कर्नाटक-महाराष्ट्र सीमा विवाद

Jitendra Kumar Sinha
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भारत में राज्यों के भाषाई पुनर्गठन के बाद से ही कई सीमा विवाद सामने आए, जिनमें से कर्नाटक और महाराष्ट्र के बीच का सीमा विवाद सबसे पुराना और संवेदनशील माना जाता है। वर्ष 1957 से शुरू हुआ यह विवाद आज भी दोनों राज्यों के बीच राजनीतिक और सामाजिक बहस का एक मुख्य मुद्दा बना हुआ है।


इस विवाद की जड़ें वर्ष 1956 के राज्य पुनर्गठन अधिनियम (States Reorganisation Act) में छिपी हैं। इस अधिनियम के तहत भाषाई आधार पर राज्यों की सीमाओं का निर्धारण किया गया था। इसके बाद, वर्ष 1957 में महाराष्ट्र सरकार ने तत्कालीन मैसूर राज्य (जिसे अब कर्नाटक के नाम से जाना जाता है) के साथ अपनी सीमाओं के पुनर्गठन की मांग की। महाराष्ट्र ने मुख्य रूप से बेलगावी (पूर्व में बेलगाम), कारवार और निप्पानी सहित कई अन्य सीमावर्ती गांवों पर अपना दावा पेश किया।


लंबे समय से चले आ रहे विवाद पर दोनों ही राज्यों के पास अपने-अपने मजबूत प्रशासनिक और ऐतिहासिक तर्क हैं। महाराष्ट्र का पक्ष है कि महाराष्ट्र सरकार का मुख्य तर्क भाषाई बहुलता पर आधारित है। उनका दावा है कि बेलगावी और उसके आस-पास के सीमावर्ती क्षेत्रों में मराठी भाषी लोगों की आबादी अधिक है, इसलिए इन क्षेत्रों को महाराष्ट्र का हिस्सा होना चाहिए। जबकि कर्नाटक का पक्ष है इसके विपरीत, कर्नाटक सरकार का रुख पूरी तरह से कानूनी और आधिकारिक रिपोर्टों पर टिका है। कर्नाटक का कहना है कि राज्य पुनर्गठन अधिनियम और 1967 के महाजन आयोग की रिपोर्ट के अनुसार जो सीमाएं तय की गई थीं, वे पूरी तरह से अंतिम (Final) हैं और उनमें अब कोई बदलाव नहीं किया जा सकता।


कर्नाटक ने बेलगावी पर अपने प्रशासनिक और वैधानिक नियंत्रण को समय-समय पर और मजबूत किया है। बेलगावी को राज्य का अभिन्न हिस्सा साबित करने और इस क्षेत्र के विकास को गति देने के लिए कर्नाटक सरकार ने एक बड़ा कदम उठाया।  सुवर्ण विधान सौधा का निर्माण- कर्नाटक सरकार ने बेलगावी में बेंगलुरु के विधान सौधा की तर्ज पर 'सुवर्ण विधान सौधा' (Suvarna Vidhana Soudha) नामक एक भव्य प्रशासनिक भवन का निर्माण कराया है। 


अपनी संप्रभुता और उपस्थिति को और मजबूत करने के लिए, कर्नाटक सरकार हर साल कम से कम एक बार अपने विधानमंडल (Legislature) का शीतकालीन सत्र इसी सुवर्ण विधान सौधा में आयोजित करती है। यह कदम यह साफ संदेश देता है कि कर्नाटक के लिए बेलगावी का मुद्दा पूरी तरह से गैर-परिवर्तनीय है।



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