डिजिटल तकनीक ने जहां आम लोगों की जिंदगी को आसान बनाया है, वहीं साइबर अपराधियों ने इसी तकनीक का इस्तेमाल ठगी के नए-नए तरीके विकसित करने में शुरू कर दिया है। इनमें ‘डिजिटल अरेस्ट’ एक बेहद खतरनाक साइबर धोखाधड़ी के रूप में सामने आया है। अपराधी पुलिस, सीबीआई, ईडी, नारकोटिक्स विभाग या अन्य सरकारी एजेंसियों का अधिकारी बनकर लोगों को वीडियो कॉल करते हैं और उन्हें किसी गंभीर अपराध में फंसाने की धमकी देकर घंटों या कई दिनों तक मानसिक दबाव में रखते हैं। इसके बाद उनसे पैसे ऐंठे जाते हैं। इसी गंभीर समस्या को देखते हुए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने डिजिटल अरेस्ट के जरिए होने वाली ठगी को साइबर धोखाधड़ी का सबसे खतरनाक रूप बताते हुए इसे कानूनी ढांचे में अलग अपराध के रूप में शामिल करने का सुझाव दिया है।
डिजिटल अरेस्ट में अपराधी पीड़ित को फोन या वीडियो कॉल करके दावा करते हैं कि उसके नाम से कोई पार्सल मिला है, बैंक खाते से अवैध लेन-देन हुआ है या उसका नाम किसी आपराधिक मामले में सामने आया है। इसके बाद उसे बताया जाता है कि वह ‘डिजिटल अरेस्ट’ में है और जब तक जांच पूरी नहीं होगी, वह किसी से संपर्क नहीं कर सकता। सूत्रों के अनुसार कई मामलों में अपराधी पीड़ित को कैमरे के सामने बैठे रहने के लिए मजबूर करते हैं। पुलिस की वर्दी, सरकारी लोगो, फर्जी दस्तावेज और वीडियो कॉल के जरिए ऐसा माहौल बनाया जाता है कि सामने वाला व्यक्ति वास्तव में किसी सरकारी जांच का सामना कर रहा है। भय और दबाव में पीड़ित अपनी जमा पूंजी तक अपराधियों को भेज देता है।
डिजिटल अरेस्ट केवल आर्थिक ठगी का मामला नहीं है। यह व्यक्ति के सम्मान, मानसिक स्वतंत्रता, निजता और सुरक्षा जैसे बुनियादी अधिकारों को भी प्रभावित करता है। अपराधी पीड़ित को लगातार डराते हैं कि गिरफ्तारी होने वाली है, परिवार के सदस्यों को भी मामले में फंसा दिया जाएगा या उसकी संपत्ति जब्त कर ली जाएगी। ऐसी धमकियों के कारण कई लोग घबराकर अपराधियों की मांग मान लेते हैं। खासतौर पर बुजुर्ग, अकेले रहने वाले लोग और साइबर तकनीक की कम जानकारी रखने वाले नागरिक आसानी से इस जाल में फंस सकते हैं।
हाल ही में ‘डिजिटल अरेस्ट से ठगी के खिलाफ मानवाधिकारों की सुरक्षा’ विषय पर आयोजित ओपन हाउस चर्चा के बाद एनएचआरसी ने सरकार को इस अपराध से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए कई सुझाव दिए हैं। आयोग का प्रमुख सुझाव है कि डिजिटल अरेस्ट को मौजूदा साइबर अपराधों के भीतर केवल एक तरीके के रूप में देखने के बजाय अलग और स्पष्ट अपराध के रूप में कानूनी मान्यता दी जाए। इससे पुलिस को शिकायत दर्ज करने, जांच करने और आरोपियों के खिलाफ मुकदमा चलाने में अधिक स्पष्टता मिल सकती है। आयोग ने साइबर अपराध की जांच करने वाली एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय, पीड़ितों की सहायता और जागरूकता बढ़ाने पर भी जोर दिया है।
डिजिटल अरेस्ट की ठगी में अपराधी सरकारी संस्थाओं और कानून लागू करने वाली एजेंसियों की प्रतिष्ठा का गलत इस्तेमाल करते हैं। फर्जी पहचान और दस्तावेजों के माध्यम से वे खुद को अधिकारी साबित करने की कोशिश करते हैं। इससे आम नागरिकों में सरकारी संस्थाओं को लेकर भ्रम पैदा होता है। इसलिए ऐसी घटनाओं में इस्तेमाल किए जाने वाले मोबाइल नंबर, बैंक खातों, डिजिटल भुगतान माध्यमों और ऑनलाइन पहचान की तेजी से जांच जरूरी है।
डिजिटल अरेस्ट के खिलाफ कानूनी कार्रवाई जरूरी है, लेकिन नागरिक जागरूकता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। लोगों को यह समझना होगा कि भारत में कानून किसी व्यक्ति को वीडियो कॉल पर बैठाकर ‘डिजिटल अरेस्ट’ नहीं करता। कोई भी वास्तविक सरकारी जांच एजेंसी इस तरह पैसे ट्रांसफर करने का दबाव नहीं बनाती है। यदि कोई व्यक्ति खुद को पुलिस या किसी जांच एजेंसी का अधिकारी बताकर धमकाए और पैसे की मांग करे तो तुरंत बातचीत रोकनी चाहिए। बैंक संबंधी जानकारी, ओटीपी, पासवर्ड या अन्य संवेदनशील विवरण साझा नहीं करने चाहिए और घटना की सूचना संबंधित साइबर अपराध प्राधिकरण को देनी चाहिए।
डिजिटल अपराध लगातार तकनीक के साथ अपना स्वरूप बदल रहे हैं। ऐसे में कानून और जांच व्यवस्था को भी समय के साथ बदलना जरूरी है। डिजिटल अरेस्ट को अलग अपराध मानने का सुझाव इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। सबसे जरूरी बात यह है कि साइबर अपराधियों के डर के आगे नागरिक असहाय महसूस न करें। कानून, तकनीक और जागरूकता, इन तीनों के बेहतर तालमेल से ही डिजिटल अरेस्ट जैसे अपराधों पर प्रभावी नियंत्रण पाया जा सकता है। एनएचआरसी की पहल इस चुनौती को केवल आर्थिक अपराध नहीं, बल्कि मानव गरिमा और अधिकारों की सुरक्षा से जुड़े गंभीर मुद्दे के रूप में देखने की जरूरत को रेखांकित करती है।

