भारतीय लोकतंत्र में किसी भी पुलिस मुठभेड़ (एनकाउंटर) पर उठने वाले सवाल केवल एक व्यक्ति या एक घटना तक सीमित नहीं रहते हैं। वे सीधे-सीधे कानून के शासन, पुलिस व्यवस्था, सरकार की जवाबदेही और लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता से जुड़ जाते हैं। भरत तिवारी एनकाउंटर प्रकरण भी अब केवल एक कथित अपराधी की मौत का मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह राजनीतिक विमर्श, प्रशासनिक निष्पक्षता और न्यायिक प्रक्रिया की परीक्षा बन चुका है।
पूरे घटनाक्रम की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि केंद्र सरकार के दो मंत्री इस मामले में अलग-अलग रुख अपनाते दिखाई दिए। एक ओर केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी पुलिस की कार्रवाई को उचित बताते हुए पीड़ित परिवार से मिलने से भी इनकार करते हैं, वहीं दूसरी ओर केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान पीड़ित परिवार के घर पहुँचते हैं, घुटनों पर बैठकर श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं और केंद्रीय गृहमंत्री से निष्पक्ष जांच की मांग भी करते हैं। यही विरोधाभास इस प्रकरण को सामान्य कानून-व्यवस्था के मामले से आगे बढ़ाकर राजनीतिक और संवैधानिक बहस का विषय बना देता है।
लोकतांत्रिक सरकार में मतभेद असामान्य नहीं हैं। अलग-अलग नेताओं की अपनी राजनीतिक सोच और सामाजिक आधार हो सकता है। लेकिन जब किसी संवेदनशील मामले में सरकार के सहयोगी दलों के वरिष्ठ मंत्री सार्वजनिक रूप से अलग-अलग संदेश देने लगें, तब जनता के मन में स्वाभाविक रूप से प्रश्न उठते हैं। यदि पुलिस की कार्रवाई पूरी तरह उचित थी, तो निष्पक्ष जांच की मांग क्यों उठ रही है? और यदि जांच की आवश्यकता महसूस की जा रही है, तो फिर कार्रवाई को पहले से पूरी तरह सही घोषित करने की जल्दबाजी क्यों? यही वह बिंदु है जहाँ राजनीतिक बयानबाजी से अधिक महत्वपूर्ण तथ्य, साक्ष्य और निष्पक्ष जांच हो जाती है।
भारतीय राजनीति में अक्सर देखा गया है कि किसी भी बड़ी घटना के बाद राजनीतिक दल अपने-अपने सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों के अनुसार प्रतिक्रिया देते हैं। कहीं पुलिस का समर्थन किया जाता है, तो कहीं पीड़ित परिवार के साथ खड़े होने की कोशिश होती है।
भरत तिवारी प्रकरण में भी यही तस्वीर दिखाई देती है। एक पक्ष कानून-व्यवस्था को प्राथमिकता देता दिखाई देता है, जबकि दूसरा पक्ष न्यायिक प्रक्रिया और संवेदनशीलता पर जोर देता है। लोकतंत्र में दोनों दृष्टिकोणों का स्थान हो सकता है, लेकिन किसी भी निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले निष्पक्ष जांच सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।
भारत में पुलिस मुठभेड़ों को लेकर समय-समय पर बहस होती रही है। कई मामलों में अदालतों ने भी स्पष्ट किया है कि हर एनकाउंटर की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच आवश्यक है। किसी पुलिस कार्रवाई पर प्रश्न उठाना पुलिस विरोध नहीं माना जा सकता। उसी प्रकार बिना जांच पूरी हुए किसी कार्रवाई को पूरी तरह सही या पूरी तरह गलत घोषित करना भी उचित नहीं है। लोकतंत्र का मूल सिद्धांत यही है कि प्रत्येक घटना का परीक्षण तथ्यों और कानून के आधार पर हो।
यदि पुलिस की कार्रवाई सही है, तो निष्पक्ष जांच स्वयं पुलिस की विश्वसनीयता को और मजबूत करेगी। लेकिन यदि जांच में किसी प्रकार की प्रक्रिया संबंधी त्रुटि या कानून का उल्लंघन सामने आता है, तो उसके लिए भी जवाबदेही तय होनी चाहिए। कानून का शासन तभी मजबूत माना जाता है जब पुलिस भी कानून के दायरे में कार्य करे और आवश्यकता पड़ने पर उसकी कार्रवाई की भी जांच हो सके।
किसी भी लोकतांत्रिक सरकार की पहचान केवल विकास योजनाओं या राजनीतिक सफलताओं से नहीं होती है। उसकी असली परीक्षा संकट के समय होती है। जब किसी विवादित घटना पर सवाल उठते हैं, तब सरकार के सामने दो रास्ते होते हैं या तो केवल राजनीतिक बचाव किया जाए। या फिर निष्पक्ष जांच कराकर सच को सामने आने दिया जाए। दूसरा रास्ता कठिन अवश्य होता है, लेकिन लोकतंत्र को मजबूत भी वही करता है।
आज सूचना का युग है। सोशल मीडिया, डिजिटल मीडिया और चौबीस घंटे चलने वाले समाचार चैनलों के दौर में हर घटना तुरंत राष्ट्रीय बहस बन जाती है। ऐसे समय में केवल राजनीतिक बयान जनता का विश्वास नहीं जीत सकते। जनता जानना चाहती है कि घटना वास्तव में कैसे हुई? पुलिस ने कौन-सी प्रक्रिया अपनाई? क्या सभी कानूनी प्रावधानों का पालन हुआ? क्या स्वतंत्र जांच एजेंसी पूरे मामले की समीक्षा करेगी? इन सवालों के उत्तर केवल जांच से ही मिल सकते हैं।
हर संवेदनशील घटना के बाद राजनीतिक लाभ लेने की होड़ भी दिखाई देती है। लेकिन लोकतंत्र की मजबूती इसी में है कि न्याय को राजनीतिक लाभ से ऊपर रखा जाए। यदि किसी व्यक्ति ने अपराध किया है, तो उसे कानून के अनुसार दंड मिलना चाहिए। लेकिन यदि किसी सरकारी अधिकारी ने अपने अधिकारों का दुरुपयोग किया है, तो उसे भी समान रूप से कानून के प्रति जवाबदेह होना चाहिए। कानून का शासन इसी संतुलन पर आधारित होता है।
भारतीय संविधान किसी भी व्यक्ति, संस्था या सरकार से बड़ा है। मंत्री, सांसद, विधायक, पुलिस अधिकारी या सामान्य नागरिक, सभी संविधान और कानून के अधीन हैं। यही कारण है कि लोकतंत्र में अंतिम निर्णय राजनीतिक मंचों पर नहीं, बल्कि कानून और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर होना चाहिए।
भरत तिवारी एनकाउंटर का अंतिम सच क्या है, इसका उत्तर केवल निष्पक्ष और पारदर्शी जांच ही दे सकती है। जांच पूरी होने से पहले किसी भी पक्ष को पूर्णतः सही या गलत घोषित करना न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं होगा। यदि जांच में पुलिस की कार्रवाई उचित सिद्ध होती है, तो उसे स्वीकार किया जाना चाहिए। यदि किसी प्रकार की अनियमितता सामने आती है, तो कानून के अनुसार कार्रवाई भी उतनी ही निष्पक्ष होनी चाहिए।
भरत तिवारी एनकाउंटर ने एक बार फिर यह याद दिलाया है कि लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का नाम नहीं है। लोकतंत्र की असली ताकत संस्थाओं की विश्वसनीयता, कानून के शासन और न्यायिक निष्पक्षता में निहित होती है।
जब सरकार के दो मंत्री सार्वजनिक रूप से अलग-अलग संदेश दें, तब यह केवल राजनीतिक मतभेद का विषय नहीं रह जाता, बल्कि शासन व्यवस्था की विश्वसनीयता पर भी प्रश्न खड़े करता है। ऐसे समय में सरकार का दायित्व और बढ़ जाता है कि वह किसी भी प्रकार के राजनीतिक दबाव से ऊपर उठकर निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करे।
आज आवश्यकता किसी राजनीतिक विजय की नहीं, बल्कि न्याय की है। यदि सरकार वास्तव में कानून के शासन में विश्वास करती है, तो उसे यह सुनिश्चित करना होगा कि जांच पारदर्शी हो, प्रत्येक तथ्य सामने आए और जो भी दोषी हो, चाहे वह अपराधी हो या वर्दी में बैठा कोई अधिकारी, उसे कानून के अनुसार जवाबदेह बनाया जाए।
लोकतंत्र में सबसे बड़ा पद किसी मंत्री का नहीं होता है, बल्कि संविधान का होता है। सबसे बड़ी शक्ति सत्ता की नहीं, न्याय की होती है। यही सिद्धांत किसी भी लोकतांत्रिक राष्ट्र की सबसे बड़ी पहचान है और यही संदेश हर राजनीतिक दल तथा प्रत्येक जनप्रतिनिधि को सदैव स्मरण रखना चाहिए।
