क्या विकास की कीमत समाज बहुत महंगी चुका रहा है?

Jitendra Kumar Sinha
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तकनीकी विकास का उद्देश्य मानव जीवन को अधिक सुरक्षित, सरल और सुविधाजनक बनाना है। विज्ञान और नवाचार ने पिछले एक दशक में जिस गति से जीवन के लगभग हर क्षेत्र को प्रभावित किया है, वह अभूतपूर्व है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), इलेक्ट्रिक वाहन (EV), एथेनॉल मिश्रित ईंधन (E20), डिजिटल भुगतान, स्मार्ट परिवहन और इंटरनेट आधारित सेवाओं ने आधुनिक जीवन को नई दिशा दी है। लेकिन हर परिवर्तन अपने साथ कुछ अप्रत्याशित चुनौतियाँ भी लेकर आता है। यदि तकनीकी विकास के साथ मानवीय संवेदना, सामाजिक उत्तरदायित्व और आर्थिक संतुलन को न जोड़ा जाए, तो प्रगति का यह मार्ग धीरे-धीरे पतन की ओर भी ले जा सकता है। विकास केवल नई मशीनों, तेज रफ्तार या आधुनिक तकनीक का नाम नहीं है, विकास वह है जिसमें आम नागरिक का जीवन बेहतर हो, उसका समय बचे, उसका स्वास्थ्य सुरक्षित रहे और उसकी आजीविका भी प्रभावित न हो।


आज शहरों में इलेक्ट्रिक वाहन तेजी से बढ़ रहे हैं। सरकारें इन्हें प्रदूषण कम करने का सबसे प्रभावी माध्यम मान रही है। दूसरी ओर E20 ईंधन को आयातित पेट्रोल पर निर्भरता कम करने और किसानों की आय बढ़ाने के उद्देश्य से बढ़ावा दिया जा रहा है। इन दोनों पहलों के पीछे नीयत सकारात्मक है, लेकिन इनके क्रियान्वयन में अनेक व्यावहारिक समस्याएँ भी सामने आ रही हैं। किसी भी नई तकनीक का मूल्यांकन केवल उसके लाभों से नहीं, बल्कि उसके सामाजिक प्रभावों से भी किया जाना चाहिए। यदि नई व्यवस्था आम जनता के लिए नई परेशानियाँ पैदा कर दे, तो उस पर गंभीर समीक्षा आवश्यक हो जाती है।


एथेनॉल मिश्रित E20 ईंधन का उद्देश्य कार्बन उत्सर्जन कम करना और पेट्रोल में जैव ईंधन का उपयोग बढ़ाना है। इससे गन्ना किसानों को अतिरिक्त बाजार मिलने की संभावना भी है। लेकिन अनेक वाहन मालिकों ने शिकायत की है कि पुराने मॉडल के वाहनों में E20 के उपयोग से इंजन संबंधी समस्याएँ बढ़ रही है। कुछ सर्विस सेंटरों में ऐसे मामलों की संख्या पहले की तुलना में अधिक दिखाई दे रही है। हालांकि यह समस्या सभी वाहनों में नहीं है और इसका प्रभाव वाहन के मॉडल, इंजन डिजाइन तथा निर्माता की अनुशंसाओं पर निर्भर करता है। यही कारण है कि विशेषज्ञ लगातार सलाह देते हैं कि केवल वही वाहन E20 ईंधन का उपयोग करें जिन्हें निर्माता ने इसके लिए उपयुक्त घोषित किया हो। यदि नई नीति लागू की जाती है, तो उसके साथ उपभोक्ताओं को पर्याप्त जानकारी, तकनीकी सहायता और संक्रमण काल भी दिया जाना चाहिए अन्यथा आर्थिक बोझ सीधे आम नागरिक पर पड़ता है।


इलेक्ट्रिक ऑटो और ई-रिक्शा ने निश्चित रूप से वायु प्रदूषण और ध्वनि प्रदूषण को कम करने में योगदान दिया है। पहले डीजल और पेट्रोल चालित ऑटो से निकलने वाला धुआँ बड़े शहरों में सांस लेना कठिन बना देता था। आज स्थिति पहले से बेहतर दिखाई देती है। लेकिन दूसरी ओर एक नई समस्या तेजी से उभरी है। कम लागत और आसान संचालन के कारण बड़ी संख्या में ई-रिक्शा सड़कों पर उतर आए हैं। कई शहरों में इनके संचालन का कोई प्रभावी नियमन नहीं है। परिणामस्वरूप सड़कें अधिक भीड़भाड़ वाली हो गई हैं। छोटे-छोटे चौराहों पर जाम लगना सामान्य बात हो गई है। सार्वजनिक परिवहन की गति प्रभावित हुई है। दुर्घटनाओं की आशंका भी बढ़ी है। स्पष्ट है कि समस्या तकनीक नहीं, बल्कि उसके प्रबंधन की है।


आज महानगरों और बड़े शहरों में ट्रैफिक केवल यातायात की समस्या नहीं रह गया है। यह मानसिक स्वास्थ्य की भी समस्या बन चुका है। घंटों जाम में फँसना, तनाव बढ़ाता है। कार्यक्षमता घटाता है। पारिवारिक जीवन प्रभावित करता है और सड़क पर आक्रामक व्यवहार को बढ़ावा देता है। मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि लगातार ट्रैफिक तनाव व्यक्ति के व्यवहार में चिड़चिड़ापन, गुस्सा और अवसाद जैसी समस्याएँ पैदा कर सकता है।


तकनीक का उपयोग सुविधा के लिए होना चाहिए। लेकिन जब उसका दुरुपयोग शुरू हो जाता है, तो वही तकनीक समाज के लिए खतरा बन जाती है। हाल के वर्षों में ऐसे मोबाइल एप्लिकेशन और डिजिटल माध्यमों की चर्चा हुई है जिनका उपयोग इलेक्ट्रॉनिक वाहनों को बाधित करने या अन्य प्रकार की तकनीकी छेड़छाड़ के लिए किया जा सकता है। यदि किसी तकनीक का उपयोग अवैध हस्तक्षेप या सार्वजनिक सुरक्षा को खतरे में डालने के लिए किया जाए, तो यह गंभीर चिंता का विषय है। ऐसी परिस्थितियों में केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं होता है। साइबर सुरक्षा, डिजिटल जागरूकता और तकनीकी निगरानी भी उतनी ही आवश्यक हो जाती है।


हर नई तकनीक का सबसे बड़ा प्रभाव मध्यम वर्ग और निम्न आय वर्ग पर पड़ता है। यदि नया ईंधन महंगा पड़े, वाहन जल्दी खराब हो, बार-बार सर्विस करानी पड़े, बैटरी बदलनी पड़े, सड़कों पर समय अधिक लगे, तो इसका सीधा आर्थिक प्रभाव आम नागरिक पर पड़ता है। जिस विकास का उद्देश्य जीवन आसान बनाना था, वही विकास यदि अतिरिक्त खर्च का कारण बन जाए, तो स्वाभाविक रूप से असंतोष बढ़ता है।


सरकार की जिम्मेदारी केवल नई योजनाएँ लागू करना नहीं है। उसे यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि नई तकनीक वैज्ञानिक परीक्षणों के बाद लागू हो। जनता को पर्याप्त जानकारी मिले। वाहन निर्माताओं की जवाबदेही तय हो। ट्रैफिक प्रबंधन मजबूत बनाया जाए। ई-रिक्शा संचालन के स्पष्ट नियम हो। डिजिटल सुरक्षा कानून प्रभावी हो।


वाहन कंपनियों को भी केवल बिक्री बढ़ाने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यदि कोई नई तकनीक बाजार में लाई जाती है, तो ग्राहकों को स्पष्ट जानकारी देना, उचित वारंटी प्रदान करना और तकनीकी सहायता उपलब्ध कराना उनकी नैतिक जिम्मेदारी है।


हर समस्या के लिए केवल सरकार जिम्मेदार नहीं होती है। नागरिकों को भी ट्रैफिक नियमों का पालन करना चाहिए। प्रमाणित ईंधन का उपयोग करना चाहिए। अफवाहों के बजाय वैज्ञानिक जानकारी पर भरोसा करना चाहिए। तकनीक का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए। सड़क पर धैर्य और अनुशासन बनाए रखना चाहिए।


विकास का अर्थ केवल नई मशीनें नहीं होता। वास्तविक विकास वह है जिसमें पर्यावरण सुरक्षित रहे। अर्थव्यवस्था मजबूत हो। रोजगार बढ़े। तकनीक विश्वसनीय हो। नागरिकों का जीवन आसान बने। मानसिक शांति भी बनी रहे। यदि विकास केवल आँकड़ों में दिखाई दे और समाज तनाव, आर्थिक बोझ तथा अव्यवस्था से घिर जाए, तो उस विकास की दिशा पर पुनर्विचार आवश्यक हो जाता है।


तकनीकी विकास मानव सभ्यता की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है, लेकिन उसका उद्देश्य मनुष्य की सेवा होना चाहिए, न कि उसे नई समस्याओं के जाल में उलझाना। इलेक्ट्रिक वाहन हों, E20 ईंधन हो या डिजिटल तकनीक, इन सभी की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि उनका क्रियान्वयन कितना वैज्ञानिक, पारदर्शी और जनहितकारी है।


इतिहास गवाह है कि हर नई तकनीक अपने साथ अवसर और चुनौतियाँ दोनों लेकर आती है। बुद्धिमानी इसी में है कि हम तकनीक को अपनाएँ, लेकिन मानवीय संवेदना, सामाजिक संतुलन और आर्थिक न्याय को उसके केंद्र में रखें। जब विकास का पहिया पर्यावरण, अर्थव्यवस्था और मानव कल्याण, तीनों के साथ समान गति से आगे बढ़ेगा, तभी उसे वास्तविक प्रगति कहा जा सकेगा अन्यथा तकनीक की चकाचौंध में कहीं मानवता का चेहरा धुंधला पड़ जाएगा।



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