जैन दर्शन की प्राचीन चिंतन परंपरा और अहिंसा के वैश्विक महत्व पर जापान में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मंथन होने जा रहा है। जापान के प्रतिष्ठित क्योटो विश्वविद्यालय में 26 अगस्त से 2 सितंबर तक ‘अहिंसा : जैन अध्ययन और उससे आगे’ विषय पर अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की जाएगी। संगोष्ठी में दुनिया के विभिन्न प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों से जुड़े विद्वान, शोधकर्ता और जैन अध्ययन के विशेषज्ञ भाग लेंगे। इस दौरान जैन दर्शन में निहित अहिंसा की अवधारणा, उसकी समकालीन प्रासंगिकता और वैश्विक चुनौतियों के समाधान में उसकी भूमिका पर व्यापक चर्चा होगी।
इस महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय आयोजन में जैन विश्व भारती विश्वविद्यालय का प्रतिनिधित्व विश्वविद्यालय के कुलपति के विशेष कार्याधिकारी प्रो. अशोक जैतावत करेंगे। वे 18 अगस्त को जापान के लिए रवाना होंगे। संगोष्ठी में उनकी भागीदारी जैन दर्शन और भारतीय ज्ञान परंपरा को अंतरराष्ट्रीय अकादमिक मंच पर प्रस्तुत करने की दृष्टि से महत्वपूर्ण मानी जा रही है। प्रो. जैतावत संगोष्ठी में ‘जैन उपवास एवं ऑटोफैजी : तपस्या परंपराओं और आधुनिक जैव-चिकित्सा विज्ञान के मध्य एक अंतर-सांस्कृतिक संवाद’ विषय पर अपना शोध-पत्र प्रस्तुत करेंगे। उनका शोध-पत्र जैन धर्म की तपस्या एवं उपवास की परंपरा को आधुनिक विज्ञान के संदर्भ में समझने का प्रयास करेगा।
जैन दर्शन में उपवास केवल भोजन का त्याग नहीं, बल्कि आत्मसंयम, इंद्रियनिग्रह और आंतरिक शुद्धि की साधना के रूप में देखा जाता है। आधुनिक जैव-चिकित्सा विज्ञान में ऑटोफैजी ऐसी जैविक प्रक्रिया है, जिसमें शरीर अपनी क्षतिग्रस्त या अनावश्यक कोशिकीय संरचनाओं को तोड़कर उनका पुनर्चक्रण करता है। प्रो. जैतावत का शोध इसी बिंदु पर प्राचीन भारतीय तपस्या परंपरा और आधुनिक वैज्ञानिक चिंतन के बीच संभावित संवाद को सामने रखेगा। यह विषय इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आज पूरी दुनिया स्वास्थ्य, जीवनशैली, मानसिक संतुलन और शरीर की प्राकृतिक प्रक्रियाओं को लेकर नए सिरे से विचार कर रही है।
जैन दर्शन में अहिंसा का अर्थ केवल किसी जीव को शारीरिक नुकसान न पहुंचाना नहीं है। यह विचार मन, वचन और कर्म, तीनों स्तरों पर संयम और संवेदनशीलता की अपेक्षा करता है। जैन परंपरा में प्रत्येक जीव के अस्तित्व और उसके जीवन के अधिकार को महत्व दिया गया है। आज दुनिया हिंसा, युद्ध, सामाजिक संघर्ष, पर्यावरणीय संकट और असहिष्णुता जैसी अनेक चुनौतियों से जूझ रही है। ऐसे समय में जैन अहिंसा का संदेश केवल धार्मिक या आध्यात्मिक विचार तक सीमित नहीं रह जाता, बल्कि यह मानव समाज के लिए एक व्यापक नैतिक और सामाजिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है।
संगोष्ठी में विद्वान इस बात पर विचार करेंगे कि जैन दर्शन के अहिंसा, अपरिग्रह, अनेकांतवाद और आत्मसंयम जैसे सिद्धांत आधुनिक विश्व को किस प्रकार नई दिशा दे सकते हैं। विशेष रूप से अनेकांतवाद विभिन्न दृष्टिकोणों को समझने और मतभेदों के बीच संवाद की संस्कृति विकसित करने में उपयोगी माना जाता है। पर्यावरण संरक्षण और टिकाऊ जीवनशैली के संदर्भ में भी जैन दर्शन की शिक्षाएं महत्वपूर्ण हैं। सीमित उपभोग, संसाधनों के प्रति संयम और सभी जीवों के प्रति संवेदनशीलता जैसे विचार आज के पर्यावरणीय संकट के दौर में विशेष महत्व रखते हैं।
क्योटो विश्वविद्यालय में आयोजित होने वाली यह संगोष्ठी भारत और जापान के बीच अकादमिक एवं सांस्कृतिक संवाद को भी मजबूत करने का अवसर प्रदान करेगी। जापान स्वयं बौद्ध और पूर्वी दार्शनिक परंपराओं के गहरे प्रभाव वाला देश है। ऐसे में जैन दर्शन के अहिंसा और आत्मसंयम आधारित विचारों पर वहां अंतरराष्ट्रीय विद्वानों का एकत्र होना विशेष महत्व रखता है। प्रो. अशोक जैतावत की भागीदारी से जैन विश्व भारती विश्वविद्यालय की शैक्षणिक एवं शोध गतिविधियों को भी अंतरराष्ट्रीय मंच मिलेगा। उनके शोध-पत्र के माध्यम से जैन उपवास परंपरा को आधुनिक जैव-चिकित्सा विज्ञान से जोड़कर देखने का प्रयास भारतीय ज्ञान परंपरा के नए अकादमिक आयाम सामने ला सकता है।
क्योटो में होने वाला यह आयोजन इस सवाल पर भी विचार का अवसर देगा कि हजारों वर्ष पुरानी जैन अहिंसा आज के आधुनिक विश्व में किस प्रकार प्रासंगिक हो सकती है। हिंसा और संघर्ष से प्रभावित दुनिया में अहिंसा को केवल आदर्श के रूप में नहीं, बल्कि व्यवहार और नीति की आधारभूत सोच के रूप में देखने की आवश्यकता बढ़ रही है। इस दृष्टि से जापान में होने वाला अंतरराष्ट्रीय मंथन जैन दर्शन को वैश्विक अकादमिक विमर्श से जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम होगा। प्राचीन तपस्या, अहिंसा और आत्मसंयम की भारतीय परंपरा जब आधुनिक विज्ञान और वैश्विक चिंतन से संवाद करेगी, तो इससे ज्ञान की विभिन्न धाराओं के बीच एक नई समझ विकसित होने की उम्मीद है।

