मजबूत राष्ट्र के लिए मजबूत नैतिक चरित्र जरूरी

Jitendra Kumar Sinha
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लोकतंत्र में अधिकारों की चर्चा स्वाभाविक है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, समानता का अधिकार, शिक्षा का अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता, जीवन और गरिमा का अधिकार, ये सभी किसी भी सभ्य और लोकतांत्रिक समाज की बुनियाद हैं। नागरिकों को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होना चाहिए और जब उनके अधिकारों का हनन हो, तब उन्हें आवाज भी उठानी चाहिए। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या नागरिक जीवन केवल अधिकार मांगने का नाम है? क्या राष्ट्र केवल हमें सुविधाएं देने के लिए है और उसके प्रति हमारी कोई जिम्मेदारी नहीं है? क्या समाज से सम्मान, सुरक्षा, अवसर और अधिकार मांगते हुए हम अपने हिस्से के कर्तव्यों से मुंह मोड़ सकते हैं? यहीं से उस गंभीर संकट की शुरुआत होती है, जिसका सामना आज हमारा समाज कर रहा है।



हम अधिकारों की बात जोर-जोर से करते हैं, लेकिन कर्तव्यों की चर्चा होते ही हमारी आवाज धीमी पड़ जाती है। हम व्यवस्था से ईमानदारी चाहते हैं, लेकिन स्वयं नियमों का उल्लंघन करने में संकोच नहीं करते हैं। हम भ्रष्टाचार को कोसते हैं, लेकिन सुविधा मिलने पर नियमों को दरकिनार करने को गलत नहीं मानते हैं। हम स्वच्छ भारत चाहते हैं, मगर सड़क पर कचरा फेंकने से पहले नहीं सोचते हैं। हम देश की प्रगति चाहते हैं, लेकिन सार्वजनिक संपत्ति को अपनी जिम्मेदारी नहीं समझते हैं। यह विरोधाभास केवल व्यक्तिगत कमजोरी नहीं है। यह धीरे-धीरे राष्ट्रीय चरित्र का प्रश्न बनता जा रहा है। राष्ट्र केवल संसद, सरकार, प्रशासन, सेना या न्यायपालिका से नहीं बनता है। राष्ट्र उसके नागरिकों के चरित्र से बनता है और जिस समाज के नागरिक अपने अधिकारों के प्रति जागरूक लेकिन कर्तव्यों के प्रति उदासीन हो जाएं, वहां लोकतंत्र मजबूत होने के बजाय धीरे-धीरे खोखला होने लगता है।



लोकतंत्र की गाड़ी दो पहियों पर चलती है, वह है “अधिकार” और “कर्तव्य”। एक पहिया टूट जाए तो दूसरा चाहे कितना ही मजबूत क्यों न हो, यात्रा आगे नहीं बढ़ सकती है। अधिकार व्यक्ति को गरिमा देते हैं, जबकि कर्तव्य उस गरिमा को समाज के हित से जोड़ते हैं। अधिकार हमें स्वतंत्रता देते हैं, तो कर्तव्य उस स्वतंत्रता के जिम्मेदार इस्तेमाल की सीख देते हैं। यदि कोई व्यक्ति केवल अपने अधिकारों की बात करे और दूसरे व्यक्ति के अधिकारों का सम्मान न करे, तो वह स्वतंत्रता नहीं, स्वार्थ है। यदि कोई नागरिक अपने लिए न्याय मांगता है लेकिन दूसरों के साथ अन्याय करता है, तो यह लोकतांत्रिक चेतना नहीं है, बल्कि अवसरवाद है। यदि कोई व्यक्ति देश से सुरक्षा, विकास और सुविधाएं चाहता है लेकिन कानून, कर व्यवस्था, सार्वजनिक अनुशासन और सामाजिक जिम्मेदारियों को महत्व नहीं देता है, तो वह राष्ट्र से एकतरफा अपेक्षा कर रहा है। जबकि राष्ट्र और नागरिक का संबंध लेन-देन का संबंध नहीं है। राष्ट्र हमें केवल सुविधाएं देने वाली संस्था नहीं है। यह हमारी साझा पहचान, साझा विरासत, साझा जिम्मेदारी और साझा भविष्य का नाम है।



आज सोशल मीडिया के दौर में अधिकारों की आवाज पहले से कहीं अधिक मुखर हुई है। कुछ ही सेकंड में कोई व्यक्ति अपनी शिकायत लाखों लोगों तक पहुंचा सकता है। कोई सरकारी व्यवस्था पर सवाल उठा सकता है। कोई सामाजिक अन्याय के खिलाफ अभियान चला सकता है। कोई नागरिक अपनी समस्या को सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बना सकता है। यह लोकतंत्र की शक्ति है। लेकिन इसी शक्ति का दूसरा पक्ष भी है। हमने अपनी आवाज तो मजबूत कर ली, लेकिन क्या हमने अपनी जिम्मेदारी भी उतनी ही मजबूत की? सोशल मीडिया पर देशभक्ति की पोस्ट करना आसान है, लेकिन देश के कानून का पालन करना कठिन लगता है। राष्ट्रगान पर गर्व करना आसान है, लेकिन सड़क पर ट्रैफिक नियमों का पालन करना कठिन। स्वच्छता पर भाषण देना आसान है, लेकिन अपने घर के बाहर कूड़ा न फेंकना कठिन।

महिलाओं के सम्मान पर पोस्ट लिखना आसान है, लेकिन अपने व्यवहार में महिलाओं के प्रति सम्मान बनाए रखना कठिन है। ईमानदारी की बातें करना आसान है, लेकिन किसी छोटे लाभ के लिए गलत रास्ते से बचना कठिन है। यही वह अंतर है जहां हमारी कथनी और करनी अलग हो जाती है। राष्ट्र निर्माण नारों से नहीं, व्यवहार से होता है।



किसी देश की वास्तविक शक्ति केवल उसके सकल घरेलू उत्पाद, सैन्य क्षमता, तकनीकी विकास या आर्थिक संसाधनों से नहीं मापी जा सकती है। राष्ट्र की असली शक्ति उसके नागरिकों के चरित्र में छिपी होती है। जहां ईमानदारी होती है, वहां विश्वास पैदा होता है। जहां विश्वास होता है, वहां सहयोग पैदा होता है। जहां सहयोग होता है, वहां सामाजिक स्थिरता आती है और जहां सामाजिक स्थिरता होती है, वहां विकास की संभावनाएं बढ़ती हैं। इसके विपरीत जब समाज में छल, भ्रष्टाचार, स्वार्थ, हिंसा, घृणा, अवसरवाद और अविश्वास बढ़ने लगते हैं, तो संस्थाएं भी धीरे-धीरे कमजोर होने लगती हैं। नैतिकता किसी धर्म विशेष की संपत्ति नहीं है। ईमानदारी का कोई जातीय स्वरूप नहीं होता है। कर्तव्य का कोई भाषाई रंग नहीं होता है। देशभक्ति का कोई आर्थिक वर्ग नहीं होता है। मानवता की कोई सीमा नहीं होती है। इसलिए राष्ट्रीय चरित्र का निर्माण तभी संभव है, जब हम अपनी व्यक्तिगत पहचान से ऊपर उठकर कुछ साझा मूल्यों को स्वीकार करें।



आज दुनिया पहले से कहीं अधिक जुड़ चुकी है। इंटरनेट ने भौगोलिक सीमाओं को छोटा कर दिया है। एक देश में पैदा हुआ विचार कुछ ही मिनटों में दूसरे महाद्वीप तक पहुंच जाता है। शिक्षा, व्यापार, विज्ञान, तकनीक और संस्कृति का आदान-प्रदान पहले से कहीं तेज हो गया है। वैश्वीकरण ने भारत के लिए अनेक अवसर खोले हैं। भारतीय प्रतिभाएं दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में अपनी पहचान बना रही हैं। भारतीय कंपनियां वैश्विक बाजार में पहुंच रही हैं। हमारे युवा अंतरराष्ट्रीय संस्थानों में काम कर रहे हैं। विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में भारत की भूमिका बढ़ रही है। लेकिन हर अवसर के साथ चुनौती भी आती है। वैश्वीकरण केवल वस्तुओं और सेवाओं का आदान-प्रदान नहीं करता। यह विचारों, जीवनशैलियों, व्यवहारों और मूल्यों का भी आदान-प्रदान करता है। यहीं सावधानी की आवश्यकता है। हमें दुनिया से सीखना है, लेकिन अपनी पहचान खोकर नहीं। हमें आधुनिक होना है, लेकिन अपनी नैतिक जड़ों से कटकर नहीं। हमें तकनीकी रूप से विकसित होना है, लेकिन मानवीय दृष्टि से पिछड़ना नहीं है। हमें वैश्विक नागरिक बनने की दिशा में आगे बढ़ना है, लेकिन भारतीय नागरिक होने की जिम्मेदारी भूलनी नहीं है।



आधुनिक होने का अर्थ अपनी परंपराओं और मूल्यों को त्याग देना नहीं है। आधुनिकता का अर्थ है- विचारों में खुलापन, विज्ञान के प्रति विश्वास, मानवाधिकारों का सम्मान, लैंगिक समानता, सामाजिक न्याय और अवसरों की समानता। लेकिन आधुनिकता का अर्थ यह कतई नहीं कि ईमानदारी पुरानी चीज है, परिवार अप्रासंगिक है, समाज से कोई लेना-देना नहीं और राष्ट्र केवल राजनीतिक बहस का विषय है। विज्ञान हमें चंद्रमा तक पहुंचा सकता है, लेकिन मनुष्य को मनुष्य से जोड़ने के लिए संवेदना चाहिए। तकनीक हमें दुनिया से जोड़ सकती है, लेकिन रिश्तों में विश्वास हमें ही पैदा करना होगा। कृत्रिम बुद्धिमत्ता हमारे काम को आसान कर सकती है, लेकिन सही और गलत का निर्णय करने के लिए मानवीय विवेक आवश्यक रहेगा। इसीलिए आने वाले समय में नैतिक चरित्र की आवश्यकता कम नहीं है, बल्कि और अधिक होगी।



भारत विविधताओं का देश है। यहां अनेक जातियां हैं, अनेक भाषाएं हैं, अनेक धर्म हैं, अनेक सांस्कृतिक परंपराएं हैं और अलग-अलग सामाजिक एवं आर्थिक परिस्थितियां हैं। यह विविधता हमारी कमजोरी नहीं, हमारी शक्ति हो सकती है, यदि हम इसे विभाजन का आधार न बनने दें। जाति हमारी सामाजिक पहचान हो सकती है, लेकिन राष्ट्र की पहचान नहीं। भाषा हमारी अभिव्यक्ति का माध्यम हो सकती है, लेकिन नागरिकता की दीवार नहीं। धर्म हमारी व्यक्तिगत आस्था हो सकता है, लेकिन दूसरे नागरिक के अधिकारों के विरुद्ध हथियार नहीं। क्षेत्र हमारी सांस्कृतिक पहचान हो सकता है, लेकिन राष्ट्रीय एकता के लिए बाधा नहीं। हमें यह समझना होगा कि हमारी अनेक पहचानें हो सकती है, लेकिन एक साझा राष्ट्रीय पहचान भी है। हम पहले और अंततः इस देश के नागरिक हैं।



भारत की सभ्यता ने विविध आस्थाओं को लंबे समय से स्थान दिया है। धर्म मनुष्य को नैतिकता, करुणा, अनुशासन और आत्मसंयम की शिक्षा दे सकता है। लेकिन जब धर्म को राजनीतिक या सामाजिक संघर्ष का हथियार बना दिया जाता है, तब उसका मूल उद्देश्य कमजोर पड़ जाता है। किसी भी धर्म की वास्तविक शक्ति दूसरे धर्म को कमजोर करने में नहीं, बल्कि मनुष्य को बेहतर बनाने में है। यदि पूजा के बाद हमारा व्यवहार हिंसक है, तो पूजा अधूरी है। यदि धार्मिक पहचान के बावजूद हम दूसरे व्यक्ति के प्रति घृणा रखते हैं, तो हमारी आध्यात्मिक यात्रा अधूरी है। यदि हम अपने धर्म के सम्मान की बात करते हैं लेकिन दूसरे की आस्था का अपमान करते हैं, तो हम धर्म की आत्मा को नहीं समझ पाए। राष्ट्र की एकता तभी मजबूत होगी जब धार्मिक आस्था निजी श्रद्धा का विषय बनी रहे और नागरिकता समानता का आधार बने।



भारत की विकास यात्रा ने करोड़ों लोगों के जीवन में बदलाव लाया है। लेकिन आर्थिक असमानता अभी भी एक बड़ी चुनौती है। एक ओर आधुनिक सुविधाओं से संपन्न वर्ग है, दूसरी ओर ऐसे परिवार भी हैं जिन्हें बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष करना पड़ता है। इस असमानता को केवल आंकड़ों में नहीं देखा जा सकता। इसके पीछे शिक्षा के अवसरों में अंतर है। स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच का अंतर है। रोजगार के अवसरों का अंतर है। डिजिटल संसाधनों का अंतर है और सबसे महत्वपूर्ण है भविष्य को लेकर विश्वास का अंतर। एक मजबूत राष्ट्र वह नहीं जहां केवल कुछ लोग आगे बढ़े। मजबूत राष्ट्र वह है जहां विकास का लाभ व्यापक समाज तक पहुंचे। सामाजिक न्याय का अर्थ केवल सरकारी योजनाएं नहीं है। इसका अर्थ यह भी है कि समाज के सक्षम वर्ग कमजोर वर्गों के प्रति संवेदनशील रहें।



भाषा मनुष्य की आत्मा की अभिव्यक्ति है। भारत की भाषाई विविधता उसकी सांस्कृतिक संपदा है। हिन्दी, मैथिली, भोजपुरी, बंगाली, तमिल, तेलुगु, मराठी, पंजाबी, असमिया, उड़िया, कन्नड़, मलयालम, गुजराती, उर्दू और अनेक भारतीय भाषाएं हमारी साझा विरासत का हिस्सा हैं। किसी भाषा को दूसरी भाषा से श्रेष्ठ बताना भाषाई विविधता का अपमान है। भाषा हमें जोड़ने का माध्यम बने, बांटने का हथियार नहीं। एक भारतीय कई भाषाएं सीख सकता है। अपनी मातृभाषा से प्रेम कर सकता है। राष्ट्र की संपर्क भाषाओं को सीख सकता है। दुनिया की भाषाओं से ज्ञान प्राप्त कर सकता है। इसमें कोई विरोधाभास नहीं है। भाषाई आत्मसम्मान और राष्ट्रीय एकता साथ-साथ चल सकते हैं।



आज सोशल मीडिया नागरिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। यह लोकतांत्रिक संवाद का बड़ा माध्यम है। लेकिन इसके साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी है। एक झूठी खबर कुछ ही मिनटों में हजारों लोगों तक पहुंच सकती है। एक अपमानजनक टिप्पणी सामाजिक तनाव पैदा कर सकती है। एक भ्रामक वीडियो किसी समुदाय के प्रति घृणा पैदा कर सकता है। इसलिए डिजिटल नागरिकता भी नागरिक कर्तव्य का हिस्सा बन चुकी है। हमें पोस्ट करने से पहले सोचना चाहिए कि क्या यह सत्य है? क्या इससे किसी व्यक्ति या समुदाय को अनावश्यक नुकसान हो सकता है? क्या यह समाज में तनाव बढ़ाएगा? क्या मैं इसे वास्तविक जीवन में भी उसी व्यक्ति के सामने कह सकता हूं? यदि उत्तर नहीं है, तो शायद उसे पोस्ट करने से पहले रुक जाना चाहिए।



राष्ट्रभक्ति केवल झंडा फहराने, राष्ट्रगीत गाने या राष्ट्रीय पर्व मनाने तक सीमित नहीं हो सकती है। राष्ट्रभक्ति का सबसे सुंदर रूप रोजमर्रा के व्यवहार में दिखाई देता है। ईमानदारी से अपना काम करना राष्ट्रभक्ति है। करों का उचित भुगतान करना राष्ट्रभक्ति है। सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करना राष्ट्रभक्ति है। किसी जरूरतमंद की सहायता करना राष्ट्रभक्ति है। महिला, बुजुर्ग और दिव्यांग के सम्मान का ध्यान रखना राष्ट्रभक्ति है। पर्यावरण की रक्षा करना राष्ट्रभक्ति है। मतदान करना और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में जिम्मेदारी से भाग लेना राष्ट्रभक्ति है। कानून का सम्मान करना राष्ट्रभक्ति है और सबसे बढ़कर है देश के नागरिकों के बीच विश्वास बनाए रखना राष्ट्रभक्ति है। देश केवल सरकार का नाम नहीं है, हम अक्सर देश और सरकार को एक ही मान लेते हैं। यह समझ अधूरी है। सरकार बदलती रहती है। नीतियां बदलती रहती हैं। राजनीतिक दल आते-जाते रहते हैं। लेकिन राष्ट्र बना रहता है। भारत किसी एक सरकार, किसी एक दल, किसी एक नेता या किसी एक विचारधारा का नाम नहीं है। 



भारत करोड़ों नागरिकों की साझा आकांक्षाओं का नाम है। इसलिए सरकार की आलोचना करना लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन देश को कमजोर करना नागरिक जिम्मेदारी नहीं हो सकती है। सरकार से असहमति हो सकती है। नीतियों पर सवाल हो सकते हैं। प्रशासन की आलोचना हो सकती है। लेकिन राष्ट्रीय हित और राजनीतिक मतभेद के बीच अंतर समझना जरूरी है। लोकतंत्र में असहमति जरूरी है, दुश्मनी नहीं। जहां हर व्यक्ति एक ही विचार रखता है, वहां लोकतंत्र का विस्तार सीमित हो जाता है। लेकिन असहमति का अर्थ शत्रुता नहीं है। हम राजनीतिक रूप से अलग हो सकते हैं, लेकिन सामाजिक रूप से एक रह सकते हैं। हम किसी नीति का विरोध कर सकते हैं, लेकिन विरोधी नागरिक को अपना दुश्मन नहीं मानना चाहिए। बहस विचारों से होनी चाहिए, व्यक्तियों के चरित्रहनन से नहीं। तर्क का उत्तर तर्क से होना चाहिए, हिंसा से नहीं। लोकतंत्र की परिपक्वता का पैमाना यह नहीं कि हम अपने समर्थकों से कितना प्रेम करते हैं। बल्कि यह है कि हम अपने विरोधियों के अधिकारों का कितना सम्मान करते हैं। कर्तव्य की शुरुआत घर से होती है। देशभक्ति की शुरुआत संसद से नहीं, परिवार से होती है।



भारत की सबसे बड़ी शक्तियों में उसकी युवा आबादी एक महत्वपूर्ण शक्ति है। युवा ऊर्जा, साहस और परिवर्तन की क्षमता रखते हैं। लेकिन युवा शक्ति केवल रोजगार पाने वाली शक्ति नहीं है। युवा समाज के विचारों को बदल सकते हैं। नई तकनीक विकसित कर सकते हैं। उद्यमिता को बढ़ावा दे सकते हैं। गांवों और शहरों के बीच नए संबंध बना सकते हैं। सामाजिक समस्याओं के समाधान खोज सकते हैं। लेकिन इसके लिए उन्हें केवल कौशल नहीं, मूल्य भी चाहिए। तकनीकी दक्षता और नैतिक चरित्र का मेल आने वाले भारत की सबसे बड़ी आवश्यकता होगी।



सार्वजनिक संपत्ति आखिर किसकी है? रेलवे स्टेशन की कुर्सी, सरकारी स्कूल की दीवार, सड़क की लाइट, पार्क की बेंच, बस स्टॉप, सार्वजनिक शौचालय, इन सबको हम अक्सर सरकारी संपत्ति कहते हैं। लेकिन वास्तव में ये जनता की संपत्ति हैं। सरकार इनके निर्माण और रखरखाव की जिम्मेदारी निभाती है, लेकिन इन पर खर्च होने वाला धन समाज से ही आता है। इसलिए सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना अंततः अपने ही संसाधनों को नुकसान पहुंचाना है। एक जिम्मेदार नागरिक सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करता है। यही छोटी-छोटी आदतें राष्ट्रीय चरित्र का निर्माण करती हैं।



हम अक्सर कहते हैं कि कानून सबके लिए समान होना चाहिए। यह सही है। लेकिन समान कानून के साथ कानून का सम्मान भी आवश्यक है। यदि कानून केवल दूसरों पर लागू होना चाहिए और स्वयं पर नहीं, तो समाज में न्याय की भावना कमजोर होगी। ट्रैफिक नियमों से लेकर कर व्यवस्था तक, सार्वजनिक अनुशासन से लेकर न्यायिक प्रक्रियाओं तक, नियमों का पालन नागरिक जीवन की बुनियादी जिम्मेदारी है। कानून से बचने की कला विकसित करने वाला समाज अंततः कानून के शासन को कमजोर करता है।





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