मानवीय जीवन में जब अहंकार को हकीकत से बड़ा बना दिया जाता है, सत्य सामने दिखाई देने के बावजूद लोभ या स्वार्थ के कारण असत्य का साथ दिया जाता है और पूर्वजों की कृतियों को क्षुद्र राजनीतिक या व्यक्तिगत हितों की अग्नि में स्वाहा किया जाता है, तब दुर्भाग्य को आमंत्रण मिलता है। धर्मग्रंथों और भारतीय चिंतन परंपरा का मूल संदेश भी यही है कि सत्य, मर्यादा और कर्तव्य को क्षणिक स्वार्थ से ऊपर रखना चाहिए। आज भारतीय राजनीति जिस दौर से गुजर रही है, उसमें यह सवाल और अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। राष्ट्र भावना जैसे विषय भी राजनीतिक दलों की विचारधारात्मक प्रतिस्पर्धा के केंद्र में आते जा रहे हैं। वंदेमातरम इसका सबसे प्रमुख उदाहरण बनता दिखाई दे रहा है। जिस गीत ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान करोड़ों भारतीयों में मातृभूमि के प्रति भाव जगाया, वही आज राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया है।
वंदेमातरम का इतिहास भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से गहराई से जुड़ा हुआ है। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय की रचना ने भारत की धरती को मां के रूप में देखने और उसके प्रति श्रद्धा व्यक्त करने की भावना को व्यापक बनाया। स्वतंत्रता आंदोलन में यह गीत अंग्रेजी शासन के विरुद्ध राष्ट्रीय चेतना का महत्वपूर्ण प्रतीक बना। इसलिए वंदेमातरम को केवल शब्दों और धुनों में सीमित कर देना उसके ऐतिहासिक महत्व को छोटा करना होगा। इसके साथ स्वतंत्रता संग्राम की स्मृतियां, बलिदान की कहानियां और देश के प्रति भावनात्मक समर्पण जुड़ा हुआ है। लेकिन किसी भी राष्ट्रीय प्रतीक का सम्मान तभी सार्थक होता है, जब उसे राजनीतिक हथियार बनाने के बजाय राष्ट्रीय एकता के सूत्र के रूप में देखा जाए।
वर्तमान राजनीतिक विवाद का सबसे गंभीर प्रश्न यही है कि क्या राष्ट्रवाद किसी एक राजनीतिक दल की संपत्ति हो सकता है? भारत का राष्ट्रवाद किसी पार्टी के कार्यालय से पैदा नहीं हुआ। इसकी जड़ें हजारों वर्षों की सांस्कृतिक चेतना, स्वतंत्रता आंदोलन, संविधान और देश के करोड़ों नागरिकों की आकांक्षाओं में हैं। भारतीय जनता पार्टी ने अपने राजनीतिक विकास के साथ राष्ट्रवाद और सनातन सांस्कृतिक चेतना को अपनी राजनीति का प्रमुख आधार बनाया। दूसरी ओर कांग्रेस की राजनीति का स्वर समय के साथ बदलता रहा है। कभी उसका राष्ट्रवादी स्वर स्वतंत्रता आंदोलन का प्रमुख आधार था, तो बाद के दशकों में उसने धर्मनिरपेक्षता, सामाजिक न्याय और विविधता को अपनी राजनीतिक पहचान के महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में सामने रखा। यह राजनीतिक दृष्टिकोणों का अंतर हो सकता है, लेकिन राष्ट्र को किसी दल की वैचारिक सीमा में बांध देना उचित नहीं होगा।
वंदेमातरम को लेकर कांग्रेस की ओर से ऐतिहासिक संदर्भ, 1937 के निर्णय और समावेशिता का तर्क सामने आता है। इतिहास को समझने के लिए इन संदर्भों की चर्चा निश्चित रूप से होनी चाहिए। लेकिन सवाल यह है कि क्या इतिहास का कोई पुराना निर्णय आज की राष्ट्रीय भावना के लिए अंतिम और अपरिवर्तनीय राजनीतिक हथियार बन सकता है? 1937 में परिस्थितियां अलग थी। स्वतंत्रता आंदोलन अपने निर्णायक चरण में था। विभिन्न समुदायों और राजनीतिक धाराओं को साथ लेकर चलने की आवश्यकता थी। उस समय वंदेमातरम के कुछ अंशों को लेकर जो राजनीतिक समझ बनी, उसका अपना ऐतिहासिक संदर्भ था। आज परिस्थितियां अलग हैं। भारत एक स्वतंत्र, संप्रभु और लोकतांत्रिक गणराज्य है। उसके पास अपना संविधान है, संसद है और लोकतांत्रिक संस्थाएं हैं। इसलिए इतिहास को समझना चाहिए, लेकिन इतिहास को वर्तमान राजनीति का स्थायी हथियार बनाना कितना उचित है, यह प्रश्न भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
लोकतंत्र में सरकार के फैसलों का विरोध विपक्ष का अधिकार ही नहीं, बल्कि उसकी जिम्मेदारी भी है। सरकार गलत करे तो विपक्ष को सवाल उठाने चाहिए। संसद में बहस होनी चाहिए। जनता के बीच वैकल्पिक दृष्टिकोण रखा जाना चाहिए। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब विरोध का आधार केवल यह रह जाए कि फैसला सरकार ने किया है। यदि कोई निर्णय राष्ट्रीय हित में है, तो केवल इसलिए उसका विरोध नहीं किया जा सकता है कि उसे विरोधी दल की सरकार ने लिया है। इसी प्रकार यदि सरकार कोई गलत निर्णय लेती है, तो केवल इसलिए उसका समर्थन नहीं किया जा सकता कि वह अपनी पार्टी की सरकार है। राष्ट्रहित को दलहित से ऊपर रखने की कसौटी यहीं से शुरू होती है।
वंदेमातरम के मामले में सबसे अधिक चिंता इस बात की होनी चाहिए कि कहीं राष्ट्रीय भावना राजनीतिक ध्रुवीकरण की शिकार न हो जाए। भाजपा के लिए यह राष्ट्र सम्मान और राष्ट्रवाद का प्रश्न हो सकता है। कांग्रेस इसे ऐतिहासिक परंपरा, संवैधानिकता और समावेशिता के संदर्भ में देख सकती है। अन्य दलों के अपने दृष्टिकोण हो सकते हैं। लेकिन आम भारतीय के लिए वंदेमातरम इन राजनीतिक व्याख्याओं से कहीं बड़ा है। एक किसान के लिए राष्ट्र उसकी मिट्टी है। एक सैनिक के लिए राष्ट्र उसकी मातृभूमि है। एक विद्यार्थी के लिए राष्ट्र उसके सपनों का भविष्य है। एक श्रमिक के लिए राष्ट्र उसकी मेहनत का मैदान है। एक नागरिक के लिए राष्ट्र उसके अधिकारों और कर्तव्यों का साझा घर है। इसलिए राष्ट्रीय प्रतीकों को राजनीतिक प्रतिस्पर्धा से बचाना सभी दलों की जिम्मेदारी होनी चाहिए।
एक और महत्वपूर्ण प्रश्न सामने आता है कि क्या संसद और संसद द्वारा बनाए गए कानून व्यक्तिगत अथवा दलगत हितों से ऊपर हैं? लोकतंत्र का उत्तर स्पष्ट है कि हां। संसद जनता की संप्रभु इच्छा का प्रतिनिधि संस्थान है। वहां बनाए गए कानूनों और लिए गए निर्णयों पर बहस, आलोचना और न्यायिक समीक्षा की व्यवस्था संविधान ने स्वयं दी है। लेकिन किसी कानून या निर्णय का विरोध केवल राजनीतिक अहंकार के कारण करना लोकतांत्रिक संस्कृति को कमजोर करता है। इसी प्रकार सत्ता पक्ष को भी यह नहीं भूलना चाहिए कि बहुमत का अर्थ निरंकुशता नहीं है। सरकार के पास संख्या बल हो सकता है, लेकिन विपक्ष की आवाज भी लोकतंत्र का अनिवार्य हिस्सा है। सत्ता को विनम्रता चाहिए और विपक्ष को जिम्मेदारी।
राजनीति में सबसे बड़ा भ्रम सत्ता को स्थायी समझ लेना है। इतिहास गवाह है कि कोई भी सत्ता हमेशा नहीं रहती है। आज जो दल सत्ता में है, कल विपक्ष में हो सकता है। आज जो विपक्ष में है, कल सरकार बना सकता है। इसलिए राजनीतिक दलों को अपने वर्तमान फैसलों के दूरगामी प्रभावों के बारे में सोचना चाहिए। यदि आज सत्ता पक्ष विपक्ष की आवाज दबाने के लिए हर संवैधानिक परंपरा को अपने हित में मोड़ता है, तो कल वही परंपरा उसके खिलाफ भी इस्तेमाल हो सकती है। यदि आज विपक्ष सरकार के हर निर्णय का केवल राजनीतिक कारणों से विरोध करता है, तो कल सत्ता में आने पर उसे भी उसी राजनीतिक संस्कृति का सामना करना पड़ सकता है। राजनीति में किया गया प्रत्येक कर्म भविष्य में मिसाल बनता है।
इतिहास को लेकर राजनीति करना आसान है, लेकिन इतिहास से सीख लेना कठिन। वंदेमातरम का इतिहास बताता है कि राष्ट्रीय प्रतीक लोगों को जोड़ने की क्षमता रखते हैं। साथ ही यह भी बताता है कि राजनीतिक परिस्थितियां बदलती रहती है और समाज में विविध भावनाओं का सम्मान आवश्यक है। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि वंदेमातरम को लेकर विवाद को राजनीतिक जीत-हार का प्रश्न न बनाया जाए। न भाजपा को यह मानना चाहिए कि राष्ट्रवाद पर उसका एकाधिकार है और न कांग्रेस को यह भूलना चाहिए कि राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति सम्मान भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की साझा विरासत है।
राष्ट्रवाद केवल नारा लगाने में नहीं है। राष्ट्रवाद संविधान का सम्मान करने में है। कानून का पालन करने में है। कर चुकाने में है। कमजोर व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा करने में है। सैनिकों का सम्मान करने में है। किसानों, मजदूरों, महिलाओं, युवाओं और वंचितों के लिए न्यायपूर्ण व्यवस्था बनाने में है। यदि कोई व्यक्ति जोर से राष्ट्रगीत गाता है, लेकिन सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार को बढ़ावा देता है, तो उसका राष्ट्रवाद अधूरा है। इसी प्रकार यदि कोई व्यक्ति राष्ट्रवादी नारे कम लगाता है, लेकिन ईमानदारी से अपने कर्तव्य का निर्वहन करता है और देश के संविधान तथा कानून का सम्मान करता है, तो उसके योगदान को केवल राजनीतिक नारों की कसौटी पर नहीं परखा जा सकता है। देशभक्ति का सबसे बड़ा प्रमाण चरित्र और कर्म है।
भारत जैसे विशाल और विविध देश में राजनीति आवश्यक है, लेकिन हर चीज को राजनीति बना देना खतरनाक है। धर्म को राजनीति की आग में झोंकना समाज को बांट सकता है। भाषा को राजनीतिक हथियार बनाना सामाजिक तनाव पैदा कर सकता है। इतिहास को पक्ष-विपक्ष की लड़ाई बनाना आने वाली पीढ़ियों को भ्रमित कर सकता है और राष्ट्र प्रतीकों को राजनीतिक वर्चस्व का माध्यम बनाना राष्ट्रीय भावना को कमजोर कर सकता है। इसलिए राजनीतिक दलों को यह तय करना होगा कि कौन से विषय राजनीतिक बहस के लिए हैं और कौन से विषय राष्ट्रीय सहमति की जमीन पर रखे जाने चाहिए। वंदेमातरम जैसे प्रतीकों के साथ संवेदनशीलता और परिपक्वता की आवश्यकता है।
आज के राजनीतिक निर्णय केवल आज के समाचार नहीं हैं। वे आने वाली पीढ़ियों के लिए राजनीतिक संस्कृति का उदाहरण भी बनेंगे। यदि बच्चे यह देखेंगे कि नेता राष्ट्रगीत पर भी दलगत संघर्ष करते हैं, तो उनके मन में राजनीति की कैसी तस्वीर बनेगी? यदि वे देखेंगे कि विरोध केवल विरोध के लिए होता है, तो वे लोकतंत्र के बारे में क्या समझेंगे? और यदि वे देखेंगे कि सत्ता और विपक्ष दोनों राष्ट्रीय हित पर मिलकर खड़े हो सकते हैं, तो उनमें लोकतांत्रिक विश्वास मजबूत होगा। इसलिए आज की राजनीति को केवल चुनाव जीतने की दृष्टि से नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक भविष्य बनाने की दृष्टि से भी देखना होगा।
वंदेमातरम को लेकर चल रही बहस केवल एक गीत की बहस नहीं है। यह भारतीय राजनीति के चरित्र, राष्ट्रवाद की परिभाषा और लोकतांत्रिक मर्यादा की परीक्षा भी है। राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि राष्ट्र किसी दल से बड़ा है, संविधान किसी सरकार से बड़ा है और भारत की जनता किसी राजनीतिक विचारधारा से बड़ी है। अहंकार से सत्ता मिल सकती है, लेकिन सम्मान नहीं। राजनीतिक रणनीति से चुनाव जीता जा सकता है, लेकिन इतिहास नहीं। विरोध से सरकार को चुनौती दी जा सकती है, लेकिन राष्ट्रभावना को कमजोर करके कोई भी दल अंततः मजबूत नहीं हो सकता है।

