तोहमत की राजनीति - आरोपों के सहारे कब तक चलेगी विपक्ष की राह?

Jitendra Kumar Sinha
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भारतीय राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप कोई नई बात नहीं है। लोकतंत्र में सत्ता और विपक्ष के बीच वैचारिक संघर्ष स्वाभाविक माना जाता है, लेकिन जब यह संघर्ष नीतियों, कार्यक्रमों और जनहित के मुद्दों से हटकर केवल तोहमतों, लांछनों और आरोपों तक सीमित हो जाता है, तब उसका परिणाम केवल राजनीतिक पराजय और सामाजिक विभाजन के रूप में सामने आता है। इतिहास इस बात का साक्षी है कि किसी व्यक्ति, संगठन या विचारधारा को लगातार दोषी ठहराकर स्वयं को नैतिक विजेता साबित करने की कोशिश अंततः उसी पक्ष को कमजोर करती है जो इस रणनीति को अपनाता है।


तोहमत अर्थात आरोप। आरोप लगाना आसान है, लेकिन उसके परिणामों का सामना करना कठिन होता है। किसी पर लांछन लगाना केवल शब्दों का प्रयोग नहीं होता है, बल्कि उसके पीछे ईर्ष्या, राजनीतिक लाभ, वैचारिक द्वेष और प्रतिस्पर्धा की भावना भी छिपी होती है। ऐसे में यदि आरोप तथ्यों से परे हो या उनका उद्देश्य केवल किसी वर्ग विशेष को बदनाम करना हो, तो प्रतिक्रिया भी उतनी ही तीखी होती है। राजनीति का यह सिद्धांत पुराना है कि अन्यायपूर्ण आरोपों का जवाब अंततः जनता अपने मत के माध्यम से देती है।


पिछले एक दशक में भारतीय राजनीति में एक नया शब्द बहुत प्रचलित हुआ है “गोदी मीडिया”। विपक्षी दलों और विशेष रूप से इंडी गठबंधन के घटकों ने बार-बार राष्ट्रीय मीडिया के एक बड़े हिस्से को इस नाम से संबोधित किया। उनका तर्क था कि मीडिया का एक वर्ग सरकार समर्थक भूमिका निभा रहा है और सत्ता से कठिन प्रश्न पूछने के बजाय उसका प्रचारक बन गया है।


लोकतंत्र में मीडिया की आलोचना करना गलत नहीं है। मीडिया भी एक संस्था है और उसकी निष्पक्षता पर सवाल उठाए जा सकते हैं। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब आलोचना का स्थान आरोप ले लेते हैं। जब हर असहमत पत्रकार, हर विरोधी विचार और हर वैकल्पिक दृष्टिकोण को एक ही श्रेणी में रखकर “गोदी मीडिया” घोषित कर दिया जाता है, तब यह विमर्श अपनी विश्वसनीयता खोने लगता है।


समय के साथ यह स्थिति बनी कि मीडिया के प्रति अविश्वास का यह अभियान केवल संस्थानों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि आम नागरिकों तक पहुँच गया। यदि कोई व्यक्ति सरकार की किसी नीति का समर्थन करता था तो उसे भी उसी श्रेणी में रख दिया जाता था। इस प्रकार राजनीतिक आरोप का दायरा बढ़ते-बढ़ते समाज तक पहुँच गया।


राजनीतिक दल अक्सर अपने समर्थकों को संगठित करने के लिए एक साझा विरोधी की तलाश करते हैं। कभी यह विरोधी कोई दल होता है, कभी कोई विचारधारा और कभी कोई सामाजिक वर्ग। लेकिन जब पूरी राजनीति “हम बनाम वे” के सिद्धांत पर आधारित हो जाती है, तब लोकतंत्र का मूल भाव कमजोर पड़ने लगता है।


भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में यह प्रवृत्ति और भी खतरनाक है। यहाँ धर्म, भाषा, क्षेत्र, जाति और संस्कृति की अनेक पहचानें मौजूद हैं। यदि राजनीति इन पहचानों को जोड़ने के बजाय विभाजित करने का माध्यम बन जाए तो सामाजिक सौहार्द प्रभावित होता है।


इंडी गठबंधन और उसके समर्थकों द्वारा बार-बार एक विशेष राजनीतिक नैरेटिव को आगे बढ़ाने का प्रयास किया गया। इसके तहत यह स्थापित करने की कोशिश हुई कि देश का एक बड़ा वर्ग लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ खड़ा है। लेकिन जब यह नैरेटिव वास्तविक सामाजिक अनुभवों से मेल नहीं खाता, तब जनता उसे अस्वीकार कर देती है।


भारतीय जनता पार्टी आज देश के अधिकांश राज्यों में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सत्ता का हिस्सा रही है। इसके बावजूद उसके आलोचक अक्सर यह प्रश्न उठाते हैं कि कुछ विशेष वर्गों की भागीदारी पार्टी में सीमित क्यों दिखाई देती है।


यह एक वैध राजनीतिक प्रश्न है और इस पर चर्चा होनी चाहिए। लेकिन इसके उत्तर को केवल आरोपों में ढूँढ़ना समस्या का समाधान नहीं है। राजनीतिक भागीदारी एक दोतरफा प्रक्रिया होती है। इसमें राजनीतिक दलों की रणनीति, सामाजिक विश्वास, ऐतिहासिक अनुभव और वैचारिक स्वीकार्यता सभी की भूमिका होती है।


यदि कोई वर्ग किसी दल से दूरी बनाए रखता है तो उसके कारणों का गंभीर विश्लेषण आवश्यक है। लेकिन यदि हर परिस्थिति का दोष केवल एक पक्ष पर मढ़ दिया जाए तो संवाद की संभावनाएँ समाप्त हो जाती हैं। यही कारण है कि आरोपों की राजनीति अक्सर समाधान के बजाय दूरी बढ़ाती है।


आरोप लगाने की राजनीति का एक मनोवैज्ञानिक पक्ष भी है। जब किसी राजनीतिक दल को यह महसूस होने लगता है कि उसके पास जनता को प्रभावित करने के लिए पर्याप्त सकारात्मक एजेंडा नहीं है, तब वह नकारात्मक राजनीति का सहारा लेने लगता है। विरोधी को लगातार कठघरे में खड़ा करना आसान होता है, क्योंकि इसके लिए वैकल्पिक समाधान प्रस्तुत करने की आवश्यकता नहीं पड़ती।


लेकिन जनता केवल आलोचना नहीं सुनना चाहती। वह यह भी जानना चाहती है कि विकल्प क्या है। यदि विपक्ष केवल सत्ता पक्ष की आलोचना करता रहे और अपनी स्पष्ट नीति न दे सके, तो मतदाता धीरे-धीरे उससे दूरी बनाने लगता है। यही कारण है कि दुनिया के अनेक लोकतंत्रों में केवल विरोध के आधार पर चुनाव जीतना कठिन माना जाता है। जनता अंततः उस पक्ष की ओर झुकती है जो उसे भविष्य की स्पष्ट दिशा दिखाता है।


राजनीतिक इतिहास यह बताता है कि किसी व्यक्ति या संस्था को लगातार बदनाम करके अपने पक्ष में समर्थन जुटाने की रणनीति अल्पकालिक लाभ दे सकती है, लेकिन दीर्घकाल में यह उलटा प्रभाव भी पैदा कर सकती है। जब जनता को लगता है कि किसी पर अन्यायपूर्ण आरोप लगाए जा रहे हैं, तब उसके भीतर सहानुभूति की भावना जन्म लेती है। यही कारण है कि कई बार राजनीतिक अभियानों का परिणाम आरोप लगाने वालों के विपरीत निकलता है।


उपेक्षा की शुरुआत वहीं से होती है जहाँ संवाद समाप्त हो जाता है। यदि कोई दल या गठबंधन केवल आरोपों के सहारे राजनीति करता है और जनता की वास्तविक चिंताओं रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, सुरक्षा और विकास, को पर्याप्त महत्व नहीं देता है, तो धीरे-धीरे उसकी प्रासंगिकता कम होने लगती है।


तोहमत की राजनीति अंततः उसी को सबसे अधिक नुकसान पहुँचाती है जो इसे अपना मुख्य हथियार बना लेता है। लोकतंत्र में आलोचना आवश्यक है, लेकिन आलोचना और आरोप में अंतर होता है। आलोचना तथ्यों पर आधारित होती है, जबकि तोहमत अक्सर पूर्वाग्रहों और राजनीतिक लाभ की आकांक्षा से प्रेरित होती है।


भारत का लोकतंत्र इतना परिपक्व है कि वह केवल आरोपों के आधार पर निर्णय नहीं करता। जनता कार्य, नीयत और परिणाम तीनों को देखती है। इसलिए किसी भी राजनीतिक दल या गठबंधन के लिए यह आवश्यक है कि वह विरोध की राजनीति से आगे बढ़कर विश्वास की राजनीति करे। क्योंकि इतिहास का अनुभव यही कहता है कि तोहमत से अंततः पराजय के सिवाय कुछ हासिल नहीं होता है।



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