डिजिटल दुनिया में बच्चों की बढ़ती भागीदारी के साथ उनकी ऑनलाइन सुरक्षा भी एक बड़ी चुनौती बनती जा रही है। सोशल मीडिया, ऑनलाइन गेमिंग और दूसरे डिजिटल प्लेटफॉर्म जहां बच्चों को सीखने और मनोरंजन के नए अवसर देते हैं, वहीं साइबर बुलिंग, अनुचित सामग्री, ऑनलाइन लत, गेमिंग की निर्भरता और डिजिटल धोखाधड़ी जैसे खतरों का सामना भी करना पड़ सकता है। इन्हीं चिंताओं को ध्यान में रखते हुए भारतीय जनता पार्टी के सांसद बैजयंत पांडा संसद में बच्चों की डिजिटल सुरक्षा से जुड़ा एक प्राइवेट मेंबर बिल लाने की तैयारी में हैं। इस प्रस्तावित विधेयक का नाम ‘सेफगार्डिंग हेल्दी इंटरनेट एनवायरमेंट्स फॉर लिटिल डिजिटल नेटिव्स बिल, 2025’, यानि ‘शील्ड बिल’ है। बिल का मूल उद्देश्य कम उम्र के बच्चों को डिजिटल प्लेटफॉर्म के संभावित दुष्प्रभावों से बचाना और इंटरनेट के सुरक्षित इस्तेमाल के लिए एक मजबूत व्यवस्था तैयार करना है।
शील्ड बिल का सबसे महत्वपूर्ण प्रस्ताव 13 वर्ष से कम उम्र के बच्चों से जुड़ा है। इसके तहत ऐसे बच्चों को माता-पिता या अभिभावक की अनुमति के बिना सोशल मीडिया और ऑनलाइन गेमिंग प्लेटफॉर्म पर अकाउंट बनाने से रोकने का प्रस्ताव है। इस व्यवस्था का मकसद बच्चों को इंटरनेट से पूरी तरह दूर करना नहीं, बल्कि उनकी उम्र और मानसिक विकास को ध्यान में रखते हुए डिजिटल दुनिया में उनकी सुरक्षित भागीदारी सुनिश्चित करना है। कम उम्र में सोशल मीडिया के अत्यधिक इस्तेमाल से पढ़ाई, नींद, सामाजिक व्यवहार और मानसिक एकाग्रता पर पड़ने वाली संभावित चुनौतियों को देखते हुए यह प्रस्ताव महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
प्रस्तावित विधेयक में सोशल मीडिया और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म पर पैरेंटल-कंट्रोल डैशबोर्ड उपलब्ध कराने की बात कही गई है। इसके जरिए माता-पिता अपने बच्चों की डिजिटल गतिविधियों पर नजर रख सकेगे। पैरेंटल-कंट्रोल व्यवस्था में उम्र के अनुरूप सामग्री तक पहुंच, स्क्रीन टाइम और प्लेटफॉर्म के इस्तेमाल से संबंधित गतिविधियों को नियंत्रित करने की सुविधा दी जा सकती है। इससे अभिभावकों को यह समझने में मदद मिलेगी कि बच्चे डिजिटल दुनिया में किस तरह की गतिविधियों में शामिल हो रहे हैं। हालांकि, ऐसी व्यवस्था में बच्चों की निजता और माता-पिता की निगरानी के बीच संतुलन बनाए रखना भी एक महत्वपूर्ण चुनौती होगी।
शील्ड बिल का दायरा केवल सोशल मीडिया तक सीमित नहीं है। इसमें ऑनलाइन गेमिंग और दूसरे डिजिटल प्लेटफॉर्म को भी शामिल करने का प्रस्ताव है। आज बच्चे कम उम्र में ही मोबाइल फोन, टैबलेट और इंटरनेट से जुड़ रहे हैं। ऑनलाइन गेमिंग के मामले में लंबे समय तक स्क्रीन के सामने रहने, इन-गेम खरीदारी और गेमिंग की आदत जैसे मुद्दे अभिभावकों के लिए चिंता का विषय बनते रहे हैं। प्रस्तावित कानून ऐसे प्लेटफॉर्म पर बच्चों की पहुंच को अधिक जिम्मेदार और नियंत्रित बनाने की दिशा में कदम हो सकता है।
विधेयक में डिजिटल प्लेटफॉर्म की जवाबदेही तय करने का भी प्रस्ताव है। नियमों का उल्लंघन करने वाले डिजिटल प्लेटफॉर्म पर 10 करोड़ रुपये तक का जुर्माना लगाने की व्यवस्था प्रस्तावित है। इस प्रावधान का उद्देश्य कंपनियों को बच्चों की उम्र और अभिभावकीय अनुमति से जुड़े नियमों का पालन करने के लिए बाध्य करना है। यदि कोई प्लेटफॉर्म बच्चों की सुरक्षा से जुड़े प्रावधानों की अनदेखी करता है, तो उस पर आर्थिक दंड लगाया जा सकेगा।
यह विधेयक सरकार की ओर से पेश किया जाने वाला सामान्य सरकारी बिल नहीं है, बल्कि प्राइवेट मेंबर बिल है। भाजपा सांसद बैजयंत पांडा इसे संसद में पेश करने वाले हैं। बीते शुक्रवार को सदन की कार्यवाही स्थगित होने के कारण बिल पेश नहीं हो सका। अब इस सप्ताह इसे सदन के पटल पर रखे जाने की संभावना है। बिल पेश होने के बाद ही इसके प्रावधानों, कानूनी प्रभाव और आगे की संसदीय प्रक्रिया पर विस्तार से चर्चा होगी।
शील्ड बिल ऐसे समय में सामने आया है जब बच्चों का डिजिटल दुनिया से जुड़ाव लगातार बढ़ रहा है। इंटरनेट शिक्षा, मनोरंजन और संवाद का महत्वपूर्ण माध्यम बन चुका है, लेकिन इसके साथ सुरक्षा की जिम्मेदारी भी बढ़ी है। ‘शील्ड बिल’ की असली परीक्षा यही होगी कि बच्चों को डिजिटल खतरों से सुरक्षा देने के साथ उन्हें इंटरनेट के सकारात्मक इस्तेमाल से वंचित न किया जाए। अगर प्रस्तावित व्यवस्था में अभिभावकों, बच्चों और डिजिटल प्लेटफॉर्म, तीनों के अधिकारों और जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाया जाता है, तो यह बच्चों के लिए सुरक्षित डिजिटल वातावरण तैयार करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल साबित हो सकती है।

