अमेरिका में एच-1बी और एल-1 वीजा विस्तार होगा महंगा - 9 सितंबर से लागू होगा नया शुल्क

Jitendra Kumar Sinha
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अमेरिका ने एच-1बी और एल-1 वीजा को लेकर नियमों में एक महत्वपूर्ण बदलाव किया है। नए नियम के तहत अमेरिका में काम कर रहे बड़े नियोक्ताओं को अब इन वीजा के विस्तार के लिए अतिरिक्त शुल्क देना होगा। इस फैसले का सबसे अधिक असर उन कंपनियों पर पड़ने की आशंका है, जो बड़ी संख्या में विदेशी पेशेवरों, खासकर भारतीय आईटी विशेषज्ञों को अमेरिका में नियुक्त करती हैं। नए प्रावधान के अनुसार, पात्र बड़े नियोक्ताओं को एच-1बी वीजा के विस्तार के लिए 4,000 डॉलर, जबकि एल-1 वीजा के विस्तार के लिए 4,500 डॉलर का शुल्क देना होगा। यह व्यवस्था 9 सितंबर से लागू होगी। नियम उन नियोक्ताओं पर लागू होगा, जिनके अमेरिका में 50 या उससे अधिक कर्मचारी हैं।


अमेरिका में एच-1बी वीजा का इस्तेमाल मुख्य रूप से विशेष कौशल वाले विदेशी पेशेवरों को रोजगार देने के लिए किया जाता है। आईटी, इंजीनियरिंग, वित्त और तकनीकी क्षेत्र की कंपनियां इसका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करती हैं। भारतीय पेशेवरों की बड़ी संख्या भी एच-1बी वीजा के माध्यम से अमेरिका में काम करती है। वहीं, एल-1 वीजा बहुराष्ट्रीय कंपनियों के उन कर्मचारियों के लिए महत्वपूर्ण है, जिन्हें कंपनी अपने विदेशी कार्यालय से अमेरिका स्थित कार्यालय में स्थानांतरित करती है। वरिष्ठ प्रबंधकों और विशेष ज्ञान रखने वाले कर्मचारियों के लिए यह वीजा काफी उपयोगी माना जाता है।


अब तक अतिरिक्त शुल्क मुख्य रूप से शुरुआती आवेदन या नौकरी बदलने जैसी परिस्थितियों से जुड़ा रहा है। लेकिन नए नियम के बाद वीजा विस्तार की प्रक्रिया भी कंपनियों के लिए महंगी हो जाएगी। इसका अर्थ है कि अमेरिका में लंबे समय तक विदेशी कर्मचारियों को बनाए रखने वाली कंपनियों को अब अतिरिक्त वित्तीय बोझ उठाना पड़ेगा। विशेषज्ञों के अनुसार, एक-दो कर्मचारियों के मामले में यह खर्च बहुत बड़ा नहीं दिख सकता, लेकिन हजारों कर्मचारियों वाली कंपनियों के लिए इसका कुल वित्तीय प्रभाव काफी अधिक हो सकता है।


अमेरिका भारतीय आईटी कंपनियों के लिए सबसे महत्वपूर्ण बाजारों में से एक है। भारत की कई बड़ी आईटी कंपनियां अमेरिकी ग्राहकों को सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए बड़ी संख्या में कर्मचारियों को वहां तैनात करती हैं। ऐसे में एच-1बी और एल-1 वीजा से जुड़े अतिरिक्त शुल्क का सीधा असर उनकी परिचालन लागत पर पड़ सकता है। यदि किसी कंपनी को बड़ी संख्या में कर्मचारियों के वीजा का विस्तार कराना है तो प्रत्येक कर्मचारी पर लगने वाला अतिरिक्त शुल्क मिलकर लाखों डॉलर का बोझ पैदा कर सकता है। कंपनियों के सामने अब यह सवाल भी होगा कि इस अतिरिक्त लागत को स्वयं वहन किया जाए, ग्राहकों से वसूला जाए या कर्मचारियों की अमेरिका में तैनाती की रणनीति में बदलाव किया जाए।


नए शुल्क के बाद बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपने कर्मचारियों की तैनाती और मानव संसाधन रणनीति पर दोबारा विचार कर सकती हैं। कुछ कंपनियां अमेरिकी परियोजनाओं के लिए स्थानीय कर्मचारियों की नियुक्ति बढ़ा सकती हैं, जबकि कुछ काम भारत जैसे देशों में स्थित अपने केंद्रों से कराने पर जोर दे सकती हैं। हालांकि, हर तकनीकी और प्रबंधकीय भूमिका को स्थानीय कर्मचारियों से भरना आसान नहीं होगा। कई कंपनियों के लिए विशेष कौशल और कंपनी के आंतरिक सिस्टम की जानकारी रखने वाले कर्मचारियों को अमेरिका में बनाए रखना व्यावसायिक रूप से जरूरी हो सकता है।


नियम सीधे तौर पर कर्मचारियों के बजाय नियोक्ताओं पर शुल्क लगाता है, लेकिन इसका अप्रत्यक्ष प्रभाव भारतीय पेशेवरों पर भी पड़ सकता है। कंपनियां नए वीजा प्रायोजन, विस्तार और अमेरिका में कर्मचारियों की संख्या को लेकर अधिक सतर्क हो सकती हैं। इससे भविष्य में विदेश में तैनाती के अवसरों, कर्मचारियों के स्थानांतरण और अमेरिका में नई नियुक्तियों की योजनाओं पर असर पड़ने की संभावना है।


अमेरिका का उद्देश्य विदेशी कर्मचारियों से जुड़े वीजा तंत्र को अधिक नियंत्रित करना और नियोक्ताओं पर अतिरिक्त वित्तीय जिम्मेदारी डालना हो सकता है। लेकिन दूसरी ओर, अमेरिकी तकनीकी उद्योग लंबे समय से वैश्विक प्रतिभाओं पर निर्भर रहा है। यदि वीजा प्रक्रिया लगातार महंगी होती जाती है, तो कंपनियों के लिए वैश्विक प्रतिभाओं को अमेरिका लाना कठिन हो सकता है। इससे अमेरिकी कंपनियों की लागत और प्रतिस्पर्धात्मकता पर भी प्रभाव पड़ने की आशंका है।


9 सितंबर से लागू होने वाला यह शुल्क भारतीय आईटी कंपनियों और अन्य बड़े नियोक्ताओं के लिए एक नई लागत लेकर आएगा। आने वाले समय में कंपनियां यह तय करेंगी कि अतिरिक्त खर्च को किस तरह संभाला जाए और अमेरिका में विदेशी कर्मचारियों की तैनाती को किस रूप में जारी रखा जाए। ऐसे में यह नियम केवल वीजा शुल्क में बदलाव नहीं, बल्कि भारत-अमेरिका आईटी और रोजगार संबंधों पर असर डालने वाला महत्वपूर्ण नीतिगत कदम साबित हो सकता है।


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