भारत की लोकतांत्रिक यात्रा केवल चुनावों की कहानी नहीं है। यह उस विश्वास की कहानी है, जिसमें एक आम नागरिक यह मानता है कि उसकी आवाज संसद तक पहुँचेगी, उस पर चर्चा होगी और उसके जीवन से जुड़े प्रश्नों का समाधान लोकतांत्रिक संस्थाओं के माध्यम से निकलेगा। लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ केवल मतदान केंद्र तक जाकर अपनी पसंद के उम्मीदवार या दल के पक्ष में बटन दबाना नहीं है। लोकतंत्र उससे कहीं व्यापक व्यवस्था है। यह नागरिक और राज्य के बीच विश्वास का संबंध है। यह उस उम्मीद का नाम है कि सत्ता जनता के प्रति जवाबदेह होगी, विपक्ष जनता की आवाज को मजबूती देगा, संसद राष्ट्रीय प्रश्नों पर विचार करेगी, मीडिया सत्ता और विपक्ष दोनों से सवाल पूछेगा तथा नागरिक अपनी स्वतंत्र सोच के साथ लोकतांत्रिक व्यवस्था में भागीदारी करेगा। लेकिन आज इस विश्वास के सामने कई गंभीर सवाल खड़े हैं।
संसद में होने वाला लगातार गतिरोध, आरोप-प्रत्यारोप, व्यक्तिगत टिप्पणियां, नारेबाजी और कार्यवाही का बाधित होना केवल राजनीतिक दलों के बीच संघर्ष नहीं है। इसका सीधा असर लोकतंत्र की उस छवि पर पड़ता है, जो देश की नई पीढ़ी अपने सामने बनाती है। जब कोई युवा संसद की कार्यवाही देखता है और उसे बहस से अधिक हंगामा दिखाई देता है, जब उसे तर्क से अधिक आरोप सुनाई देते हैं, जब उसे नीति पर चर्चा से अधिक राजनीतिक प्रदर्शन नजर आता है, तब उसके मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या राजनीति वास्तव में समाज को दिशा देने का माध्यम है? संसद में कार्य का स्तर यदि अपेक्षित क्षमता के मुकाबले बहुत कम रह जाए, तो यह केवल सांसदों के काम का आंकड़ा नहीं होता है। यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति जनता के विश्वास का प्रश्न बन जाता है। यदि सदन में चर्चा और कानून निर्माण के लिए उपलब्ध समय का बड़ा हिस्सा गतिरोध में चला जाए, तो उसका नुकसान किसी एक दल या नेता को नहीं, बल्कि पूरे देश को होता है। क्योंकि संसद में बर्बाद हुआ समय वापस नहीं आता।
वह समय किसानों की समस्या पर चर्चा का हो सकता था। वह बेरोजगार युवाओं की चिंता पर चर्चा का हो सकता था। वह महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, सीमा सुरक्षा, व्यापार, उद्योग, छोटे व्यवसाय, महिलाओं की सुरक्षा, सामाजिक न्याय और देश के भविष्य की योजनाओं पर विचार का समय हो सकता था। लेकिन जब सदन का मंच राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन का अखाड़ा बनता दिखाई देता है, तब लोकतंत्र के मूल उद्देश्य पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। बहुमत सरकार बनाने के लिए आवश्यक है, लेकिन लोकतंत्र चलाने के लिए संवाद आवश्यक है। चुनाव यह तय करते हैं कि सत्ता किसके हाथ में होगी, संसद यह तय करती है कि सत्ता किस प्रकार जवाबदेह रहेगी। एक स्वस्थ लोकतंत्र में सरकार का मजबूत होना आवश्यक है। देश को निर्णय लेने वाली सरकार चाहिए। नीतियां बननी चाहिए, योजनाएं लागू होनी चाहिए और कठिन परिस्थितियों में सरकार को निर्णय लेने की क्षमता होनी चाहिए। लेकिन मजबूत सरकार का अर्थ यह नहीं है कि विपक्ष की आवाज महत्वहीन हो जाए। उसी प्रकार विपक्ष का आक्रामक होना भी लोकतंत्र की आवश्यकता है। विपक्ष यदि सरकार से सवाल नहीं पूछेगा, नीतियों की आलोचना नहीं करेगा, गलतियों को उजागर नहीं करेगा और वैकल्पिक रास्ते प्रस्तुत नहीं करेगा, तो लोकतंत्र अधूरा रह जाएगा। सरकार को चुनौती देना लोकतंत्र है। संसद को ठप कर देना लोकतंत्र की मजबूती नहीं है। सरकार से जवाब मांगना लोकतंत्र है। हर विषय को राजनीतिक टकराव में बदल देना लोकतंत्र को कमजोर करता है। सत्ता की आलोचना लोकतंत्र का अधिकार है। लेकिन आलोचना के नाम पर व्यक्तिगत आक्षेप लोकतांत्रिक विमर्श की गरिमा को कम करते हैं। इसी तरह सरकार का विपक्ष पर हमला लोकतांत्रिक बहस नहीं है, यदि वह तथ्य और नीति के बजाय व्यक्तिगत आरोपों में बदल जाए। लोकतंत्र की खूबसूरती इस बात में नहीं है कि सभी लोग एक विचार पर सहमत हो। लोकतंत्र की खूबसूरती इस बात में है कि असहमति के बावजूद सभी एक-दूसरे के अस्तित्व और अधिकार का सम्मान करें।
भारत की पहली लोकसभा लोकतंत्र की प्रयोगशाला थी। देश नया-नया स्वतंत्र हुआ था। सामने विभाजन की पीड़ा थी, गरीबी थी, अशिक्षा थी, रियासतों का एकीकरण था, आर्थिक चुनौतियां थीं और लोकतांत्रिक संस्थाओं को स्थापित करने की विशाल जिम्मेदारी थी। संसद में विचारधाराओं का तीखा संघर्ष था। सरकार और विपक्ष के बीच मतभेद थे। नीतियों पर गंभीर बहस होती थी। सरकार के बड़े नेताओं को विपक्ष के सवालों का सामना करना पड़ता था। लेकिन उस दौर की संसदीय संस्कृति में एक महत्वपूर्ण बात थी, विचारों की लड़ाई को व्यक्तिगत दुश्मनी में बदलने से बचाने का प्रयास। राजनीतिक मतभेदों के बावजूद संसद को राष्ट्र की सर्वोच्च बहस का मंच माना जाता था। यह बात आज विशेष रूप से याद आती है। आज राजनीतिक दलों के पास संसाधन पहले से कहीं अधिक हैं। संचार के साधन पहले से कहीं अधिक हैं। मीडिया चैनलों की संख्या अधिक है। सोशल मीडिया ने प्रत्येक नेता को सीधे करोड़ों लोगों तक पहुंचने का माध्यम दे दिया है। राजनीतिक दलों की संगठनात्मक क्षमता बढ़ी है। चुनावी प्रबंधन अधिक आधुनिक हुआ है। लेकिन सवाल यह है कि क्या संसदीय संवाद उसी अनुपात में मजबूत हुआ है? तकनीक बढ़ी है, लेकिन संवाद घटा है, तो यह विरोधाभास चिंता पैदा करता है।
आज हमारी राजनीति में बोलने की इच्छा बहुत बढ़ गई है, लेकिन सुनने की क्षमता कम होती दिखाई देती है। हर पक्ष अपनी बात कह देना चाहता है। कोई दूसरे की बात सुनना नहीं चाहता। यही स्थिति संसद से लेकर टेलीविजन स्टूडियो और सोशल मीडिया तक दिखाई देती है। संसद में विरोध होना गलत नहीं है। बल्कि कई बार विरोध लोकतंत्र की आत्मा होता है। सरकार की ऐसी नीति जिसका व्यापक जनहित पर असर हो, उसके खिलाफ विपक्ष को आवाज उठानी चाहिए। लेकिन विरोध के भी लोकतांत्रिक तरीके होते हैं। संसदीय इतिहास में विरोध के अनेक तरीके रहे हैं- बहस, संशोधन प्रस्ताव, प्रश्न, स्थगन प्रस्ताव, समितियों में चर्चा, मत विभाजन, वॉकआउट और जनता के बीच राजनीतिक अभियान। यदि हर विरोध का अंतिम लक्ष्य सदन की कार्यवाही रोकना हो जाए, तो प्रश्न उठता है कि संसद की उपयोगिता कहां बचेगी? किसी मुद्दे पर सरकार को घेरना और किसी मुद्दे पर सदन को काम न करने देना दो अलग बातें हैं। आज आम नागरिक इस अंतर को समझ रहा है। वह देख रहा है कि उसके प्रतिनिधि सदन में क्या कर रहे हैं। वह यह भी देख रहा है कि किस मुद्दे पर सदन चल रहा है और किस मुद्दे पर बंद हो रहा है। जनता पहले से अधिक जागरूक है। उसके पास सूचना के अनेक स्रोत हैं। वह केवल अखबार के अगले दिन के संस्करण पर निर्भर नहीं है। वह लाइव प्रसारण देख सकता है, सोशल मीडिया पर वीडियो देख सकता है, संसदीय दस्तावेज पढ़ सकता है और नेताओं के भाषणों की तुलना कर सकता है। इसलिए राजनीति अब पहले की तरह जनता की नजर से छिपी नहीं रह सकती।
संसद के कामकाज को लेकर यदि किसी सत्र में यह तस्वीर सामने आती है कि निर्धारित समय का केवल लगभग 18 प्रतिशत हिस्सा ही बुधवार तक प्रभावी कार्य में उपयोग हो पाया है, तो यह आंकड़ा केवल संसदीय उत्पादकता का आंकड़ा नहीं है। यह लोकतंत्र के सामने रखा हुआ एक आईना है। राजनेताओं को स्वयं तय करना होगा कि उस आईने में उन्हें क्या दिखाई देता है। उन्हें अपनी राजनीतिक रणनीति दिखाई देती है या जनता की अपेक्षाएं? उन्हें विरोध की सफलता दिखाई देती है या संसद के समय की क्षति? उन्हें सत्ता को घेरने की उपलब्धि दिखाई देती है या उस किसान का प्रश्न, जो सदन में चर्चा की प्रतीक्षा कर रहा था? उन्हें अपनी राजनीतिक जीत दिखाई देती है या उस युवा की बेचैनी, जो रोजगार के अवसर तलाश रहा है? लोकतंत्र में राजनीतिक दलों की जीत-हार चुनाव से तय होती है। लेकिन संसद में असली जीत तब होती है, जब कोई गंभीर समस्या समाधान की दिशा में आगे बढ़ती है। यदि विपक्ष ने सरकार को किसी मुद्दे पर जवाब देने के लिए मजबूर किया, तो वह विपक्ष की सफलता है। यदि सरकार ने विपक्ष की आपत्ति को सुनकर कानून में सुधार किया, तो वह सरकार की कमजोरी नहीं, लोकतंत्र की सफलता है। यदि दोनों पक्ष किसी राष्ट्रीय प्रश्न पर सहमति तक पहुंचे, तो वह किसी एक दल की जीत नहीं, भारत की जीत है। जनता पूछ रही है कि हमारे सांसद संसद के बाहर क्या कर रहे हैं? संसद में गतिरोध देखकर आम नागरिक के मन में एक स्वाभाविक प्रश्न पैदा हो रहा है कि जब देश रोजगार, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, खेती, व्यापार और सुरक्षा जैसे प्रश्नों से जूझ रहा है, तब उसके चुने हुए प्रतिनिधि संसद में क्या कर रहे हैं? यह प्रश्न राजनीतिक नहीं, नागरिक प्रश्न है।
भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी युवा आबादी है। युवा केवल रोजगार की तलाश में रहने वाला वर्ग नहीं है। वह भविष्य का मतदाता है, भविष्य का नेता है, भविष्य का प्रशासक है, भविष्य का पत्रकार है और भविष्य का नागरिक समाज है। यदि वही युवा राजनीति को केवल हंगामा, भ्रष्टाचार, आरोप-प्रत्यारोप और सत्ता संघर्ष के रूप में देखने लगे तो लोकतंत्र के लिए इससे बड़ी चिंता क्या हो सकती है? राजनीति से मोहभंग का अर्थ केवल चुनाव में मतदान कम होना नहीं है। मोहभंग का अर्थ यह भी हो सकता है कि युवा सार्वजनिक जीवन से दूरी बना ले। वह कहे कि “राजनीति गंदी चीज है, इसमें अच्छे लोग नहीं जाते।” यह वाक्य लोकतंत्र के लिए अत्यंत खतरनाक है। क्योंकि जब अच्छे, शिक्षित, संवेदनशील और जिम्मेदार नागरिक राजनीति से दूर होते हैं, तब सार्वजनिक जीवन में खाली जगह बनती है। और खाली जगह हमेशा बेहतर लोगों से नहीं भरती। इसलिए राजनीति को साफ करना केवल राजनेताओं की जिम्मेदारी नहीं है। समाज को भी राजनीति में अच्छे लोगों के प्रवेश को प्रोत्साहित करना होगा।
भारत में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को बढ़ाने की चर्चा लंबे समय से होती रही है। लेकिन लोकतंत्र में केवल संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। राजनीतिक प्रक्रिया के प्रति वास्तविक जुड़ाव भी आवश्यक है। जब राजनीतिक विमर्श लगातार आक्रामक, व्यक्तिगत और टकरावपूर्ण हो जाता है, तो उसका असर समाज के उन वर्गों पर भी पड़ता है जो राजनीति को अपने जीवन से जोड़कर देखना चाहते हैं। महिलाओं के लिए राजनीति केवल चुनाव नहीं है। यह शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, सुरक्षा, रोजगार, संपत्ति अधिकार, सामाजिक सम्मान, परिवार और बच्चों के भविष्य से जुड़ी नीतियों का प्रश्न है। यदि राजनीतिक बहस इन मुद्दों के बजाय लगातार आरोप-प्रत्यारोप और व्यक्तिगत संघर्ष में बदलती है, तो लोकतंत्र की उपयोगिता का संदेश कमजोर होता है। इसलिए महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने के लिए केवल प्रतिनिधित्व पर्याप्त नहीं है। राजनीतिक वातावरण भी ऐसा होना चाहिए जिसमें संवाद, सम्मान और नीति को प्राथमिकता मिले।
लोकतंत्र में स्थिर और मजबूत सरकार की आवश्यकता को नकारा नहीं जा सकता है। अर्थव्यवस्था को दिशा देने, सुरक्षा नीति बनाने, विदेश नीति संचालित करने, बुनियादी ढांचे का विकास करने और प्रशासनिक सुधार लागू करने के लिए सरकार के पास निर्णय लेने की क्षमता होनी चाहिए। लेकिन लोकतंत्र सरकार को शक्ति देता है, निरंकुशता का अधिकार नहीं। सरकार के पास बहुमत है तो इसका अर्थ यह नहीं कि विपक्ष की हर बात गलत है। बहुमत चुनावी शक्ति है। सत्य पर अंतिम अधिकार नहीं। सरकार को अपने निर्णयों का स्पष्टीकरण देना चाहिए। संसद में सवालों का उत्तर देना चाहिए। समितियों के माध्यम से जांच और समीक्षा को स्वीकार करना चाहिए। न्यायपालिका, मीडिया, संवैधानिक संस्थाओं और नागरिक समाज की आलोचना को लोकतंत्र के स्वाभाविक हिस्से के रूप में देखना चाहिए। मजबूत सरकार वही है जो सवालों से डरती नहीं है। वहीं विपक्ष आक्रामक हो, लेकिन अराजक न हो, इसी तरह विपक्ष के लिए भी लोकतांत्रिक मर्यादा जरूरी है। आक्रामकता का अर्थ ऊंची आवाज नहीं है। आक्रामकता का अर्थ है तथ्य के साथ सवाल। आक्रामकता का अर्थ है नीति की कमजोरियों को उजागर करना। आक्रामकता का अर्थ है सरकार से जवाब मांगना। आक्रामकता का अर्थ है वैकल्पिक रास्ता देना। यदि विरोध का अर्थ केवल सदन की कार्यवाही रोकना रह जाए, तो विपक्ष अपनी सबसे बड़ी शक्ति ‘जनता के विश्वास’ को कमजोर कर सकता है। जनता विपक्ष को केवल सरकार की आलोचना करने के लिए वोट नहीं देती है। वह उम्मीद करती है कि विपक्ष भविष्य की सरकार के रूप में भी खुद को साबित करेगा। इसलिए विपक्ष को हर दिन यह दिखाना चाहिए कि यदि उसे सत्ता मिली तो वह क्या अलग करेगा।
भारत की लोकतांत्रिक यात्रा विफल नहीं हुई है। लेकिन यह पूर्ण भी नहीं हुई है। लोकतंत्र कोई ऐसी मंजिल नहीं जहां पहुंचकर यात्रा समाप्त हो जाए। यह निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। हर पीढ़ी को इसे मजबूत करना होता है। आज हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती यह नहीं है कि सरकार कौन है और विपक्ष कौन। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि क्या सरकार और विपक्ष दोनों लोकतंत्र की मर्यादा को अपनी राजनीतिक रणनीति से ऊपर रख सकते हैं? क्या संसद फिर से बहस का मंच बन सकती है? क्या सांसद यह समझ सकते हैं कि संसद का समय जनता की संपत्ति है? क्या सरकार यह स्वीकार कर सकती है कि आलोचना लोकतंत्र का हिस्सा है? क्या विपक्ष यह स्वीकार कर सकता है कि विरोध और अराजकता एक ही चीज नहीं है? क्या नागरिक यह तय कर सकता है कि राजनीतिक समर्थन अंधभक्ति नहीं होना चाहिए? और क्या नई पीढ़ी यह विश्वास फिर से कर सकती है कि राजनीति समाज परिवर्तन का सम्मानजनक माध्यम है? इन सवालों का उत्तर हमारे लोकतांत्रिक भविष्य को तय करेगा। अंततः लोकतंत्र को किसी एक दल, किसी एक नेता या किसी एक संस्था की जरूरत नहीं होती है बल्कि उसे संतुलन की जरूरत होती है।
सरकार मजबूत हो, लेकिन निरंकुश न हो। विपक्ष आक्रामक हो, लेकिन अराजक न हो। मीडिया स्वतंत्र हो, लेकिन गैर-जिम्मेदार न हो। न्यायपालिका स्वतंत्र हो, लेकिन जवाबदेही और संवैधानिक मर्यादा के भीतर काम करे। राजनीतिक दल शक्तिशाली हो, लेकिन लोकतांत्रिक संस्थाओं से ऊपर न हो और नागरिक जागरूक हो, लेकिन अंध-भक्त न हो।
क्योंकि लोकतंत्र में सबसे बड़ी शक्ति किसी नेता की कुर्सी नहीं, जनता का विश्वास है। संसद की सबसे बड़ी उपलब्धि किसी दिन की सबसे बड़ी बहस नहीं है, बल्कि वह भरोसा है जिसमें एक सामान्य नागरिक यह कह सके कि “मेरी आवाज सुनी जाएगी।” वह विश्वास बना रहे, यही भारत की लोकतांत्रिक यात्रा की सबसे बड़ी सफलता होगी। लोकतंत्र में सरकार बदलेगी, विपक्ष बदलेगा, नेता बदलेंगे, राजनीतिक दल बदलेंगे, मुद्दे बदलेंगे और समय बदलता रहेगा।

