हिन्दी सिनेमा के इतिहास में सत्तर का दशक अपनी अलग पहचान रखता है। यह वह दौर था जब फिल्मों में कहानी, भावनाओं और संगीत का खास महत्व हुआ करता था। इसी दौर में कई ऐसी फिल्में आईं, जो बॉक्स ऑफिस पर बहुत बड़ी सफलता हासिल नहीं कर सकीं, लेकिन अपने कलाकारों के अभिनय, संगीत और गीतों की वजह से दर्शकों की स्मृतियों में लंबे समय तक बनी रहीं। ऐसी ही फिल्मों में ‘जिद’ का नाम भी लिया जा सकता है। नूतन, सारिका, सचिन पिलगांवकर और प्रेमनाथ जैसे कलाकारों से सजी यह फिल्म भले ही व्यावसायिक रूप से कोई बड़ी हिट साबित न हुई हो, लेकिन इसमें मौजूद अभिनय और संगीत इसे खास बनाते हैं।
‘जिद’ की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक थी अभिनेत्री नूतन। हिंदी फिल्मों की उन अभिनेत्रियों में नूतन का नाम बेहद सम्मान के साथ लिया जाता है, जिन्होंने अपने अभिनय से महिला किरदारों को गहराई और संवेदनशीलता प्रदान की। उनके चेहरे के भाव, संवाद अदायगी और सहज अभिनय में वह प्रभाव था, जो बिना किसी अतिरिक्त प्रदर्शन के दर्शकों तक पहुंच जाता था। ‘जिद’ में भी नूतन की मौजूदगी फिल्म को एक अलग वजन देती है। वह जिस भी दृश्य में दिखाई देती हैं, उनकी अभिनय क्षमता सहज ही ध्यान खींच लेती है। यही कारण है कि फिल्म की चर्चा करते समय आज भी नूतन का नाम प्रमुखता से लिया जाता है।
फिल्म में सारिका और सचिन पिलगांवकर जैसे युवा कलाकार भी महत्वपूर्ण भूमिकाओं में नजर आए। उस दौर में दोनों कलाकार हिंदी सिनेमा में अपनी पहचान मजबूत कर रहे थे। उनके अभिनय में युवावस्था की सहजता और भावनात्मक उतार-चढ़ाव दिखाई देते थे। नूतन जैसे अनुभवी कलाकार के साथ युवा कलाकारों की मौजूदगी ने फिल्म के भावनात्मक संसार को विस्तार दिया। वहीं प्रेमनाथ जैसे वरिष्ठ अभिनेता ने अपने अनुभव और प्रभावशाली अभिनय से फिल्म के कलाकारों की मजबूत टीम को और समृद्ध किया।
‘जिद’ का निर्देशन विजय ने किया था। सत्तर के दशक के हिंदी सिनेमा में निर्देशकों के सामने एक बड़ी चुनौती होती थी—कहानी, अभिनय और संगीत को इस तरह प्रस्तुत करना कि फिल्म दर्शकों के दिल तक पहुंच सके। ‘जिद’ इसी दौर की उस फिल्मी परंपरा का हिस्सा थी, जिसमें कहानी के साथ भावनाओं और गीत-संगीत को भी महत्वपूर्ण स्थान दिया जाता था। फिल्म की कहानी और प्रस्तुति भले ही इसे उस स्तर की व्यावसायिक सफलता नहीं दिला सकी, जिसकी उम्मीद किसी बड़े सितारों वाली फिल्म से की जाती है, लेकिन इसके कुछ हिस्से आज भी दर्शकों को आकर्षित करते हैं।
अगर ‘जिद’ की सबसे यादगार खूबियों की बात की जाए तो रवींद्र जैन का संगीत निश्चित रूप से शीर्ष पर रहेगा। रवींद्र जैन उन संगीतकारों में थे, जिन्होंने भारतीय शास्त्रीय और लोक संगीत की मिठास को लोकप्रिय हिंदी फिल्म संगीत के साथ खूबसूरती से जोड़ा। ‘जिद’ के गीतों में भी उनकी वही मधुरता सुनाई देती है। ‘तेरी पलकों के तले’ और ‘तेरे लिए मैंने थामी रे माला’ जैसे गीत फिल्म के संगीत पक्ष को मजबूत बनाते हैं। इन गीतों में भावनाओं की कोमलता और धुनों की मिठास सुनने वाले को उस दौर की याद दिलाती है। वहीं ‘होली है हो हो ला ला...’ जैसे गीत फिल्म के संगीत संसार में उत्सव और उमंग का रंग भरते हैं। आज भी पुराने हिंदी फिल्म संगीत के शौकीनों के बीच ऐसे गीत अपनी जगह बनाए हुए है।
किसी फिल्म की सफलता का आकलन केवल बॉक्स ऑफिस के आंकड़ों से नहीं किया जा सकता। हिंदी सिनेमा के इतिहास में ऐसी अनेक फिल्में हैं, जिन्हें रिलीज के समय अपेक्षित सफलता नहीं मिली, लेकिन वर्षों बाद उनके कलाकारों, गीतों या कहानी के कारण वे याद की जाने लगीं। ‘जिद’ भी इसी श्रेणी की फिल्म मानी जा सकती है। इस फिल्म को याद करने वालों के लिए नूतन का अभिनय और रवींद्र जैन की मधुर धुनें सबसे बड़ी वजह हैं। फिल्म के गीतों ने उसे समय की सीमाओं से आगे पहुंचाया।
आज जब हिन्दी सिनेमा तकनीक, भव्य सेट और आधुनिक प्रस्तुति के दौर में पहुंच चुका है, तब सत्तर के दशक की फिल्मों को देखना एक अलग अनुभव देता है। उस समय फिल्मों में भावनाओं को प्रमुखता मिलती थी और गीत कहानी का अभिन्न हिस्सा हुआ करते थे। ‘जिद’ उसी सिनेमाई दौर की याद दिलाती है। इसमें नूतन जैसी महान अभिनेत्री की प्रभावशाली उपस्थिति, सारिका और सचिन पिलगांवकर जैसे कलाकारों की ऊर्जा, प्रेमनाथ का अनुभव और रवींद्र जैन का मधुर संगीत एक साथ देखने-सुनने को मिलता है।
‘जिद’ भले ही बॉक्स ऑफिस की बड़ी सफल फिल्मों की सूची में अपना नाम न बना सकी हो, लेकिन अच्छे अभिनय और मधुर संगीत के कारण यह सत्तर के दशक की उन फिल्मों में शामिल है, जिन्हें आज भी पुराने हिन्दी सिनेमा के प्रशंसक याद करते हैं। यही किसी फिल्म की वास्तविक विरासत भी है, समय गुजर जाए, लेकिन उसके किरदार, चेहरे और गीत लोगों की यादों में जीवित रहें।

