दिल्ली हाईकोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि दो बालिग व्यक्ति यदि अपनी स्वतंत्र इच्छा और आपसी सहमति से साथ रहने का फैसला करते हैं, तो उनके रिश्ते में माता-पिता या अन्य रिश्तेदारों को अनावश्यक हस्तक्षेप का अधिकार नहीं है। अदालत ने वयस्कों के जीवन और व्यक्तिगत फैसलों में उनकी स्वायत्तता को संविधान द्वारा संरक्षित अधिकारों से जोड़कर देखा है। यह टिप्पणी ऐसे समय में महत्वपूर्ण है, जब देश में विवाह के अलावा साथ रहने के विकल्प को लेकर सामाजिक और कानूनी बहस लगातार बढ़ रही है। अदालत का संदेश साफ है कि बालिग व्यक्ति अपने जीवन के महत्वपूर्ण फैसले स्वयं लेने के लिए स्वतंत्र हैं।
भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को गरिमा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के साथ जीवन जीने का अधिकार देता है। इसमें अपने जीवनसाथी या साथी का चुनाव भी महत्वपूर्ण माना गया है। अदालतों ने कई मामलों में यह स्पष्ट किया है कि किसी वयस्क व्यक्ति की पसंद को केवल परिवार की असहमति के आधार पर दबाया नहीं जा सकता है। दिल्ली हाईकोर्ट की टिप्पणी इसी संवैधानिक सोच को आगे बढ़ाती है। अदालत का दृष्टिकोण यह है कि यदि दो वयस्क अपनी इच्छा से संबंध में हैं और उनके बीच सहमति मौजूद है, तो केवल सामाजिक या पारिवारिक दबाव के आधार पर उनके निजी जीवन में हस्तक्षेप उचित नहीं माना जा सकता है।
भारत में पारंपरिक रूप से विवाह को ही पारिवारिक और सामाजिक जीवन की आधारशिला माना गया है। हालांकि, बदलते सामाजिक परिवेश में लिव-इन रिलेशनशिप भी चर्चा का महत्वपूर्ण विषय बन चुका है। शहरी क्षेत्रों में कई युवा विवाह से पहले एक-दूसरे को समझने या अपनी पसंद के अनुसार साथ रहने का निर्णय लेते हैं। ऐसे रिश्तों को लेकर समाज में अभी भी अलग-अलग विचार हैं। कुछ लोग इसे पारंपरिक पारिवारिक व्यवस्था के लिए चुनौती मानते हैं, जबकि दूसरे इसे दो वयस्कों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और निजी पसंद से जोड़कर देखते हैं। न्यायपालिका ने कई मौकों पर यह संकेत दिया है कि कानून का उद्देश्य वयस्कों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करना भी है।
परिवार का अपने बच्चों के भविष्य को लेकर चिंतित होना स्वाभाविक है। माता-पिता अपने अनुभव और सामाजिक परिस्थितियों के आधार पर सलाह दे सकते हैं। लेकिन सलाह और जबरन हस्तक्षेप के बीच स्पष्ट अंतर है। यदि कोई व्यक्ति बालिग है और अपने जीवन के बारे में स्वतंत्र निर्णय लेने में सक्षम है, तो परिवार उसकी पसंद को नियंत्रित नहीं कर सकता। विशेष रूप से तब, जब किसी तरह की जबरदस्ती, धोखाधड़ी या अपराध का मामला सामने न हो। लोकतांत्रिक व्यवस्था में व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अर्थ यही है कि व्यक्ति अपने जीवन से जुड़े फैसले स्वयं ले सके।
लिव-इन रिश्ते के संदर्भ में सबसे महत्वपूर्ण तत्व आपसी सहमति है। दो वयस्क अपनी इच्छा से साथ रह रहे हैं तो उनके निजी संबंध को केवल सामाजिक असहमति के आधार पर अपराध की तरह नहीं देखा जा सकता। हालांकि, इसका यह अर्थ भी नहीं है कि लिव-इन संबंधों में कानून लागू नहीं होता। हिंसा, उत्पीड़न, धोखाधड़ी या किसी अन्य अपराध की स्थिति में कानून का संरक्षण और हस्तक्षेप पूरी तरह लागू रहेगा। इसलिए व्यक्तिगत स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी और दूसरे व्यक्ति की सहमति का सम्मान भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
दिल्ली हाईकोर्ट की टिप्पणी का व्यापक संदेश यही है कि वयस्कों को अपनी जिंदगी के बारे में निर्णय लेने की स्वतंत्रता है। परिवार की भूमिका मार्गदर्शन और सहयोग की हो सकती है, लेकिन किसी बालिग की निजी पसंद को दबाने की नहीं। बदलते भारत में व्यक्तिगत स्वतंत्रता, पारिवारिक मूल्यों और सामाजिक स्वीकार्यता के बीच संतुलन बनाना जरूरी है। अदालत की यह सोच इस संतुलन में संवैधानिक अधिकारों की भूमिका को रेखांकित करती है।
लिव-इन संबंधों पर सामाजिक मतभेद आगे भी बने रह सकते हैं, लेकिन ऐसे मामलों में कानून और संविधान की कसौटी स्पष्ट है कि बालिग व्यक्ति की स्वतंत्र इच्छा और गरिमा का सम्मान किया जाना चाहिए। परिवार यदि असहमति रखता है तो संवाद का रास्ता अपनाया जा सकता है, लेकिन दबाव, धमकी या जबरन नियंत्रण लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप नहीं है। इस लिहाज से दिल्ली हाईकोर्ट की टिप्पणी केवल लिव-इन रिश्तों पर टिप्पणी नहीं, बल्कि व्यक्ति की पसंद, स्वतंत्रता और गरिमा को सम्मान देने का व्यापक संदेश भी है।

