबूत बनाने, कार्यस्थल पर पारदर्शिता बढ़ाने और कर्मचारियों के अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में अहम माना जा रहा है। यह प्रावधान औद्योगिक संबंध संहिता (Industrial Relations Code), 2020 के अनुरूप लागू किया जा रहा है, जिसका उद्देश्य नियोक्ता और कर्मचारियों के बीच बेहतर संवाद तथा विवादों का समय पर समाधान सुनिश्चित करना है।
नए नियमों के अनुसार, शिकायत निवारण समिति में नियोक्ता और कर्मचारियों के प्रतिनिधियों की संख्या समान होगी। समिति में कुल सदस्यों की संख्या 10 से अधिक नहीं होगी। इससे यह सुनिश्चित होगा कि दोनों पक्षों को समान अवसर मिले और किसी भी शिकायत पर निष्पक्ष विचार किया जा सके। नियोक्ता की ओर से समिति के सदस्यों का नामांकन संस्थान द्वारा किया जाएगा, जबकि कर्मचारियों के प्रतिनिधियों का चयन निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के अनुसार होगा। इस संतुलित व्यवस्था का उद्देश्य कार्यस्थल पर विश्वास और सहयोग का वातावरण तैयार करना है।
यदि किसी संस्थान में मान्यता प्राप्त नेगोशिएटिंग यूनियन कार्यरत है, तो कर्मचारियों के प्रतिनिधियों को नामित करने का अधिकार उसी यूनियन के पास होगा। वहीं, जहां नेगोशिएटिंग काउंसिल मौजूद होगी, वहां परिषद में शामिल प्रत्येक पंजीकृत ट्रेड यूनियन को उसके सदस्य श्रमिकों की संख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व मिलेगा। यदि किसी संस्थान में न तो नेगोशिएटिंग यूनियन है और न ही नेगोशिएटिंग काउंसिल, तो कर्मचारियों को अपने प्रतिनिधि स्वयं चुनने का अधिकार होगा। इस चुनाव की प्रक्रिया को सरल और पारदर्शी बनाने के लिए नियोक्ता ऑनलाइन या इलेक्ट्रॉनिक प्लेटफॉर्म का उपयोग भी कर सकता है। इससे डिजिटल माध्यमों के जरिए अधिक से अधिक कर्मचारियों की भागीदारी सुनिश्चित होगी।
नियमों में महिला कर्मचारियों के प्रतिनिधित्व को विशेष महत्व दिया गया है। शिकायत निवारण समिति के गठन में महिलाओं की उचित भागीदारी सुनिश्चित करने का प्रावधान रखा गया है। इसका उद्देश्य कार्यस्थल पर लैंगिक समानता को बढ़ावा देना और महिला कर्मचारियों की समस्याओं को संवेदनशीलता के साथ सुनना है। विशेषज्ञों का मानना है कि महिलाओं की भागीदारी बढ़ने से समिति अधिक समावेशी और प्रभावी बनेगी तथा कार्यस्थल पर सुरक्षित और सम्मानजनक वातावरण तैयार करने में मदद मिलेगी।
समिति के प्रत्येक सदस्य का कार्यकाल तीन वर्ष निर्धारित किया गया है। निश्चित कार्यकाल होने से समिति के सदस्य अपने दायित्वों का प्रभावी ढंग से निर्वहन कर सकेंगे और शिकायतों के समाधान की प्रक्रिया में निरंतरता बनी रहेगी। आवश्यकता पड़ने पर नए सदस्यों का चयन भी निर्धारित नियमों के तहत किया जाएगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि शिकायतों के समयबद्ध समाधान से कर्मचारियों और प्रबंधन के बीच विश्वास बढ़ेगा। इससे अनावश्यक विवाद, हड़ताल, असंतोष और कानूनी मामलों में कमी आएगी। कर्मचारी यदि अपनी समस्याओं को सीधे समिति के समक्ष रख सकेंगे, तो उनका समाधान संस्थान के भीतर ही संभव होगा, जिससे उत्पादकता और कार्यक्षमता में भी वृद्धि होगी। इसके अलावा, यह व्यवस्था श्रमिकों को न्यायसंगत और पारदर्शी प्रक्रिया उपलब्ध कराएगी तथा उद्योगों में सकारात्मक कार्य संस्कृति विकसित करने में सहायक होगी।
शिकायत निवारण समिति का अनिवार्य गठन श्रम सुधारों की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। इससे कर्मचारियों को अपनी समस्याएं रखने के लिए एक वैधानिक मंच मिलेगा, वहीं नियोक्ताओं को भी विवादों का समाधान संस्थान स्तर पर करने का अवसर प्राप्त होगा। समान प्रतिनिधित्व, डिजिटल चुनाव की सुविधा, महिलाओं की भागीदारी और स्पष्ट नियमों के कारण यह व्यवस्था औद्योगिक संबंधों को अधिक लोकतांत्रिक, पारदर्शी और उत्तरदायी बनाने की दिशा में प्रभावी साबित हो सकती है। आने वाले समय में इससे कार्यस्थलों पर विश्वास, सहयोग और उत्पादकता का नया वातावरण विकसित होने की उम्मीद है।

