भाजपा का ‘संसदीय विरोध मॉडल’ कर्नाटक में हिट

Jitendra Kumar Sinha
0

 


कर्नाटक की राजनीति में इन दिनों विधानसभा और विधान परिषद का सत्र सरकार और विपक्ष के बीच तीखे टकराव का अखाड़ा बन गया है। मंत्री बी. नागेंद्र को दोबारा मंत्रिमंडल में शामिल किए जाने के विरोध में भाजपा और जद-एस ने लगातार पांचवें दिन सदन में जोरदार प्रदर्शन किया। विपक्ष ने साफ कर दिया है कि जब तक नागेंद्र को मंत्रिमंडल से हटाया नहीं जाता, तब तक सदन की कार्यवाही सामान्य तरीके से नहीं चलने दी जाएगी। इस विरोध ने कांग्रेस को संसद में विपक्ष की उस रणनीति की याद दिला दी है, जिसमें किसी बड़े राजनीतिक मुद्दे पर सरकार को घेरने के लिए लगातार सदन की कार्यवाही बाधित की जाती रही है। अब वही शैली कर्नाटक में भाजपा और जद-एस अपनाते दिखाई दे रहे हैं।


भाजपा और जद-एस के विधायकों तथा विधान परिषद सदस्यों ने विरोध को प्रभावी बनाने के लिए प्रतीकात्मक तरीकों का सहारा लिया। विपक्षी सदस्य काली पट्टी और टी-शर्ट पहनकर सदन पहुंचे। हाथों में प्लेकार्ड लेकर उन्होंने सरकार के खिलाफ नारे लगाए और मंत्री बी. नागेंद्र को मंत्रिमंडल से हटाने की मांग दोहराई। लगातार हंगामे के कारण विधानसभा और विधान परिषद की कार्यवाही बार-बार स्थगित करनी पड़ी। विपक्ष का कहना है कि यह विरोध केवल राजनीतिक दबाव बनाने के लिए नहीं है, बल्कि सरकार से जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए किया जा रहा है।


विधानसभा में विपक्ष के नेता आर. अशोक ने सरकार को स्पष्ट संदेश दिया कि मंत्री बी. नागेंद्र को हटाए जाने तक विरोध जारी रहेगा। विपक्ष का आरोप है कि नागेंद्र के खिलाफ गंभीर आरोप और जांच एजेंसियों की कार्रवाई के बावजूद राज्य सरकार उन्हें राजनीतिक संरक्षण दे रही है। भाजपा का तर्क है कि जब किसी मंत्री पर गंभीर सवाल उठ रहे हों और जांच एजेंसियां मामले में सक्रिय हों, तो सरकार को नैतिक और राजनीतिक जिम्मेदारी लेते हुए संबंधित मंत्री को पद से अलग कर देना चाहिए। विपक्ष इसे सरकार की पारदर्शिता और जवाबदेही से जोड़ रहा है। उसका कहना है कि मंत्रिमंडल में किसी व्यक्ति की मौजूदगी केवल राजनीतिक निर्णय नहीं, बल्कि जनता के बीच सरकार की विश्वसनीयता का सवाल भी होती है।


वहीं, सत्तारूढ़ कांग्रेस ने भाजपा के आरोपों को खारिज करते हुए पलटवार किया है। कांग्रेस का आरोप है कि भाजपा और जद-एस सदन की कार्यवाही को जानबूझकर बाधित कर रहे हैं और राज्य से जुड़े वास्तविक तथा गंभीर मुद्दों पर चर्चा से बच रहे हैं। कांग्रेस ने सूखे, पेयजल संकट और अन्य महत्वपूर्ण जनहित के विषयों का हवाला देते हुए कहा कि विधानसभा जनता की समस्याओं पर चर्चा और समाधान खोजने का मंच है। ऐसे में लगातार हंगामा करके सदन को बाधित करना लोकतांत्रिक प्रक्रिया को कमजोर करता है। सत्ता पक्ष का संदेश साफ है कि विपक्ष को विरोध का अधिकार है, लेकिन उस अधिकार का इस्तेमाल सदन का कामकाज रोकने के लिए नहीं किया जाना चाहिए।


कर्नाटक का यह घटनाक्रम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि विपक्षी भाजपा अब उसी संसदीय शैली का इस्तेमाल करती दिखाई दे रही है, जिसकी आलोचना कांग्रेस अक्सर संसद में सरकार के खिलाफ विपक्ष द्वारा अपनाए गए विरोध के दौरान करती रही है। राजनीति में यह बदलाव एक दिलचस्प स्थिति पैदा करता है। जो रणनीति सत्ता पक्ष रहते हुए किसी दल को अस्वीकार्य लगती है, विपक्ष में आने के बाद वही रणनीति उसके लिए लोकतांत्रिक दबाव का प्रभावी हथियार बन जाती है। भाजपा का मौजूदा आंदोलन इसी राजनीतिक विरोधाभास को सामने ला रहा है। सदन में नारेबाजी, प्लेकार्ड और प्रतीकात्मक विरोध के जरिए विपक्ष सरकार को बैकफुट पर लाने की कोशिश कर रहा है।


कर्नाटक विधानसभा का मौजूदा गतिरोध केवल बी. नागेंद्र के मुद्दे तक सीमित नहीं है। इसके जरिए सरकार और विपक्ष के बीच भरोसे, जवाबदेही और राजनीतिक रणनीति की परीक्षा भी हो रही है। लोकतंत्र में विपक्ष का काम सरकार से सवाल पूछना और उसे कठघरे में खड़ा करना है। वहीं सरकार की जिम्मेदारी है कि वह गंभीर आरोपों पर स्पष्ट जवाब दे और सदन को सुचारू रूप से चलाने का रास्ता निकाले। यदि दोनों पक्ष अपनी-अपनी राजनीतिक जिद पर कायम रहते हैं, तो नुकसान अंततः विधानसभा की कार्यक्षमता और जनता के मुद्दों का होगा। फिलहाल भाजपा और जद-एस पीछे हटने के मूड में नहीं हैं और कांग्रेस भी विपक्ष के दबाव के आगे झुकने को तैयार नहीं दिख रही। ऐसे में कर्नाटक की राजनीति में यह टकराव आगे और तेज होने की संभावना है। सवाल अब यही है कि क्या नागेंद्र के मुद्दे पर सरकार कोई रास्ता निकालेगी या कर्नाटक विधानसभा का सदन राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन का मंच बना रहेगा?


एक टिप्पणी भेजें

0टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें (0)

#buttons=(Ok, Go it!) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Learn More
Ok, Go it!
To Top