दिल्ली से रांची तक उठते सवाल - आंदोलन मुद्दे से तय होता है या सत्ता किसके हाथ में?

Jitendra Kumar Sinha
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भारत में छात्र आंदोलन कोई नई घटना नहीं है। देश के लोकतांत्रिक इतिहास में छात्र शक्ति ने कई बार सत्ता को चुनौती दी है, व्यवस्था में बदलाव की मांग उठाई है और सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तन की दिशा तय की है। स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर जेपी आंदोलन तक और विश्वविद्यालयों से लेकर सड़कों तक छात्र आंदोलनों ने अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। छात्र जब अपनी पढ़ाई, रोजगार, परीक्षा, फीस, छात्रवृत्ति, आरक्षण, संस्थागत सुविधाओं अथवा भविष्य से जुड़े सवालों को लेकर सड़क पर उतरते हैं तो लोकतंत्र में उनकी आवाज को गंभीरता से सुना जाना चाहिए। लेकिन सवाल तब पैदा होता है, जब छात्र आंदोलन का चेहरा छात्र होते हैं, मगर उसके पीछे की पटकथा किसी और की होती है। सवाल तब और गंभीर हो जाता है, जब एक ही प्रकार के आंदोलन को अलग-अलग राजनीतिक दल और विचारधाराएं सत्ता में अपनी स्थिति के अनुसार अलग-अलग नजरिए से देखने लगती हैं।



आज हमारे सामने यही सबसे बड़ा प्रश्न है कि क्या छात्र आंदोलन वास्तव में छात्रों के अधिकारों की लड़ाई है या राजनीतिक दलों के लिए अपनी जमीन मजबूत करने का माध्यम? पिछले एक महीने में देश ने दिल्ली के जंतर-मंतर और रांची में चल रहे छात्र आंदोलन जैसे दो अलग-अलग घटनाक्रमों को देखा है। दोनों जगह युवा सड़क पर हैं। कहीं भूख हड़ताल है, कहीं प्रदर्शन है, कहीं पुलिस कार्रवाई का सामना करना पड़ रहा है, कहीं मांगों को लेकर सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश हो रही है। लेकिन इन दोनों आंदोलनों के प्रति राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रिया में अंतर दिखाई देता है। यही अंतर लोकतंत्र के सामने एक असहज सवाल खड़ा करता है कि क्या आंदोलन का मूल्य मुद्दे से तय होता है या इस बात से कि सत्ता किसके हाथ में है?



दिल्ली में सत्ता के खिलाफ उठने वाली छात्र आवाज के साथ जो लोग खड़े दिखाई देते हैं, वे रांची में उसी तरह की छात्र बेचैनी से दूरी क्यों बना लेते हैं? यदि छात्रों की समस्या वास्तव में समस्या है, तो फिर सरकार बदलते ही उसके प्रति संवेदनशीलता क्यों बदल जाती है? यहीं से छात्र आंदोलन और राजनीति के रिश्ते की पड़ताल शुरू होती है। किसी भी लोकतांत्रिक समाज में छात्र केवल विद्यार्थी नहीं होते हैं। वे समाज की युवा चेतना होते हैं। उनके पास भविष्य की आकांक्षाएं होती हैं और वर्तमान व्यवस्था के प्रति प्रश्न करने का साहस भी। छात्रों के सामने कई वास्तविक समस्याएं होती हैं। परीक्षा व्यवस्था में गड़बड़ी, परिणाम में देरी, भर्ती प्रक्रिया में अनियमितता, बेरोजगारी, फीस में वृद्धि, छात्रवृत्ति का भुगतान न होना, हॉस्टल की समस्या, शिक्षकों की कमी, प्रतियोगी परीक्षाओं की पारदर्शिता और सरकारी नौकरियों में अवसर जैसे विषय सीधे उनके जीवन से जुड़े होते हैं। ऐसे मामलों में छात्र आंदोलन को केवल राजनीतिक आंदोलन कह देना भी उचित नहीं होगा। हर आंदोलन के पीछे किसी राजनीतिक दल का हाथ हो, यह मान लेना छात्रों के संघर्ष को कमतर आंकना होगा। लेकिन दूसरी ओर यह भी सच है कि राजनीति छात्र आंदोलनों को प्रभावित करती रही है। छात्र संगठन लंबे समय से राजनीतिक विचारधाराओं की प्रयोगशाला रहे हैं। विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में बनने वाली राजनीतिक चेतना आगे चलकर राष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित करती है। यही कारण है कि छात्र आंदोलन में राजनीतिक हस्तक्षेप हमेशा से रहा है। समस्या राजनीतिक समर्थन में नहीं है। समस्या तब पैदा होती है, जब छात्र की वास्तविक समस्या पीछे छूट जाती है और राजनीतिक हित आगे आ जाता है।



राजनीति में किसी आंदोलन को समर्थन देना लोकतांत्रिक अधिकार है। विपक्ष सरकार के खिलाफ आवाज उठाए, आंदोलनकारी छात्रों के साथ खड़ा हो, उनकी मांगों को संसद या विधानसभा में उठाए, इसमें कोई बुराई नहीं है। लेकिन लोकतंत्र का वास्तविक परीक्षण तब होता है, जब राजनीतिक दल अपने विरोधियों की सरकार में भी उसी सिद्धांत को अपनाते हैं। यदि किसी दल को दिल्ली में छात्र आंदोलन इसलिए महत्वपूर्ण लगता है क्योंकि वहां केंद्र में उसकी विरोधी सरकार है, तो वही दल रांची में आंदोलन कर रहे छात्रों से इसलिए दूरी बना ले क्योंकि वहां उसके राजनीतिक समीकरण अलग हैं, तो यह छात्र हित नहीं, बल्कि राजनीतिक सुविधा है। इसी तरह यदि सत्ता पक्ष अपने शासन वाले राज्य में छात्रों की मांग को गंभीरता से लेने के बजाय उसे विपक्ष की साजिश बताता है, जबकि दूसरे राज्य में वही आंदोलन होने पर सरकार को छात्र विरोधी कहता है, तो यह भी दोहरा राजनीतिक मापदंड है। छात्रों को राजनीतिक मोहरा बनाने का सबसे खतरनाक पहलू यही है कि अंततः नुकसान छात्रों का ही होता है। उनकी पढ़ाई प्रभावित होती है। उनका समय बर्बाद होता है। उनके परिवार आर्थिक और मानसिक दबाव झेलते हैं और कई बार आंदोलन खत्म होने के बाद राजनीतिक दल अपने-अपने रास्ते चले जाते हैं, जबकि आंदोलनकारी छात्र अपने भविष्य के सामने अकेले खड़े रह जाते हैं।



दिल्ली और रांची के बीच भौगोलिक दूरी लगभग 1200 किलोमीटर के आसपास है। लेकिन छात्र आंदोलनों को लेकर राजनीतिक दृष्टिकोण की दूरी इससे कहीं अधिक दिखाई दे सकती है। एक शहर राष्ट्रीय राजधानी है, दूसरा राज्य (झारखंड) की राजधानी। एक जगह केंद्र सरकार के खिलाफ आवाज उठती है, दूसरी जगह राज्य सरकार के खिलाफ। एक स्थान पर विपक्ष को सरकार को घेरने का अवसर दिखाई देता है, दूसरे स्थान पर वही विपक्ष राजनीतिक असुविधा महसूस कर सकता है। यही अंतर लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय है। यदि किसी छात्र की पीड़ा दिल्ली में वास्तविक है तो रांची में भी वास्तविक होनी चाहिए। यदि किसी छात्र का लाठी खाना दिल्ली में लोकतंत्र पर हमला माना जाता है, तो रांची में भी उसी संवेदना से देखा जाना चाहिए। यदि भूख हड़ताल दिल्ली में त्याग और संघर्ष का प्रतीक है, तो रांची में भी वह छात्र की बेचैनी का संकेत होना चाहिए। स्थान बदलने से पीड़ा का स्वरूप नहीं बदलता है। सरकार बदलने से छात्र की समस्या का नैतिक मूल्य नहीं बदलना चाहिए। सवाल छात्रों की मांगों का नहीं, नीयत का है किसी भी छात्र आंदोलन पर सबसे पहले यह सवाल होना चाहिए कि उनकी मांग क्या है। क्या मांग संवैधानिक है? क्या मांग व्यावहारिक है? क्या मांग छात्रों के व्यापक हित से जुड़ी है? क्या सरकार के पास समाधान की गुंजाइश है? क्या छात्रों की शिकायतों की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए? इन प्रश्नों का उत्तर तथ्य और तर्क से मिलना चाहिए। लेकिन अक्सर राजनीतिक विमर्श इन सवालों को पीछे छोड़ देता है। सरकार कहती है कि आंदोलन विपक्ष प्रायोजित है। विपक्ष कहता है कि सरकार छात्रों की आवाज दबा रही है। एक पक्ष आंदोलनकारियों को अराजक बताता है। दूसरा पक्ष उन्हें लोकतंत्र के योद्धा बताता है और इस पूरे राजनीतिक शोर में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न कहीं खो जाता है कि छात्र आखिर मांग क्या रहे हैं? यही लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना है।



किसी आंदोलन को राजनीतिक समर्थन मिलना लोकतंत्र का हिस्सा है। लेकिन राजनीतिक दलों द्वारा आंदोलन पर कब्जा कर लेना अलग बात है। मान लिया जाय कि छात्र अपनी किसी समस्या के समाधान के लिए प्रदर्शन करते हैं। राजनीतिक दल उनके साथ खड़े होते हैं। वे उनकी मांग सरकार तक पहुंचाते हैं। यह सकारात्मक भूमिका हो सकती है। लेकिन यदि धीरे-धीरे छात्र का मूल मुद्दा पीछे चला जाए और राजनीतिक दल का एजेंडा आंदोलन का मुख्य मुद्दा बन जाए, तो समस्या पैदा होती है। तब छात्र आंदोलन नहीं रहता है, बल्कि राजनीतिक आंदोलन का छात्र चेहरा बन जाता है। यही वह स्थिति है जिससे बचना जरूरी है। छात्र राजनीति लोकतंत्र की पाठशाला है। भारत में छात्र राजनीति की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता है। देश के अनेक बड़े नेता छात्र राजनीति से निकले हैं। विश्वविद्यालयों ने राजनीतिक नेतृत्व को तैयार किया है। छात्र संगठनों ने सामाजिक प्रश्नों को उठाया है। कई आंदोलनों ने युवाओं को लोकतांत्रिक प्रक्रिया से जोड़ा है। इसलिए छात्र राजनीति को समाप्त करना समाधान नहीं है। समाधान यह है कि छात्र राजनीति को स्वस्थ बनाया जाए।



जब कोई छात्र भूख हड़ताल करता है तो इसे केवल राजनीतिक स्टंट मानना भी उचित नहीं है। भूख हड़ताल अक्सर उस स्थिति का प्रतीक होती है, जब आंदोलनकारी को लगता है कि सामान्य माध्यमों से उसकी आवाज नहीं सुनी जा रही। लेकिन भूख हड़ताल स्वास्थ्य के लिए गंभीर जोखिम भी पैदा कर सकती है। इसलिए सरकार और आंदोलनकारी दोनों को जिम्मेदारी दिखानी चाहिए। सरकार को बातचीत का रास्ता खोलना चाहिए। आंदोलनकारियों को भी अपने स्वास्थ्य की रक्षा करनी चाहिए। आमजन का रवैया भी इस बहस का महत्वपूर्ण हिस्सा है। आम नागरिक छात्रों की समस्या समझता है। हर परिवार में किसी न किसी रूप में शिक्षा, परीक्षा, रोजगार और भविष्य की चिंता मौजूद है। लेकिन आमजन राजनीति के इस दोहरे रवैये को भी समझने लगा है। सोशल मीडिया ने राजनीतिक पक्षधरता को पहले से अधिक स्पष्ट कर दिया है। पहले किसी नेता के बयान और उसके वास्तविक व्यवहार के बीच अंतर आम जनता तक पहुंचने में समय लगता था। अब ऐसा नहीं है। आज दिल्ली में दिया गया बयान कुछ मिनटों में रांची पहुंच सकता है।

रांची का वीडियो दिल्ली में देखा जा सकता है। एक साल पहले का भाषण आज की राजनीति में सामने लाया जा सकता है। यही कारण है कि नेताओं की पुरानी टिप्पणियां उनके वर्तमान रुख की तुलना में इस्तेमाल की जाती हैं। यदि कोई नेता एक जगह छात्रों के आंदोलन को लोकतंत्र की आवाज बताता है और दूसरी जगह छात्रों के आंदोलन को राजनीतिक षड्यंत्र बताता है, तो जनता के पास दोनों बयान देखने की सुविधा है। यही लोकतंत्र की नई पारदर्शिता है।



विपक्ष का काम सरकार से सवाल करना है। विपक्ष को छात्रों के आंदोलन को लोकतांत्रिक मंच देना चाहिए। लेकिन विपक्ष को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि छात्र आंदोलन उसका राजनीतिक मंच न बन जाए। यदि किसी मांग का समर्थन है तो उसका तथ्यात्मक आधार सामने रखना चाहिए। यदि सरकार की नीति गलत है तो उसका वैकल्पिक समाधान भी बताना चाहिए। केवल सरकार विरोधी नारे आंदोलन का समाधान नहीं हैं। सत्ता में बैठी सरकार के लिए सबसे जरूरी गुण है आलोचना सुनने की क्षमता। हर आंदोलन विपक्ष की साजिश नहीं होता है। हर विरोध देश विरोध नहीं होता है। हर प्रदर्शन कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं होता है और हर आलोचक सरकार का दुश्मन नहीं होता है।



यदि कोई दल किसी दूसरे राज्य में छात्र आंदोलन को लोकतांत्रिक अधिकार बताता है, तो अपने शासन वाले राज्य में भी वही मानक अपनाना चाहिए। यही राजनीतिक नैतिकता है। छात्र किसी दल की संपत्ति नहीं हैं यह बात विशेष रूप से समझने की जरूरत है। छात्र न भाजपा के हैं, न कांग्रेस के, न किसी क्षेत्रीय दल के। छात्र देश के हैं। उनकी आकांक्षा भारत का भविष्य है। उनकी शिक्षा देश की पूंजी है। उनकी ऊर्जा राष्ट्र की शक्ति है। इसलिए किसी भी राजनीतिक दल को छात्रों को अपनी विचारधारा का स्थायी वोट बैंक या आंदोलन का स्थायी चेहरा मानने की कोशिश नहीं करनी चाहिए।



दिल्ली और रांची के छात्र आंदोलनों की तुलना करते समय सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है कि क्या दोनों को एक ही लोकतांत्रिक कसौटी पर परखा जाएगा? यदि हां, तो अच्छी बात है। यदि नहीं, तो सवाल उठेगा कि कसौटी कौन तय कर रहा है। क्या आंदोलन की वैधता सरकार के राजनीतिक रंग से तय होगी? क्या छात्रों की पीड़ा सत्ता के अनुसार कम या ज्यादा होगी? क्या किसी छात्र के अधिकार का मूल्य इस बात से बदल जाएगा कि वह किस राज्य में रहता है? यदि इन प्रश्नों का उत्तर ‘नहीं’ है तो फिर राजनीतिक दलों को भी अपने व्यवहार में यह समानता दिखानी चाहिए।  लोकतंत्र का अर्थ केवल अपने समर्थक की आवाज की रक्षा करना नहीं है। लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ है कि अपने विरोधी की आवाज सुनने की क्षमता। यदि कोई राजनीतिक दल सत्ता में है और उसके विरोधी छात्र आंदोलन कर रहे हैं, तो उसे उनकी आवाज सुननी चाहिए और जब वही दल विपक्ष में आए, तो उसे भी सत्ता पक्ष के खिलाफ आंदोलन करने वाले छात्रों के अधिकारों की रक्षा करनी चाहिए। इसे राजनीतिक सिद्धांत की भाषा में सिद्धांतगत स्थिरता कहा जा सकता है। यही लोकतांत्रिक परिपक्वता है।



दिल्ली हो या रांची, पटना हो या लखनऊ, भोपाल हो या जयपुर—छात्र की समस्या का रंग राजनीतिक नहीं होना चाहिए। छात्र जब सड़क पर उतरता है तो उसके हाथ में भविष्य का सवाल होता है।वह नौकरी चाहता है। वह पारदर्शी परीक्षा चाहता है। वह गुणवत्तापूर्ण शिक्षा चाहता है। वह सम्मान चाहता है। वह अपने परिश्रम का परिणाम चाहता है। उसकी आवाज को किसी राजनीतिक दल की सरकार के खिलाफ होने या पक्ष में होने की कसौटी पर नहीं तौला जाना चाहिए।



आज देश के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या हम छात्र को छात्र की तरह देखेंगे या राजनीतिक मोहरे की तरह? क्या दिल्ली में छात्रों के साथ खड़ा होने वाला व्यक्ति रांची के छात्रों के साथ भी खड़ा होगा? क्या रांची की सत्ता से सवाल पूछने वाले दिल्ली की सत्ता से भी उसी दृढ़ता से सवाल करेंगे? क्या राजनीतिक दल अपने सिद्धांतों को सत्ता और विपक्ष दोनों परिस्थितियों में समान रख पाएंगे? और क्या आमजन यह तय करेगा कि वह किसी दल के साथ नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण मांग के साथ खड़ा है? इन सवालों का जवाब आने वाले समय में देश की राजनीतिक संस्कृति को दिशा देगा। क्योंकि लोकतंत्र की असली परीक्षा चुनाव के दिन नहीं होती। लोकतंत्र की असली परीक्षा तब होती है, जब हमारे सामने कोई ऐसा व्यक्ति खड़ा हो जिसकी विचारधारा हमसे अलग हो, लेकिन उसकी मांग हमें न्यायपूर्ण दिखाई दे। छात्र आंदोलन किसी दल की जमीन मजबूत करने का हथियार नहीं, बल्कि देश के भविष्य को मजबूत करने का माध्यम होना चाहिए।

  

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