कचरे से बनी सड़क - जिंदल स्टील का नाम गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड में हुआ दर्ज

Jitendra Kumar Sinha
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भारत में औद्योगिक विकास के साथ-साथ औद्योगिक कचरे के निपटारे की चुनौती भी लगातार बढ़ रही है। खासकर इस्पात उद्योग से निकलने वाला स्टील स्लैग लंबे समय से ऐसा औद्योगिक अपशिष्ट रहा है, जिसके सुरक्षित और उपयोगी निस्तारण को लेकर वैज्ञानिक प्रयास किए जाते रहे हैं। अब इसी चुनौती को अवसर में बदलते हुए जिंदल स्टील लिमिटेड ने एक ऐसी उपलब्धि हासिल की है, जिसने भारत के साथ-साथ दुनिया का ध्यान आकर्षित किया है। छत्तीसगढ़ के रायगढ़ में कंपनी ने 100 प्रतिशत स्टील स्लैग का उपयोग कर 1.85 किलोमीटर लंबी और चार लेन वाली सड़क का निर्माण किया है। इस सड़क को दुनिया की सबसे लंबी ऐसी सड़क के रूप में गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में आधिकारिक तौर पर दर्ज किया गया है। यह उपलब्धि केवल किसी कंपनी के लिए रिकॉर्ड नहीं है, बल्कि औद्योगिक कचरे को उपयोगी संसाधन में बदलने की भारतीय क्षमता का भी प्रमाण है।


सड़क निर्माण में आमतौर पर प्राकृतिक पत्थरों से प्राप्त गिट्टी और अन्य खनिज सामग्रियों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता है। इसके लिए पत्थरों का खनन किया जाता है, जिससे प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव पड़ता है और पर्यावरणीय प्रभाव भी उत्पन्न होते हैं। रायगढ़ की यह सड़क इस पारंपरिक व्यवस्था का एक वैकल्पिक मॉडल प्रस्तुत करती है। सड़क की निर्माण प्रक्रिया में बेस से लेकर ऊपर की डामर यानी बिटुमिन वाली परत तक प्राकृतिक गिट्टी के स्थान पर प्रसंस्कृत स्टील स्लैग का इस्तेमाल किया गया है। इस परियोजना में लगभग 2 लाख टन प्रसंस्कृत स्टील स्लैग की खपत हुई है। इतनी बड़ी मात्रा में औद्योगिक अपशिष्ट को सड़क निर्माण में उपयोग करना इस बात का संकेत है कि सही वैज्ञानिक प्रक्रिया और तकनीक के माध्यम से कचरा भी विकास का महत्वपूर्ण संसाधन बन सकता है।


रायगढ़ में निर्मित यह सड़क अब केवल स्थानीय स्तर की परियोजना नहीं रही। इसके गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज होने से इसे अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली है। यह उपलब्धि इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत तेजी से बुनियादी ढांचे का विस्तार कर रहा है। देश में सड़क, रेलवे, बंदरगाह, औद्योगिक गलियारे और शहरी परिवहन परियोजनाओं का विस्तार हो रहा है। ऐसे समय में सड़क निर्माण के लिए वैकल्पिक और टिकाऊ सामग्री विकसित करना भविष्य की जरूरत है। जिंदल स्टील ने इस परियोजना को सीएसआईआर-केंद्रीय सड़क अनुसंधान संस्थान (CRRI) के सहयोग से पूरा किया है। उद्योग और वैज्ञानिक संस्थान के बीच यह सहयोग इस बात का उदाहरण है कि अनुसंधान प्रयोगशालाओं में विकसित तकनीक जब उद्योग तक पहुंचती है, तो उसका वास्तविक लाभ समाज और पर्यावरण दोनों को मिल सकता है।


स्टील स्लैग को समझना इस पूरी उपलब्धि की अहमियत को समझने के लिए जरूरी है। स्टील उत्पादन के दौरान भट्टियों में कई तरह की प्रक्रियाएं होती हैं। इन्हीं प्रक्रियाओं से निकलने वाला एक ठोस औद्योगिक अपशिष्ट स्टील स्लैग कहलाता है। लंबे समय तक इसे मुख्य रूप से अपशिष्ट के रूप में देखा जाता रहा। लेकिन वैज्ञानिक अनुसंधान ने यह साबित करने की दिशा में रास्ता खोला कि उचित प्रसंस्करण के बाद इसका इस्तेमाल निर्माण कार्यों में किया जा सकता है। स्टील स्लैग को सड़क निर्माण के योग्य बनाने के लिए इसे सीधे इस्तेमाल नहीं किया जाता। इसके लिए वैज्ञानिक और तकनीकी प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है। इसमें क्रशिंग, धातु निष्कर्षण और सटीक ग्रेडिंग जैसी प्रक्रियाएं शामिल हैं। इन प्रक्रियाओं के बाद इसे सड़क निर्माण के लिए उपयुक्त रोड-ग्रेड एग्रीगेट यानी स्टील ग्रिट में बदला जाता है। यानि भट्ठी से निकला औद्योगिक अपशिष्ट एक लंबी वैज्ञानिक प्रक्रिया के बाद सड़क निर्माण की मजबूत सामग्री में बदल जाता है।


जिंदल स्टील के चेयरमैन नवीन जिंदल ने इस उपलब्धि को ‘वेस्ट टू वेल्थ’ का उत्कृष्ट उदाहरण बताया है। इस अवधारणा का मूल विचार यही है कि जिसे आज हम कचरा समझ रहे हैं, उसमें भी आर्थिक और सामाजिक उपयोग की संभावना खोजी जाए। औद्योगिक विकास में यह सोच बेहद महत्वपूर्ण होती जा रही है। यदि किसी कारखाने से निकलने वाले अपशिष्ट को बिना उपयोग के छोड़ दिया जाए, तो उसके निस्तारण की समस्या पैदा होती है। लेकिन यदि उसी अपशिष्ट को वैज्ञानिक तरीके से संसाधित कर उपयोगी उत्पाद बनाया जाए, तो समस्या समाधान में बदल जाती है। स्टील स्लैग से बनी सड़क इसी परिवर्तन की कहानी कहती है, कचरे से संसाधन, संसाधन से निर्माण और निर्माण से राष्ट्र की प्रगति। नवीन जिंदल के अनुसार, विज्ञान, तकनीक और उद्योग मिलकर औद्योगिक कचरे को राष्ट्र निर्माण के टिकाऊ संसाधनों में बदल सकते हैं। यही सोच आने वाले वर्षों में भारत की निर्माण अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।


केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने भी इस उपलब्धि को स्वदेशी वैज्ञानिक क्षमता और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में मील का पत्थर बताया है। दरअसल, इस परियोजना की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि इसमें आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण को एक-दूसरे का विरोधी नहीं, बल्कि सहयोगी बनाया गया है। विकास के लिए सड़कें जरूरी हैं। सड़क निर्माण के लिए बड़ी मात्रा में निर्माण सामग्री भी चाहिए। यदि उस सामग्री का एक बड़ा हिस्सा औद्योगिक अपशिष्ट से प्राप्त किया जा सके, तो प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव कम करने की संभावना पैदा होती है। इस दृष्टि से स्टील स्लैग सड़कें भारत के लिए भविष्य की एक महत्वपूर्ण तकनीकी दिशा बन सकती हैं।


रायगढ़ की 1.85 किलोमीटर लंबी चार लेन सड़क में लगभग 2,00,000 टन प्रसंस्कृत स्टील स्लैग का इस्तेमाल हुआ है। यह आंकड़ा अपने आप में इस परियोजना के पैमाने को दर्शाता है। कल्पना कीजिए कि इतनी बड़ी मात्रा में औद्योगिक अपशिष्ट यदि उपयोगी निर्माण सामग्री में परिवर्तित न होता, तो उसके भंडारण और निस्तारण के लिए अतिरिक्त व्यवस्था करनी पड़ती। इसके विपरीत, यहां उसी सामग्री का उपयोग सार्वजनिक बुनियादी ढांचे के निर्माण में किया गया। इससे दोहरा लाभ दिखाई देता है, एक तरफ औद्योगिक अपशिष्ट के उपयोग का रास्ता खुलता है, दूसरी तरफ सड़क निर्माण के लिए वैकल्पिक सामग्री उपलब्ध होती है।


रायगढ़ की इस सड़क की एक और खासियत इसकी संरचनात्मक दक्षता है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, यह सड़क सामान्य सड़कों की तुलना में करीब 35 प्रतिशत पतली है। पतली होने के बावजूद इसकी मजबूती को कम नहीं आंका जा सकता। इसके पीछे स्टील स्लैग से तैयार किए गए एग्रीगेट की विशेष भौतिक विशेषताएं महत्वपूर्ण हैं। यदि कम मोटाई में अपेक्षित मजबूती हासिल की जा सके, तो सड़क निर्माण में सामग्री की खपत, परिवहन और निर्माण प्रक्रिया की दक्षता पर सकारात्मक असर पड़ सकता है। यह मॉडल भविष्य में उन क्षेत्रों के लिए भी उपयोगी हो सकता है, जहां भारी यातायात वाली सड़कें बनाने की जरूरत है और टिकाऊ निर्माण सामग्री की तलाश जारी है।


परियोजना की आर्थिक उपयोगिता भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इस सड़क के निर्माण में लागत 30 से 40 प्रतिशत तक अधिक किफायती रही है। भारत जैसे विशाल देश में सड़क निर्माण पर हर वर्ष भारी निवेश किया जाता है। ऐसे में यदि वैकल्पिक निर्माण सामग्री के माध्यम से गुणवत्ता बनाए रखते हुए लागत कम की जा सके, तो इसका व्यापक आर्थिक प्रभाव हो सकता है। हालांकि वास्तविक बचत स्थान, सामग्री की उपलब्धता, प्रसंस्करण, परिवहन और परियोजना की प्रकृति के अनुसार अलग-अलग हो सकती है। फिर भी रायगढ़ की परियोजना यह संकेत देती है कि औद्योगिक उप-उत्पादों के उपयोग से सड़क निर्माण की अर्थव्यवस्था को नई दिशा दी जा सकती है।


औद्योगिक और वाणिज्यिक क्षेत्रों में बनने वाली सड़कों पर भारी ट्रकों का लगातार दबाव रहता है। सामान्य सड़कें लगातार भारी यातायात के कारण जल्दी क्षतिग्रस्त हो सकती हैं और उन्हें समय-समय पर मरम्मत की आवश्यकता पड़ती है। रायगढ़ की यह सड़क भारी व्यावसायिक ट्रकों का भार सहने में सक्षम बताई गई है। इसकी उच्च मजबूती का एक बड़ा लाभ यह हो सकता है कि सड़क की कार्यक्षमता लंबे समय तक बनी रहे। सड़क की मजबूती केवल सुविधा का विषय नहीं है। बार-बार सड़क की मरम्मत होने से यातायात बाधित होता है, आर्थिक गतिविधियां प्रभावित होती हैं और सरकार तथा स्थानीय निकायों पर रखरखाव का अतिरिक्त बोझ पड़ता है।


इस परियोजना की सबसे आकर्षक विशेषताओं में इसकी अनुमानित लंबी आयु भी शामिल है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इसकी उम्र सामान्य बिटुमिनस सड़कों की तुलना में तीन गुना तक अधिक हो सकती है। यदि यह प्रदर्शन बड़े पैमाने पर अलग-अलग जलवायु और यातायात परिस्थितियों में भी सफल रहता है, तो भविष्य में सड़क निर्माण की सोच में महत्वपूर्ण बदलाव आ सकता है। अधिक टिकाऊ सड़क का अर्थ है कि कम बार मरम्मत, कम यातायात व्यवधान और लंबे समय तक बुनियादी ढांचे का उपयोग। हालांकि किसी भी नई तकनीक की वास्तविक दीर्घकालिक सफलता का आकलन वर्षों के प्रदर्शन और विभिन्न परिस्थितियों में निगरानी के बाद ही पूरी तरह किया जा सकता है।


सड़क निर्माण में प्राकृतिक पत्थरों और गिट्टी की मांग बहुत अधिक है। इस मांग को पूरा करने के लिए खनन गतिविधियां भी होती हैं। इसलिए यदि औद्योगिक स्लैग जैसे वैकल्पिक संसाधनों का सुरक्षित और बड़े पैमाने पर उपयोग संभव हो, तो प्राकृतिक खनिज संसाधनों पर निर्भरता कम करने का अवसर मिल सकता है। रायगढ़ की परियोजना का महत्व यहीं से और बढ़ जाता है। यह केवल एक सड़क नहीं, बल्कि परिपत्र अर्थव्यवस्था (Circular Economy) की दिशा में प्रयोग भी है, जहां औद्योगिक प्रक्रिया से निकलने वाले अपशिष्ट को दोबारा आर्थिक गतिविधि में शामिल किया जाता है।


भारत आज दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में अपनी स्थिति मजबूत कर रहा है। आर्थिक विकास के साथ बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचे का निर्माण भी आवश्यक है। लेकिन भविष्य का विकास ऐसा होना चाहिए जिसमें संसाधनों का विवेकपूर्ण इस्तेमाल हो और पर्यावरणीय दबाव कम किया जा सके। स्टील स्लैग से बनी सड़क इसी संतुलन की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयोग है। इस परियोजना से यह संदेश निकलता है कि विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच चुनाव करना हमेशा जरूरी नहीं है। सही तकनीक, वैज्ञानिक अनुसंधान और औद्योगिक सहयोग के माध्यम से दोनों लक्ष्यों को साथ लेकर चला जा सकता है।


रायगढ़ में बनी 1.85 किलोमीटर की सड़क भले ही लंबाई में बहुत बड़ी परियोजना न लगे, लेकिन इसका तकनीकी और प्रतीकात्मक महत्व काफी व्यापक है। गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज होना इसकी वैश्विक पहचान का प्रमाण है। अब आवश्यकता इस बात की है कि इस तकनीक का वैज्ञानिक रूप से लगातार मूल्यांकन किया जाए और सफल परिणामों के आधार पर देश के अन्य औद्योगिक क्षेत्रों में भी इसके उपयोग की संभावनाएं तलाश की जाएं। भारत में बड़े पैमाने पर इस्पात उत्पादन होता है। इसलिए स्टील स्लैग का सुरक्षित और उपयोगी इस्तेमाल देश के लिए एक बड़ी संभावित उपलब्धि बन सकता है।


रायगढ़ की यह सड़क एक सरल लेकिन शक्तिशाली विचार को सामने रखती है कि हर अपशिष्ट बेकार नहीं होता है। जिस स्टील स्लैग को कभी केवल औद्योगिक कचरा माना जाता था, वही वैज्ञानिक प्रसंस्करण के बाद सड़क निर्माण की मजबूत सामग्री बन गया। दो लाख टन स्लैग का उपयोग, चार लेन की सड़क, 1.85 किलोमीटर की लंबाई और गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड, ये सभी तथ्य मिलकर भारत की तकनीकी क्षमता की एक नई तस्वीर पेश करते हैं। आने वाले समय में जब दुनिया जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और टिकाऊ विकास की चुनौतियों से जूझ रही होगी, तब ऐसे प्रयोगों का महत्व और बढ़ेगा। रायगढ़ की सड़क इसलिए केवल स्टील स्लैग से बनी सड़क नहीं है। यह उस सोच की सड़क है, जो कचरे में भी संपदा देखती है, विज्ञान में समाधान खोजती है और विकास को पर्यावरण के साथ जोड़कर आगे बढ़ना चाहती है। यही ‘वेस्ट टू वेल्थ’ की वास्तविक भावना है, औद्योगिक कचरे को बोझ नहीं, राष्ट्र निर्माण की शक्ति में बदलना।


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