गोवा सरकार ने जबरन, धोखे या प्रलोभन के जरिए धर्म परिवर्तन कराने के खिलाफ बड़ा कदम उठाते हुए प्रस्तावित विधेयक को कैबिनेट की मंजूरी दे दी है। सरकार की ओर से मंजूर किए गए इस बिल में धर्म परिवर्तन कराने के दोषियों के लिए बेहद कड़ी सजा का प्रावधान किया गया है। प्रस्तावित कानून में गंभीर मामलों में उम्रकैद तक की सजा का प्रावधान किए जाने की बात सामने आई है। इसे आगामी विधानसभा सत्र में पेश किया जाएगा।
गोवा विधानसभा का मॉनसून सत्र 31 अगस्त से शुरू होने वाला है। इसी सत्र में सरकार धर्म परिवर्तन विरोधी विधेयक को सदन में पेश कर सकती है। विधेयक के सदन में आने के बाद इसके प्रावधानों पर चर्चा होगी और विपक्ष तथा अन्य सदस्यों की ओर से उठाए जाने वाले सवालों के बाद इसकी आगे की प्रक्रिया तय होगी। सूत्रों के अनुसार सरकार का तर्क है कि किसी व्यक्ति का धर्म उसकी व्यक्तिगत आस्था और स्वतंत्रता का विषय है, लेकिन यदि किसी व्यक्ति को जबरदस्ती, धोखे, भय, लालच या अनुचित प्रभाव के माध्यम से धर्म बदलने के लिए मजबूर किया जाता है तो ऐसी गतिविधियों पर रोक जरूरी है।
सूत्रों के अनुसार, प्रस्तावित विधेयक में धर्म परिवर्तन कराने वाले दोषियों के लिए कम से कम 10 वर्ष की जेल की सजा का प्रावधान हो सकता है। गंभीर परिस्थितियों में सजा बढ़ाकर उम्रकैद तक किए जाने का प्रस्ताव है। धर्म परिवर्तन कराने में भूमिका निभाने वाले धार्मिक व्यक्तियों को भी कानून के दायरे में लाने की बात कही जा रही है। बताया जा रहा है कि पुजारी, मौलवी या अन्य धार्मिक गतिविधियों से जुड़े व्यक्ति, यदि कानून में परिभाषित गैरकानूनी तरीके से धर्म परिवर्तन कराने के दोषी पाए जाते हैं, तो उनके खिलाफ भी कार्रवाई हो सकती है। हालांकि, विधेयक के अंतिम प्रावधान विधानसभा में पेश होने और उसके बाद पारित होने की प्रक्रिया में स्पष्ट होंगे।
धर्म परिवर्तन का मुद्दा भारत में लंबे समय से सामाजिक और राजनीतिक बहस का विषय रहा है। भारतीय संविधान प्रत्येक व्यक्ति को अपनी धार्मिक आस्था रखने और उसका पालन करने की स्वतंत्रता देता है। इसी के साथ राज्य सरकारें जबरन या अनुचित साधनों से कराए जाने वाले धर्म परिवर्तन को रोकने के लिए कानून बनाती रही हैं। गोवा का प्रस्तावित कानून भी इसी बहस के बीच सामने आया है। ऐसे कानूनों के समर्थकों का कहना है कि किसी व्यक्ति की मजबूरी, गरीबी, अशिक्षा या कमजोर सामाजिक स्थिति का फायदा उठाकर उसका धर्म परिवर्तन कराना गलत है। वहीं, कानून की आलोचना करने वाले पक्षों की चिंता रहती है कि धर्म की स्वतंत्रता और व्यक्तिगत पसंद प्रभावित नहीं होनी चाहिए।
गोवा ऐसा कानून लाने वाला पहला राज्य नहीं होगा। देश के कई राज्यों में पहले से ही धर्म परिवर्तन को नियंत्रित करने वाले कानून लागू हैं। इनमें महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और हिमाचल प्रदेश सहित कई राज्य शामिल हैं। इन राज्यों के कानूनों में जबरन, धोखे, प्रलोभन या अनुचित प्रभाव के माध्यम से धर्म परिवर्तन कराने पर अलग-अलग प्रकार की सजा का प्रावधान किया गया है। कुछ राज्यों ने कानूनों में महिलाओं, नाबालिगों और अनुसूचित जाति-जनजाति के लोगों से जुड़े मामलों को अधिक गंभीर मानते हुए अतिरिक्त प्रावधान भी किए हैं।
गोवा की पहचान देश के प्रमुख पर्यटन राज्यों में होती है और यहां विभिन्न धर्मों तथा समुदायों के लोग लंबे समय से रहते आए हैं। ऐसे में धर्म परिवर्तन से संबंधित किसी भी कानून का सामाजिक प्रभाव व्यापक हो सकता है। सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि कानून का इस्तेमाल केवल उन मामलों में हो जहां वास्तव में जबरन, धोखे या प्रलोभन से धर्म परिवर्तन कराया गया हो। साथ ही, किसी वयस्क व्यक्ति की स्वेच्छा से की गई धार्मिक पसंद और गैरकानूनी धर्म परिवर्तन के बीच स्पष्ट अंतर बनाए रखना भी जरूरी होगा।
कैबिनेट की मंजूरी के बाद अब सबकी नजर विधानसभा पर है। विधेयक के सदन में पेश होने के बाद इसके प्रावधानों, सजा की अवधि, शिकायत की प्रक्रिया और जांच से जुड़े नियमों की स्पष्ट जानकारी सामने आएगी। गोवा सरकार का यह कदम धर्म परिवर्तन के मुद्दे पर राज्य की नीति में महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत माना जा रहा है। अब देखना होगा कि विधानसभा में विधेयक किस रूप में पारित होता है और कानून बनने के बाद इसे किस तरह लागू किया जाता है। सबसे अहम बात यही होगी कि धार्मिक स्वतंत्रता की संवैधानिक गारंटी और जबरन धर्म परिवर्तन पर रोक-दोनों के बीच संतुलन कैसे कायम किया जाता है।

