भारतीय परिवेश में एक बड़ा ही मशहूर शब्द है “पलायन”। इसे बोलना जितना सरल होता है, समझना उतना ही कठिन और रोकना शायद प्रकृति के नियमों को चुनौती देने जैसा। संसार का प्रत्येक जीव बेहतर जीवन, अधिक सुरक्षा और अधिक अवसर की तलाश में स्थान बदलता है। यही परिवर्तन जब मनुष्य के जीवन में आता है तो वह पलायन कहलाता है। लेकिन पलायन केवल एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने का नाम नहीं है, बल्कि यह उस मानसिक, सामाजिक और आर्थिक स्थिति का परिणाम है जिसमें व्यक्ति अपने वर्तमान परिवेश से निराश होकर नए विकल्प तलाशने के लिए विवश हो जाता है।
पलायन के भीतर दो भाव एक साथ कार्य करते हैं “मजबूरी और अपेक्षा”। मजबूरी व्यक्ति को वर्तमान से दूर करती है और अपेक्षा उसे भविष्य की ओर ले जाती है। यही कारण है कि कई बार इंसान अपने गांव, शहर, समाज और यहां तक कि अपनी जड़ों से भी दूर चला जाता है। इतिहास गवाह है कि पलायन सभ्यताओं के निर्माण का भी कारण बना है और उनके पतन का भी। अंतर केवल इतना है कि कहीं पलायन अवसर बन गया और कहीं अभिशाप।
भारत में लंबे समय तक पलायन को केवल मजदूरों और रोजगार की समस्या से जोड़कर देखा गया। बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, ओडिशा और पूर्वोत्तर के अनेक राज्यों से लाखों लोग रोजगार की तलाश में महानगरों की ओर जाते रहे हैं। यह आर्थिक पलायन था। इसके पीछे गरीबी, बेरोजगारी और विकास का असंतुलन प्रमुख कारण थे। लेकिन इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में पलायन का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। अब केवल मजदूर नहीं, बल्कि डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, शोधकर्ता, शिक्षक और तकनीकी विशेषज्ञ भी बेहतर अवसरों की तलाश में संस्थान बदल रहे हैं। यह केवल नौकरी बदलना नहीं है, बल्कि प्रतिभा का पलायन है।
आज चिंता इस बात की नहीं है कि लोग स्थान बदल रहे हैं, चिंता इस बात की है कि देश की सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाएं भी अपने ही संस्थानों में स्वयं को असहज महसूस कर रही हैं। यदि राष्ट्र की सर्वाधिक प्रतिष्ठित वैज्ञानिक संस्थाएं भी इस समस्या से अछूती नहीं रही, तो यह केवल प्रशासनिक मुद्दा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चिंता का विषय है।
अक्सर यह माना जाता है कि पलायन का अर्थ एक शहर या देश छोड़ देना है। वास्तव में यह केवल उसका बाहरी रूप है। वास्तविक पलायन तब शुरू होता है जब व्यक्ति अपने वर्तमान वातावरण से मानसिक रूप से जुड़ाव खो देता है। जब उसे लगता है कि उसकी प्रतिभा का सम्मान नहीं हो रहा, उसकी मेहनत का उचित मूल्यांकन नहीं हो रहा, उसकी योग्यता के अनुरूप अवसर नहीं मिल रहे, तब उसके भीतर असंतोष जन्म लेता है। यही असंतोष धीरे-धीरे उसे नए विकल्पों की ओर ले जाता है।
कोई भी व्यक्ति जन्म से पलायनकारी नहीं होता है। वह परिस्थितियों के कारण ऐसा बनता है। यदि किसी संस्था में पारदर्शिता, सम्मान, विकास के अवसर और निष्पक्ष मूल्यांकन हो तो अधिकांश लोग उसी संस्था के साथ जुड़े रहना चाहते हैं। लेकिन जब व्यवस्था प्रतिभा से अधिक प्रक्रियाओं को महत्व देने लगे, जब योग्य व्यक्ति स्वयं को उपेक्षित महसूस करने लगे, तब पलायन लगभग स्वाभाविक हो जाता है।
भारत आज विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। डिजिटल क्रांति, स्टार्टअप संस्कृति, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अंतरिक्ष विज्ञान, रक्षा तकनीक और जैव प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में भारत ने उल्लेखनीय प्रगति की है। ऐसे समय में यह अपेक्षा थी कि देश की प्रतिभाएं अधिक से अधिक राष्ट्रीय संस्थानों से जुड़ेगी। लेकिन वास्तविकता कुछ अलग संकेत दे रही है।
आज का युवा केवल नौकरी नहीं चाहता है। वह ऐसा कार्यस्थल चाहता है जहां उसकी रचनात्मकता का सम्मान हो, निर्णय प्रक्रिया पारदर्शी हो, वरिष्ठों से संवाद हो, शोध के लिए स्वतंत्र वातावरण मिले और उसके योगदान को पहचान मिले। वेतन महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है सम्मान, अवसर और आत्मसंतोष।
यही कारण है कि आज प्रतिभाशाली युवा सरकारी संस्थानों की तुलना में निजी अनुसंधान संस्थानों, वैश्विक तकनीकी कंपनियों और स्टार्टअप्स की ओर अधिक आकर्षित हो रहे हैं। यह प्रवृत्ति केवल भारत में नहीं है, बल्कि पूरी दुनिया में दिखाई देती है। अंतर केवल इतना है कि विकसित देशों ने अपनी संस्थागत व्यवस्थाओं को समय के साथ बदला, जबकि भारत में अनेक संस्थान अभी भी पारंपरिक प्रशासनिक ढांचे में काम कर रहे हैं।
जब भी भारत की वैज्ञानिक उपलब्धियों की चर्चा होती है तो सबसे पहले भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन “इसरो” का नाम लिया जाता है। सीमित संसाधनों में असाधारण उपलब्धियां प्राप्त करना इस संस्था की पहचान रही है। आर्यभट्ट उपग्रह से लेकर चंद्रयान, मंगलयान, आदित्य मिशन और अंतरिक्ष प्रक्षेपण तकनीक तक इसरो ने विश्व को अनेक बार चौंकाया है। कम लागत में जटिल अंतरिक्ष मिशन पूरे करना इस संस्था की वैश्विक पहचान बन चुका है। आज अनेक देश अपने उपग्रहों के प्रक्षेपण के लिए भारत पर भरोसा करते हैं। इन सफलताओं के पीछे केवल तकनीक नही है, बल्कि हजारों वैज्ञानिकों, इंजीनियरों, तकनीशियनों और कर्मचारियों की दशकों की मेहनत छिपी है। इसलिए इसरो केवल एक संस्था नहीं है, बल्कि भारतीय वैज्ञानिक आत्मविश्वास का प्रतीक है।
इतनी सफल संस्था के संदर्भ में यदि प्रतिभाओं के पलायन की चर्चा होने लगे तो यह स्वाभाविक रूप से चिंता का विषय बन जाता है। यह कहना उचित नहीं होगा कि पूरा संस्थान संकट में है, क्योंकि आज भी हजारों वैज्ञानिक पूरी निष्ठा से कार्य कर रहे हैं। लेकिन यदि लगातार अनुभवी वैज्ञानिक या युवा शोधकर्ता बेहतर अवसरों के लिए संस्थान छोड़ने का निर्णय लेते हैं, तो इसे केवल व्यक्तिगत निर्णय कहकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।
किसी भी वैज्ञानिक संस्था की सबसे बड़ी पूंजी उसकी इमारतें या उपकरण नहीं होती है, बल्कि वहां कार्य करने वाले लोग होते हैं। यदि वही लोग स्वयं को असंतुष्ट महसूस करने लगे, तो दीर्घकाल में इसका प्रभाव अनुसंधान, नवाचार और संस्थागत संस्कृति पर पड़ना स्वाभाविक है।
यह प्रश्न महत्वपूर्ण है कि यदि आज प्रतिभा पलायन की चर्चा हो रही है तो पहले क्यों नहीं होती थी? इसके कई कारण हैं। पहला कारण यह है कि पहले सरकारी वैज्ञानिक संस्थान ही शोध और तकनीकी विकास के सबसे बड़े केंद्र थे। निजी क्षेत्र में अवसर सीमित थे। विदेश जाना भी आज जितना आसान नहीं था। इसलिए प्रतिभाशाली लोग संस्थान के भीतर ही अपने करियर का निर्माण करते थे। दूसरा कारण यह था कि उस समय सामाजिक प्रतिष्ठा सरकारी वैज्ञानिक बनने से जुड़ी थी। सीमित वेतन के बावजूद लोग अपने कार्य को राष्ट्रसेवा मानते थे। तीसरा कारण यह है कि प्रतिस्पर्धा अपेक्षाकृत कम थी। आज दुनिया पहले की तुलना में कहीं अधिक जुड़ी हुई है। वैश्विक कंपनियां भारतीय प्रतिभाओं को सीधे अवसर दे रही हैं। स्टार्टअप्स आकर्षक वेतन, बेहतर अनुसंधान वातावरण और तेज़ निर्णय प्रक्रिया उपलब्ध करा रहे हैं। आज के युवा के सामने विकल्प अधिक हैं। इसलिए वह समझौता करने के बजाय अवसर चुनता है।
नई पीढ़ी महत्वाकांक्षी है, लेकिन यह महत्वाकांक्षा केवल आर्थिक नहीं है। वह अपने कार्य का प्रभाव देखना चाहती है। वह निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी चाहती है। वह पारदर्शिता चाहती है। यदि उसे लगता है कि योग्यता से अधिक वरिष्ठता या औपचारिकता को महत्व दिया जा रहा है, तो उसका उत्साह कम होने लगता है।
युवा वैज्ञानिक यह भी चाहते हैं कि उनके शोध को शीघ्र स्वीकृति मिले, नवीन विचारों को प्रोत्साहन मिले और संस्थागत संरचना नवाचार के अनुकूल हो। यदि उन्हें बार-बार प्रशासनिक बाधाओं का सामना करना पड़े तो उनकी ऊर्जा का बड़ा हिस्सा शोध के बजाय प्रक्रियाओं में खर्च होने लगता है। यही वह बिंदु है जहां प्रतिभा और व्यवस्था के बीच दूरी पैदा होती है।
प्रतिभा का स्वभाव स्वतंत्र होता है। उसे निर्देशों की आवश्यकता होती है, लेकिन अनावश्यक नियंत्रण की नहीं। इतिहास बताता है कि महान खोजें हमेशा स्वतंत्र चिंतन के वातावरण में हुई हैं। यदि किसी वैज्ञानिक को यह महसूस हो कि उसके विचारों का मूल्यांकन निष्पक्ष नहीं हो रहा या उसकी प्रगति केवल औपचारिक प्रक्रियाओं पर निर्भर है, तो धीरे-धीरे उसका मनोबल प्रभावित होता है। ऐसे में वह वहां जाना पसंद करता है जहां उसके कार्य को अधिक महत्व मिले। इसका अर्थ यह नहीं कि अनुशासन आवश्यक नहीं है। बल्कि वैज्ञानिक संस्थानों में अनुशासन अत्यंत आवश्यक है। किंतु अनुशासन और अनावश्यक नौकरशाही के बीच एक स्पष्ट अंतर होता है। जहां यह अंतर समाप्त हो जाता है, वहीं से असंतोष जन्म लेने लगता है।
भारत वर्ष 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहा है। इस लक्ष्य की प्राप्ति केवल आर्थिक वृद्धि से संभव नहीं होगी। इसके लिए विज्ञान, तकनीक, अनुसंधान और नवाचार में विश्वस्तरीय नेतृत्व आवश्यक होगा। यदि देश की श्रेष्ठ प्रतिभाएं लगातार बेहतर अवसरों के लिए बाहर जाने लगे या राष्ट्रीय संस्थानों से दूरी बनाने लगे, तो यह केवल संस्थागत समस्या नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय विकास की गति को प्रभावित करने वाला प्रश्न बन सकता है। विकसित भारत का सपना तभी साकार होगा जब भारत केवल प्रतिभा पैदा ही नहीं करेगा, बल्कि उसे सम्मान, अवसर और नेतृत्व भी देगा।
किसी भी संस्था में कुछ लोगों का आना-जाना सामान्य प्रक्रिया है। लेकिन यदि प्रतिभा पलायन लगातार चर्चा का विषय बनने लगे तो उसे गंभीरता से समझना चाहिए। इसका उद्देश्य किसी संस्था की आलोचना नहीं, बल्कि उसकी मजबूती सुनिश्चित करना होना चाहिए। इसरो भारत का गौरव है और आगे भी रहेगा। लेकिन किसी भी महान संस्था की वास्तविक शक्ति उसकी उपलब्धियों से अधिक उसकी आत्मसुधार की क्षमता होती है। यदि समय रहते प्रतिभाओं की अपेक्षाओं को समझा जाए, चयन और पदोन्नति प्रक्रियाओं में पारदर्शिता बढ़ाई जाए, अनुसंधान के लिए स्वतंत्र वातावरण बनाया जाए तथा वैज्ञानिकों को सम्मानजनक कार्य-संस्कृति प्रदान की जाए, तो प्रतिभा पलायन की गति को निश्चित रूप से कम किया जा सकता है।
पलायन को केवल रोकना ही लक्ष्य नहीं होना चाहिए, बल्कि ऐसा वातावरण बनाना चाहिए जहां प्रतिभा स्वयं यह महसूस करे कि उसके सपनों को साकार करने के लिए सबसे उपयुक्त स्थान उसका अपना देश है। जब भारत अपनी प्रतिभाओं के लिए अवसर, सम्मान और विश्वास का सबसे बड़ा केंद्र बन जाएगा, तभी विकसित भारत का स्वप्न वास्तव में साकार होगा।
