दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) के इतिहास विभाग के परास्नातक (पीजी) तीसरे सेमेस्टर के पाठ्यक्रम में बड़ा बदलाव सामने आया है। विश्वविद्यालय ने दिल्ली सल्तनत समेत इतिहास के कई महत्वपूर्ण विषयों को फिलहाल पाठ्यक्रम में शामिल नहीं किया है। विश्वविद्यालय प्रशासन ने इन विषयों को समीक्षा के लिए वापस इतिहास विभाग को भेजा है। इस फैसले के बाद विभाग के शिक्षकों में असंतोष और चिंता का माहौल है।
दिल्ली विश्वविद्यालय की ओर से सात अगस्त को जारी अधिसूचना में पीजी तीसरे सेमेस्टर के कुछ पेपरों को शामिल नहीं किए जाने की जानकारी सामने आई। इसके बाद इतिहास विभाग के शिक्षकों ने इन महत्वपूर्ण विषयों को हटाए जाने पर कड़ी आपत्ति जताई। शिक्षकों का कहना है कि इतिहास के अध्ययन में इन विषयों की महत्वपूर्ण भूमिका है और इनके बिना पाठ्यक्रम की व्यापकता प्रभावित हो सकती है। हालांकि विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से इन विषयों को स्थायी रूप से हटाने की बात नहीं कही गई है। इन्हें फिलहाल समीक्षा के लिए विभाग को वापस भेजा गया है। ऐसे में अंतिम निर्णय समीक्षा प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही सामने आएगा।
जिन विषयों को समीक्षा के लिए भेजा गया है, उनमें ‘मध्यकालीन उत्तर भारत में दिल्ली, सल्तनत, सत्ता की संरचनाएं (13वीं-14वीं शताब्दी)’ प्रमुख है। दिल्ली सल्तनत भारतीय इतिहास के मध्यकालीन दौर का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। इस काल में राजनीतिक सत्ता, प्रशासनिक व्यवस्था, सैन्य संगठन, आर्थिक गतिविधियों और सामाजिक संरचनाओं में व्यापक बदलाव हुए। सल्तनत काल का अध्ययन केवल राजाओं और युद्धों तक सीमित नहीं है। इस दौर में शासन व्यवस्था, भूमि राजस्व, नगरीकरण, व्यापार, स्थापत्य, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और समाज के विभिन्न वर्गों के संबंधों को समझने के महत्वपूर्ण स्रोत उपलब्ध होते हैं। इसलिए इतिहास के उच्च अध्ययन में इस विषय का अपना विशेष महत्व माना जाता है।
डीयू ने केवल दिल्ली सल्तनत से संबंधित पेपर को ही समीक्षा के लिए नहीं भेजा है। इसके साथ इतिहास के कई अन्य महत्वपूर्ण विषय भी फिलहाल पाठ्यक्रम से बाहर रखे गए हैं। इनमें ‘उत्तर भारत का इतिहास, लगभग 1400-1550 ईस्वी’ भी शामिल है। यह काल भारतीय इतिहास में राजनीतिक परिवर्तन और क्षेत्रीय शक्तियों के उभार का दौर रहा है। इस समय की परिस्थितियों को समझना आगे चलकर मुगल सत्ता के विस्तार और उत्तर भारत की राजनीतिक संरचना को समझने के लिए भी महत्वपूर्ण है। इसके अलावा ‘प्राचीन भारत में राजनीतिक प्रक्रियाएं और राज्य-व्यवस्थाओं की संरचना’ तथा ‘प्रारंभिक भारत में लिंग एवं महिलाएं, 1500 ईसा पूर्व-1000 ईस्वी’ जैसे विषय भी समीक्षा के लिए भेजे गए हैं।
‘प्रारंभिक भारत में लिंग एवं महिलाएं’ विषय को लेकर भी अकादमिक दृष्टि से विशेष महत्व है। इतिहास लेखन में लंबे समय तक राजनीतिक घटनाओं, राजवंशों और युद्धों को प्रमुखता मिलती रही है। आधुनिक इतिहास अध्ययन में समाज, महिलाओं की भूमिका, पारिवारिक संरचना और लैंगिक संबंधों को भी महत्वपूर्ण विषय माना जाता है। इसी तरह राजनीतिक प्रक्रियाओं और राज्य-व्यवस्थाओं की संरचना का अध्ययन विद्यार्थियों को यह समझने में मदद करता है कि प्राचीन भारतीय समाज में सत्ता किस प्रकार संगठित और संचालित होती थी।
डीयू की वर्तमान कार्रवाई को अंतिम निर्णय के रूप में नहीं देखा जा रहा है। विश्वविद्यालय प्रशासन ने संबंधित विषयों को समीक्षा के लिए विभाग को वापस भेजा है। इसका अर्थ है कि इन पेपरों की उपयोगिता, संरचना और पाठ्यक्रम में उनकी आवश्यकता पर दोबारा विचार किया जाएगा। आने वाले दिनों में समीक्षा के बाद विश्वविद्यालय इन विषयों को लेकर कोई स्पष्ट निर्णय ले सकता है। यदि इन्हें संशोधित स्वरूप में पाठ्यक्रम में शामिल किया जाता है, तो छात्रों के लिए इतिहास अध्ययन का स्वरूप भी उसी अनुरूप बदलेगा।
किसी भी विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में बदलाव एक सामान्य अकादमिक प्रक्रिया हो सकती है, लेकिन इतिहास जैसे विषय में पाठ्यक्रम तय करते समय संतुलन बेहद जरूरी है। इतिहास केवल अतीत की घटनाओं का संग्रह नहीं है, बल्कि वर्तमान समाज को समझने का माध्यम भी है। इसलिए विद्यार्थियों को राजनीतिक इतिहास के साथ सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और लैंगिक इतिहास की समग्र जानकारी मिलना जरूरी है। दिल्ली सल्तनत से लेकर प्राचीन भारत की राज्य-व्यवस्था और महिलाओं के इतिहास तक सभी विषय भारतीय अतीत की अलग-अलग परतों को सामने लाते हैं। अब सबकी नजर डीयू की समीक्षा प्रक्रिया पर है। आने वाले दिनों में होने वाला निर्णय यह तय करेगा कि इन महत्वपूर्ण विषयों को किस स्वरूप में और किस स्थान के साथ पाठ्यक्रम में शामिल किया जाएगा।

