1 अक्टूबर से बदलेगा मृत्यु प्रमाण पत्र का नियम

Jitendra Kumar Sinha
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मृत्यु के बाद उसका पंजीकरण और मृत्यु प्रमाण पत्र प्राप्त करना परिवार के लिए केवल एक प्रशासनिक औपचारिकता नहीं, बल्कि कई जरूरी कामों के लिए महत्वपूर्ण दस्तावेज है। बैंक खाते, बीमा, पेंशन, संपत्ति, निवेश और अन्य कानूनी प्रक्रियाओं में मृत्यु प्रमाण पत्र की आवश्यकता पड़ती है। ऐसे में मृत्यु का समय पर पंजीकरण कराना बेहद जरूरी है। अब 1 अक्टूबर 2026 से मृत्यु पंजीकरण में देरी से जुड़े नियमों में महत्वपूर्ण बदलाव लागू होने जा रहा है।


केंद्र सरकार ने Registration of Births and Deaths (Amendment) Act, 2026 को 6 अगस्त 2026 को अधिनियमित किया था। इसके बाद गृह मंत्रालय के भारत के महारजिस्ट्रार कार्यालय ने 16 सितंबर 2026 की अधिसूचना के माध्यम से 1 अक्टूबर 2026 को इसके लागू होने की तारीख निर्धारित की। नए संशोधन का प्रमुख संबंध उन मामलों से है, जिनमें जन्म या मृत्यु की जानकारी निर्धारित समय पर रजिस्ट्रार को नहीं दी जाती। खास तौर पर एक वर्ष से अधिक पुरानी और दो वर्ष तक की देरी तथा दो वर्ष से अधिक पुरानी देरी के लिए अलग-अलग स्तर पर अनुमति की व्यवस्था की गई है।


संशोधित कानून के अनुसार यदि मृत्यु की जानकारी एक वर्ष के बाद लेकिन दो वर्ष के भीतर दी जाती है, तो केवल रजिस्ट्रार के स्तर पर पंजीकरण नहीं होगा। इसके लिए संबंधित क्षेत्र के जिलाधिकारी (DM), अनुमंडल पदाधिकारी (SDM) या जिलाधिकारी द्वारा अधिकृत कार्यपालक दंडाधिकारी का आदेश आवश्यक होगा। इसके साथ ही संबंधित अधिकारी मृत्यु की जानकारी और उसके रिकॉर्ड की सत्यता का सत्यापन करेंगे तथा निर्धारित शुल्क का भुगतान करना होगा। यानी एक वर्ष से अधिक लंबित मामलों में अब पहले की तुलना में अधिक औपचारिक प्रक्रिया अपनानी होगी।


सबसे महत्वपूर्ण बदलाव उन मामलों के लिए है, जिनमें मृत्यु के दो वर्ष से अधिक समय बाद पंजीकरण कराने की कोशिश की जाती है। ऐसे मामलों में अब प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट के आदेश की आवश्यकता होगी। न्यायिक मजिस्ट्रेट भी उपलब्ध जानकारी और दस्तावेजों की सत्यता का परीक्षण करने के बाद आदेश देंगे। इसके साथ निर्धारित शुल्क का भुगतान भी करना होगा। इस तरह दो वर्ष से अधिक पुराने मृत्यु पंजीकरण को सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया के बजाय न्यायिक अनुमति से जोड़ दिया गया है।


मृत्यु प्रमाण पत्र परिवार के लिए कई महत्वपूर्ण कार्यों का आधार बनता है। मृतक के बैंक खाते, बीमा पॉलिसी, निवेश, पेंशन, संपत्ति और अन्य वित्तीय या कानूनी मामलों को निपटाने में इसकी आवश्यकता पड़ सकती है। इसलिए मृत्यु के बाद पंजीकरण में अनावश्यक देरी परिवार के लिए भविष्य में अतिरिक्त प्रशासनिक परेशानी पैदा कर सकती है।


सरकार की व्यवस्था का उद्देश्य जन्म और मृत्यु के रिकॉर्ड को अधिक व्यवस्थित और विश्वसनीय बनाना तथा लंबे समय तक लंबित पंजीकरणों में सत्यापन की प्रक्रिया को मजबूत करना है। एक वर्ष से अधिक पुराने मामलों के लिए प्रशासनिक स्तर पर सत्यापन और दो वर्ष से अधिक पुराने मामलों के लिए न्यायिक आदेश की व्यवस्था इसी दिशा में उठाया गया कदम है। डिजिटल माध्यमों से जन्म-मृत्यु पंजीकरण को सरल बनाने के प्रयास भी पहले से जारी हैं। केंद्र सरकार के अनुसार संशोधित नागरिक पंजीकरण प्रणाली में ऑनलाइन भुगतान, विलंबित रिपोर्टिंग, एसएमएस/ई-मेल सूचना, ई-साइन और इलेक्ट्रॉनिक प्रमाण पत्र जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही है।


नए नियमों का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि मृत्यु के बाद उसके पंजीकरण को टालना भविष्य में परेशानी का कारण बन सकता है। खासकर ग्रामीण और दूरदराज क्षेत्रों में रहने वाले परिवारों को मृत्यु की सूचना और आवश्यक दस्तावेज समय पर संबंधित पंजीकरण प्राधिकारी तक पहुंचाने के प्रति जागरूक होना होगा। 1 अक्टूबर 2026 के बाद लंबित मामलों में देरी की अवधि के अनुसार मंजूरी का स्तर तय होगा। इसलिए मृत्यु पंजीकरण को केवल प्रमाण पत्र लेने की प्रक्रिया न समझकर परिवार और सरकारी रिकॉर्ड दोनों के लिए आवश्यक जिम्मेदारी के रूप में देखना होगा। समय पर कराया गया पंजीकरण न केवल कानूनी रिकॉर्ड को सही रखता है, बल्कि भविष्य में परिवार को अनावश्यक कार्यालयी और न्यायिक प्रक्रिया से भी बचा सकता है।




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