बिहार सहित देश के कई राज्यों में नदियों में जमा होने वाली गाद (सिल्ट) वर्षों से बड़ी चुनौती बनी हुई है। हर वर्ष बाढ़ के बाद नदियों के तल में भारी मात्रा में गाद जमा हो जाती है, जिससे नदी की जलधारण क्षमता कम होती है और बाढ़ का खतरा बढ़ जाता है। अब इस समस्या का समाधान खोजने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल की जा रही है। योजना है कि नदियों से निकाली जाने वाली गाद का उपयोग ईंट निर्माण में किया जाएगा। इससे एक ओर पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा मिलेगा, वहीं दूसरी ओर सरकार को अतिरिक्त राजस्व भी प्राप्त होगा।
इस पहल की जानकारी देते हुए डॉ. प्रमोद कुमार ने बताया कि नदियों में जमा गाद अब बहुत बड़ी समस्या का रूप ले चुकी है। इसलिए सबसे पहले गाद का विस्तृत और वैज्ञानिक सर्वे कराया जाएगा। इस सर्वे में यह देखा जाएगा कि किस नदी में कितनी मात्रा में गाद उपलब्ध है, उसकी गुणवत्ता कैसी है तथा वह ईंट निर्माण के लिए कितनी उपयुक्त है। सर्वे के आधार पर एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार की जाएगी, जिससे आगे की कार्ययोजना तय होगी। इससे गाद के वैज्ञानिक और व्यवस्थित उपयोग का मार्ग प्रशस्त होगा।
सूत्रों के अनुसार, गाद के सर्वे के बाद संबंधित डीएसआर (डिस्ट्रिक्ट सर्वे रिपोर्ट) को मंजूरी दी जाएगी। इसके बाद जिलाधिकारी (कलेक्टर) के माध्यम से गाद की नीलामी की प्रक्रिया पूरी होगी। नीलामी के जरिए इच्छुक उद्यमियों और उद्योगों को गाद उपलब्ध कराई जाएगी, ताकि उसका उपयोग ईंट निर्माण सहित अन्य निर्माण कार्यों में किया जा सके। इस पारदर्शी प्रक्रिया से अवैध खनन और अनियंत्रित दोहन पर भी अंकुश लगाया जा सकेगा।
परंपरागत ईंट निर्माण में बड़ी मात्रा में उपजाऊ मिट्टी का उपयोग किया जाता है, जिससे कृषि भूमि की गुणवत्ता प्रभावित होती है। यदि नदियों की गाद से ईटें बनने लगेगी तो खेतों की उपजाऊ मिट्टी की खुदाई कम होगी। इससे कृषि भूमि सुरक्षित रहेगी और पर्यावरण संरक्षण को भी बल मिलेगा। इसके साथ ही नदियों की जलधारण क्षमता बढ़ेगी, जिससे बाढ़ की समस्या को कम करने में भी सहायता मिल सकती है। साफ और गहरी नदियां जल प्रवाह को अधिक सुगम बनाती हैं।
गाद आधारित ईंट निर्माण से स्थानीय स्तर पर नए उद्योग स्थापित होने की संभावना बढ़ेगी। ईंट निर्माण इकाइयों, परिवहन, प्रसंस्करण तथा विपणन जैसे क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। ग्रामीण क्षेत्रों में छोटे और मध्यम उद्यमों को भी इससे नई दिशा मिल सकती है। यदि इस योजना को बड़े स्तर पर लागू किया गया तो यह स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के साथ-साथ आत्मनिर्भरता की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है।
डॉ. प्रमोद कुमार के अनुसार इस पहल से सरकार को अतिरिक्त राजस्व की प्राप्ति होगी। अभी तक नदियों में जमा गाद को केवल एक समस्या के रूप में देखा जाता था, लेकिन अब यही गाद आय का नया स्रोत बन सकती है। नीलामी प्रक्रिया के माध्यम से सरकार को आर्थिक लाभ मिलेगा, जिसका उपयोग विकास योजनाओं में किया जा सकेगा। यह मॉडल प्राकृतिक संसाधनों के बेहतर प्रबंधन और संसाधनों के पुनः उपयोग (रीसाइक्लिंग) का भी उत्कृष्ट उदाहरण बन सकता है।
आज पूरी दुनिया प्राकृतिक संसाधनों के बेहतर उपयोग और पर्यावरण संरक्षण पर जोर दे रही है। ऐसे समय में नदियों की गाद से ईंट बनाने की योजना 'वेस्ट टू वेल्थ' यानी कचरे से संपदा बनाने की सोच को साकार करती है। यदि सर्वे, गुणवत्ता परीक्षण और नीलामी की प्रक्रिया समयबद्ध ढंग से पूरी होती है, तो आने वाले वर्षों में यह पहल नदी संरक्षण, बाढ़ नियंत्रण, पर्यावरण सुरक्षा और आर्थिक विकास, चारों क्षेत्रों में सकारात्मक बदलाव ला सकती है। नदियों की गाद, जिसे अब तक केवल परेशानी माना जाता था, भविष्य में विकास की मजबूत ईंट बनकर नई संभावनाओं का आधार तैयार कर सकती है।

