बिहार में दो माह में लगेंगे 1800 चापाकल

Jitendra Kumar Sinha
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बिहार के ग्रामीण इलाकों में पेयजल की समस्या को दूर करने की दिशा में लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग (पीएचइडी) ने बड़ी पहल शुरू की है। राज्य के विभिन्न ग्रामीण क्षेत्रों में अगले दो माह के भीतर करीब 1800 नये चापाकल लगाये जायेंगे। इस पहल का उद्देश्य उन गांवों, टोलों और सार्वजनिक स्थलों तक पेयजल की सुविधा पहुंचाना है, जहां लोगों को पानी के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है या मौजूदा जलस्रोत उनकी जरूरत पूरी करने में सक्षम नहीं हैं।


चापाकल लगाने के लिए ऐसे क्षेत्रों को प्राथमिकता दी जायेगी, जहां पेयजल की उपलब्धता बेहद सीमित है। खासकर वैसे गांव और टोले, जहां लोगों को रोजमर्रा की जरूरत के लिए दूर स्थित जलस्रोतों पर निर्भर रहना पड़ता है, उन्हें सूची में ऊपर रखा जायेगा। इसके अलावा जिन इलाकों में पहले से मौजूद चापाकल या अन्य जलस्रोत पर्याप्त नहीं हैं, वहां भी नये चापाकल लगाये जायेंगे। इस व्यवस्था से ग्रामीण आबादी को घर के आसपास पेयजल उपलब्ध कराने में मदद मिलेगी। गर्मी और अन्य मौसम में जलस्रोतों पर बढ़ने वाले दबाव को देखते हुए यह कदम ग्रामीण परिवारों के लिए काफी उपयोगी साबित हो सकता है।


पीएचइडी ने चापाकल लगाने के लिए जिलों से आवश्यक जानकारी जुटाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। विभागीय स्तर पर यह पता लगाया जा रहा है कि किस जिले में कितने चापाकलों की आवश्यकता है और किन गांवों या टोलों में पेयजल की समस्या अधिक गंभीर है। जिलों से प्राप्त होने वाली रिपोर्ट के आधार पर प्राथमिकता वाले क्षेत्रों की पहचान की जायेगी। इसके बाद गांव, टोला और सार्वजनिक स्थलों का चयन कर वहां चापाकल लगाने की प्रक्रिया शुरू होगी। इससे जरूरत के मुताबिक संसाधनों का इस्तेमाल किया जा सकेगा और उन इलाकों तक पहले सुविधा पहुंचायी जा सकेगी, जहां इसकी सबसे अधिक आवश्यकता है।


चापाकल लगाने के दौरान केवल पेयजल की मांग को ही आधार नहीं बनाया जायेगा। संबंधित क्षेत्र में भूजल की उपलब्धता का भी ध्यान रखा जायेगा। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि जहां चापाकल लगाया जाये, वहां पर्याप्त मात्रा में भूजल उपलब्ध हो और लोगों को लंबे समय तक इसका लाभ मिल सके। भूजल की स्थिति को ध्यान में रखकर चापाकल लगाने से संसाधनों का बेहतर उपयोग होगा। साथ ही ऐसे स्थानों पर चापाकल लगाने से बचा जा सकेगा जहां भूजल स्तर बेहद नीचे है या जल उपलब्धता को लेकर गंभीर समस्या है।


नये चापाकल केवल गांवों और टोलों तक सीमित नहीं रहेंगे। जरूरत के अनुसार सार्वजनिक स्थलों को भी इसके दायरे में शामिल किया जायेगा। ग्रामीण बाजार, सार्वजनिक आवागमन वाले स्थान और ऐसे अन्य क्षेत्र जहां बड़ी संख्या में लोगों की आवाजाही होती है, वहां पेयजल सुविधा उपलब्ध कराने पर भी विचार किया जायेगा। सार्वजनिक स्थलों पर पेयजल की उपलब्धता से ग्रामीणों के साथ-साथ राहगीरों और स्थानीय स्तर पर काम करने वाले लोगों को भी राहत मिलेगी।


ग्रामीण बिहार में सुरक्षित और सुलभ पेयजल की उपलब्धता केवल सुविधा का विषय नहीं, बल्कि लोगों के दैनिक जीवन से जुड़ी बुनियादी जरूरत है। कई ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी लोगों को पानी के लिए अतिरिक्त दूरी तय करनी पड़ती है। ऐसे में 1800 नये चापाकल लगाने की योजना स्थानीय स्तर पर पेयजल व्यवस्था को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। अगले दो माह में प्रस्तावित यह अभियान यदि निर्धारित समय सीमा में पूरा होता है, तो बड़ी संख्या में ग्रामीण परिवारों को घर के नजदीक पेयजल का स्रोत उपलब्ध हो सकेगा। साथ ही जिलों से प्राप्त जरूरत के आंकड़ों और भूजल की स्थिति के आधार पर चापाकलों का चयन किये जाने से योजना का लाभ वास्तविक जरूरत वाले क्षेत्रों तक पहुंचाने में मदद मिलेगी।


1800 नये चापाकल लगाने की यह पहल बिहार के ग्रामीण इलाकों में पेयजल संकट कम करने की दिशा में एक व्यावहारिक कदम है। जरूरतमंद गांवों और टोलों की पहचान, भूजल की उपलब्धता का आकलन और सार्वजनिक स्थलों को प्राथमिकता देने की प्रक्रिया से योजना को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है। यदि इसका क्रियान्वयन समय पर होता है, तो आने वाले दिनों में ग्रामीण आबादी को पेयजल के लिए लंबी दूरी तय करने की मजबूरी से काफी हद तक राहत मिल सकती है।


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