परिवार जीवन की वह संस्था है, जिसकी मजबूती केवल कमाई से नहीं, बल्कि आपसी सहयोग, विश्वास, त्याग और जिम्मेदारी से तय होती है। बदलते समय के साथ परिवार की परिभाषा और उसमें पति-पत्नी की भूमिकाएं भी बदल रही है। इसी बदलती सामाजिक सोच को मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ की एक टिप्पणी ने नए ढंग से सामने रखा है। एक वैवाहिक विवाद से जुड़े मामले में अदालत ने कहा कि यदि घर संभालने वाली महिला को ‘हाउसवाइफ’ कहा जा सकता है, तो घरेलू जिम्मेदारियां निभाने वाले पुरुष को ‘हाउस हसबैंड’ कहने में भी कोई असंगति नहीं होनी चाहिए। यह टिप्पणी केवल दो शब्दों ‘हाउसवाइफ’ और ‘हाउस हसबैंड’ के बीच का अंतर नहीं है। इसके पीछे परिवार में श्रम, जिम्मेदारी, सम्मान और समानता को देखने की बदलती दृष्टि छिपी है। सवाल यह नहीं है कि घर कौन संभाल रहा है, बल्कि यह है कि घर संभालने के योगदान को हम कितना महत्व देते हैं।
समाज में लंबे समय तक नौकरी और आय को व्यक्ति के योगदान का प्रमुख पैमाना माना जाता रहा है। जो व्यक्ति कार्यालय जाता है, वेतन प्राप्त करता है और आर्थिक रूप से परिवार में योगदान देता है, उसके काम को सहज रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है। इसके विपरीत घर संभालने वाले व्यक्ति के काम को कई बार ‘घर पर रहना’ भर समझ लिया जाता है। लेकिन घर चलाना वास्तव में निरंतर जिम्मेदारी का काम है। बच्चों की देखभाल, भोजन की व्यवस्था, घर की साफ-सफाई, बुजुर्गों की जरूरतों का ध्यान, घरेलू सामान की व्यवस्था, बच्चों की पढ़ाई, स्वास्थ्य संबंधी आवश्यकताएं और परिवार के सदस्यों की दिनचर्या का समन्वय, ये सभी काम समय और श्रम मांगते हैं। इनमें से अधिकांश कामों का कोई निश्चित कार्यालय समय नहीं होता है। न छुट्टी होती है और न ही हमेशा इसका प्रत्यक्ष आर्थिक मूल्य दिखाई देता है। फिर भी परिवार के सुचारु संचालन में इनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। इसलिए गृहिणी के श्रम को सम्मान देना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी उस पुरुष के योगदान को स्वीकार करना भी है जो परिस्थितियों के कारण या अपनी पसंद से परिवार की घरेलू जिम्मेदारियां संभालता है।
‘हाउस हसबैंड’ शब्द पहली नजर में नया या असामान्य लग सकता है। इसका कारण यह है कि हमारी सामाजिक भाषा में घरेलू भूमिका को लंबे समय तक मुख्यतः महिलाओं से जोड़कर देखा गया। पुरुष से सामान्यतः आर्थिक जिम्मेदारी उठाने की अपेक्षा की गई और महिला से घर संभालने की। लेकिन जीवन हमेशा एक ही ढांचे में नहीं चलता है। किसी परिवार में पत्नी की नौकरी अधिक व्यस्त हो सकती है। किसी परिवार में पति का काम घर से करने वाला हो सकता है। किसी परिस्थिति में पत्नी परिवार की मुख्य आय अर्जित कर सकती है और पति बच्चों तथा घर की जिम्मेदारी संभाल सकता है। कभी स्वास्थ्य, नौकरी, स्थानांतरण या अन्य पारिवारिक परिस्थितियां भी भूमिकाओं को बदल देती है। ऐसे में यदि कोई पुरुष घर संभाल रहा है तो उसके योगदान को कमतर समझना उचित नहीं है। ‘हाउस हसबैंड’ शब्द इसी वास्तविकता को सामाजिक पहचान देने का एक माध्यम बन सकता है।
यह प्रश्न स्वयं हमारी सोच की परीक्षा लेता है। यदि एक महिला दिनभर घर संभालती है तो हम उसे गृहिणी कहते हैं। लेकिन जब वही जिम्मेदारी पुरुष निभाता है तो कई बार उसके काम को मजाक, आश्चर्य या असामान्य व्यवहार की नजर से देखा जाता है। यही दोहरा नजरिया बदलने की जरूरत है। घर की जिम्मेदारी पुरुष निभाए या महिला, उसमें श्रम और समय तो समान रूप से लगता है। बच्चों की देखभाल पिता करे तो वह भी उतनी ही जिम्मेदारी है जितनी मां द्वारा निभाई जाने वाली जिम्मेदारी। परिवार के बुजुर्गों की सेवा पुरुष करे तो उसका महत्व कम नहीं हो जाता है। भोजन बनाना, घर की खरीदारी करना, बच्चों को स्कूल ले जाना, डॉक्टर के पास ले जाना या घर की दिनचर्या संभालना किसी व्यक्ति के लिए इसलिए कम महत्वपूर्ण नहीं हो जाता है क्योंकि उसके बदले वेतन नहीं मिलता है। इस दृष्टि से ‘हाउस हसबैंड’ शब्द केवल पुरुष के लिए एक नया संबोधन नहीं, बल्कि घरेलू श्रम की सामाजिक प्रतिष्ठा से जुड़ा प्रश्न है।
विवाह को यदि केवल आर्थिक व्यवस्था मान लिया जाए तो पति-पत्नी की भूमिकाएं भी आय और रोजगार के आधार पर तय होने लगती है। पति और पत्नी दो ऐसे व्यक्ति हैं जो जीवन की जिम्मेदारियों को साझा करते हैं। परिस्थितियों के अनुसार, उनका काम बदल सकता है। आज पति नौकरी कर रहा है और पत्नी घर संभाल रही है, तो कल किसी कारण से पत्नी नौकरी कर सकती है और पति घर की जिम्मेदारी संभाल सकता है। कई परिवारों में दोनों पति-पत्नी नौकरी करते हैं और घर का काम भी आपस में बांटते हैं। कहीं एक व्यक्ति बच्चों की जिम्मेदारी अधिक उठाता है, तो दूसरा आर्थिक जिम्मेदारी। कहीं बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल किसी एक की प्राथमिक जिम्मेदारी बन जाती है। इन सभी व्यवस्थाओं में कोई एक सार्वभौमिक मॉडल नहीं हो सकता है। परिवार की परिस्थितियां तय करती है कि कौन कौन-सी जिम्मेदारी निभाएगा।
परिवार को एक रथ की तरह समझा जा सकता है, जिसके दोनों पहियों की अपनी भूमिका है। आर्थिक संसाधन परिवार की आवश्यकताओं को पूरा करने में मदद करते हैं, जबकि घरेलू प्रबंधन परिवार को व्यवस्थित रखता है। यदि कोई व्यक्ति बाहर काम करके आय अर्जित करता है और दूसरा घर तथा बच्चों की जिम्मेदारी संभालता है, तो दोनों के योगदान को अलग-अलग पैमानों से देखना चाहिए, न कि एक को दूसरे से कमतर मानना चाहिए। घर संभालने वाला व्यक्ति उस वातावरण का निर्माण करता है जिसमें परिवार के दूसरे सदस्य अपना काम बेहतर ढंग से कर पाते हैं। बच्चों की दिनचर्या से लेकर बुजुर्गों की जरूरत तक अनेक ऐसी जिम्मेदारियां होती है जिनका प्रत्यक्ष आर्थिक मूल्य तय करना कठिन है। इसलिए परिवार में योगदान का अर्थ केवल बैंक खाते में जमा होने वाली राशि नहीं है।
भारतीय समाज में गृहिणी की भूमिका पर लंबे समय से चर्चा होती रही है। यह स्वीकार करने की आवश्यकता है कि घर संभालना भी श्रम है। लेकिन इसी विचार को आगे बढ़ाने पर यह भी स्पष्ट होता है कि यदि वही काम पुरुष करे तो उसका श्रम भी सम्मान का अधिकारी है। यहां उद्देश्य महिला और पुरुष की भूमिकाओं की अदला-बदली को अनिवार्य बनाना नहीं है। उद्देश्य केवल इतना है कि किसी व्यक्ति की भूमिका को उसके लिंग के आधार पर छोटा-बड़ा न माना जाए। महिला घर संभालना चाहती है तो उसका सम्मान होना चाहिए। पुरुष घर संभालता है तो उसका भी सम्मान होना चाहिए। दोनों नौकरी करते हैं तो घरेलू काम के बंटवारे का रास्ता दोनों मिलकर तय कर सकते हैं। यही वास्तविक समानता का व्यावहारिक रूप है।
भारतीय परिवार व्यवस्था में परिवार को केवल पति-पत्नी और बच्चों की इकाई के रूप में नहीं देखा गया है। माता-पिता, दादा-दादी, भाई-बहन और अन्य रिश्तेदार भी अनेक परिवारों में जीवन का हिस्सा रहे हैं। ऐसी व्यवस्था में जिम्मेदारियों का स्वरूप भी व्यापक रहा है। परिवार के भीतर हर व्यक्ति अपनी क्षमता और परिस्थिति के अनुसार योगदान देता रहा है। कोई आर्थिक जिम्मेदारी उठाता है, कोई बच्चों की देखभाल करता है, कोई बुजुर्गों की सेवा करता है और कोई घरेलू व्यवस्था संभालता है। इसलिए घरेलू जिम्मेदारियों का सम्मान भारतीय पारिवारिक मूल्यों के विरुद्ध नहीं, बल्कि सहयोग की उसी भावना का विस्तार है।
आज शिक्षा, रोजगार, शहरीकरण और तकनीक ने पारिवारिक जीवन को काफी बदला है। महिलाएं बड़ी संख्या में पेशेवर क्षेत्रों में आगे बढ़ रही हैं। पुरुष भी बच्चों की परवरिश और घरेलू जिम्मेदारियों में पहले की तुलना में अधिक सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। वर्क फ्रॉम होम और हाइब्रिड काम जैसी व्यवस्थाओं ने भी घर और कार्यालय के बीच पारंपरिक अंतर को कुछ हद तक कम किया है। ऐसे वातावरण में पति-पत्नी के बीच काम का बंटवारा पहले से अधिक लचीला हो सकता है। अब यह जरूरी नहीं है कि परिवार में पुरुष की भूमिका केवल कमाने वाले की हो और महिला की भूमिका केवल घर संभालने वाली की। परिस्थितियां अलग-अलग हो सकती है और परिवार अपने लिए उपयुक्त व्यवस्था चुन सकता है।
माता-पिता के बीच जिम्मेदारियों का संतुलित बंटवारा बच्चों की सोच पर भी प्रभाव डाल सकता है। यदि बच्चा देखता है कि पिता भोजन बना रहे हैं, स्कूल का काम देख रहे हैं या घर की व्यवस्था संभाल रहे हैं, तो उसके मन में घरेलू काम को केवल महिलाओं का काम मानने की धारणा कमजोर हो सकती है। इसी तरह यदि बच्चा अपनी मां को पेशेवर जिम्मेदारी निभाते हुए देखता है और पिता को घरेलू जिम्मेदारियों में सहयोग करते हुए, तो उसके सामने परिवार और काम के बीच साझेदारी की एक व्यापक तस्वीर बनती है। बच्चे केवल कही गई बातों से नहीं, बल्कि घर में देखे गए व्यवहार से भी बहुत कुछ सीखते हैं।
किसी भी परिवार में सबसे बड़ी समस्या तब पैदा होती है जब पति-पत्नी एक-दूसरे के काम की तुलना करने लगते हैं। ‘मैं ज्यादा कमाता हूं।’ ‘मैं पूरा दिन घर संभालती हूं।’ ‘तुम्हारा काम आसान है।’ ‘तुम घर पर ही तो रहते हो।’ ऐसी सोच रिश्तों में दूरी पैदा कर सकती है। जबकि वास्तविकता यह है कि परिवार में अलग-अलग जिम्मेदारियां होती है और उनका महत्व अलग-अलग परिस्थितियों में सामने आता है। यदि पति बाहर काम करता है और पत्नी घर संभालती है तो दोनों एक-दूसरे के सहयोगी है। यदि पत्नी नौकरी करती है और पति घर संभालता है तो भी दोनों सहयोगी है और यदि दोनों नौकरी करते हुए घर संभालते हैं तो भी वही साझेदारी आवश्यक है।
भाषा केवल शब्दों का समूह नहीं होती है। वह समाज की सोच को भी प्रतिबिंबित करती है। ‘हाउसवाइफ’ शब्द लंबे समय से प्रचलित है। ‘हाउस हसबैंड’ शब्द का अधिक सहज स्वीकार होना यह दिखा सकता है कि घरेलू जिम्मेदारी को अब केवल महिला की भूमिका मानने की धारणा बदल रही है। हालांकि किसी व्यक्ति को कौन-सा संबोधन पसंद है, यह व्यक्तिगत विषय है। कोई स्वयं को गृहपति कह सकता है, कोई घर संभालने वाला पिता या पति कहलाना पसंद कर सकता है। महत्वपूर्ण शब्द से ज्यादा उस भूमिका के प्रति सम्मान है।
पति-पत्नी के संबंध में अधिकार और जिम्मेदारी का संतुलन तभी बनता है जब दोनों एक-दूसरे को बराबर का सहभागी समझें। परिवार कोई ऐसा संस्थान नहीं है जहां एक व्यक्ति आदेश दे और दूसरा केवल पालन करे। परिवार एक साझा यात्रा है। कभी एक व्यक्ति आगे बढ़कर जिम्मेदारी उठाता है, कभी दूसरा। कभी आर्थिक दबाव अधिक होता है, कभी बच्चों की जरूरतें प्राथमिकता बन जाती है। कभी नौकरी महत्वपूर्ण होती है, कभी घर की आवश्यकता। ऐसे में भूमिकाओं का बदलना कमजोरी नहीं, बल्कि परिस्थितियों के अनुरूप परिवार के ढलने की क्षमता है।
मद्रास हाईकोर्ट की टिप्पणी का व्यापक सामाजिक संदर्भ यही है कि घरेलू जिम्मेदारियों को लिंग की स्थायी सीमा में बांधकर नहीं देखा जाना चाहिए। ‘हाउस हसबैंड’ शब्द इस बहस को एक सरल भाषा देता है, लेकिन असली मुद्दा शब्द से कहीं बड़ा है। मुद्दा है घरेलू श्रम का सम्मान। मुद्दा है पति-पत्नी के बीच साझेदारी। मुद्दा है बच्चों और बुजुर्गों की देखभाल को परिवार की साझा जिम्मेदारी मानना। मुद्दा है उस सोच को बदलना जिसमें कमाई को ही योगदान का एकमात्र पैमाना मान लिया जाता है। परिवार तब मजबूत नहीं होता है जब उसमें पति और पत्नी अपनी-अपनी भूमिकाओं की श्रेष्ठता साबित करते रहें। परिवार तब मजबूत होता है जब दोनों यह समझें कि उनकी जिम्मेदारियां अलग हो सकती है, लेकिन उद्देश्य एक है।
आज परिवार के सामने चुनौतियां भी नई हैं और संभावनाएं भी। नौकरी का दबाव, बढ़ती जीवन-व्यस्तता, बच्चों की शिक्षा, बुजुर्गों की देखभाल और व्यक्तिगत आकांक्षाओं के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं है। ऐसे में पति-पत्नी यदि जरूरत के अनुसार अपनी भूमिकाएं बदल सके तो परिवार अधिक सहजता से परिस्थितियों का सामना कर सकता है। ‘हाउसवाइफ’ और ‘हाउस हसबैंड’ के बीच तुलना करने के बजाय दोनों भूमिकाओं को सम्मान की दृष्टि से देखना अधिक जरूरी है। घर संभालने वाला व्यक्ति परिवार की नींव को मजबूत करता है और बाहर काम करने वाला व्यक्ति परिवार की आर्थिक जरूरतों को पूरा करता है। कई बार एक ही व्यक्ति दोनों जिम्मेदारियां निभाता है।
परिवार की सफलता इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि कौन कितना कमाता है या कौन कितना घरेलू काम करता है। उसकी वास्तविक शक्ति इस बात में है कि उसके सदस्य एक-दूसरे के योगदान को कितनी समझ और सम्मान के साथ स्वीकार करते हैं। मद्रास हाईकोर्ट की टिप्पणी इसी बदलते सामाजिक विमर्श की ओर ध्यान खींचती है। ‘हाउस हसबैंड’ शब्द भले नया लगे, लेकिन उसके पीछे छिपा विचार बहुत सरल है कि घर संभालना कोई छोटा काम नहीं और परिवार की जिम्मेदारी किसी एक लिंग की बपौती नहीं। आज जरूरत इस बात की है कि पति-पत्नी के बीच यह सवाल कम हो कि “कौन क्या कर रहा है?” और यह भावना अधिक मजबूत हो कि “हम दोनों मिलकर अपने परिवार के लिए क्या कर रहे हैं?” यही साझेदारी विवाह को केवल सामाजिक संस्था नहीं, बल्कि जीवन की सच्ची सहयात्रा बनाती है।

