संतान की दीर्घायु और सुख-समृद्धि की कामना का लोकपर्व है - “जिउतिया”

Jitendra Kumar Sinha
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भारतीय सनातन परंपरा में व्रत और पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि परिवार, मातृत्व, त्याग और लोकआस्था से जुड़े जीवन-मूल्यों के प्रतीक भी हैं। इन्हीं विशिष्ट पर्वों में जिउतिया व्रत, जिसे जीवित्पुत्रिका, जितिया और जीमूतवाहन व्रत के नाम से भी जाना जाता है, का विशेष स्थान है। संतान की सुख-समृद्धि, दीर्घायु, आरोग्य और यशस्वी जीवन की कामना से माताएं इस कठिन व्रत को श्रद्धा और निष्ठा के साथ करती है। इस वर्ष 3 अक्तूबर, शनिवार को जिउतिया व्रत रखा जाएगा। आश्विन कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाये जाने वाले इस पर्व पर माताएं दिनभर निर्जला उपवास करेगी। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन भगवान जीमूतवाहन की पूजा-अर्चना की जाती है और व्रत कथा का श्रवण किया जाता है। व्रत का समापन अगले दिन पारण के साथ होता है। ज्योतिषाचार्य के अनुसार, जिउतिया व्रत का विधान तीन दिनों का माना जाता है। 2 अक्तूबर को सरगही-ओठगन, 3 अक्तूबर को निर्जला उपवास और 4 अक्तूबर को सुबह 7बज कर 38 के बाद पारण होगा। इस तरह यह पर्व केवल एक दिन का उपवास नहीं, बल्कि तीन दिनों तक चलने वाली धार्मिक और पारिवारिक परंपरा है।


जिउतिया व्रत का सबसे भावनात्मक पक्ष मां और संतान के बीच का वह संबंध है, जिसमें मां अपने सुख-सुविधा से ऊपर संतान के कल्याण को रखती है। निर्जला उपवास में न भोजन किया जाता है और न ही जल ग्रहण किया जाता है। इसलिए इसे कठिन व्रतों में गिना जाता है। लोकपरंपरा में यह विश्वास रहा है कि मां की श्रद्धा, संकल्प और प्रार्थना संतान के जीवन में मंगल का आशीर्वाद लेकर आती है। इसी भावना से महिलाएं व्रत रखती हैं और भगवान जीमूतवाहन से अपने बच्चों के स्वस्थ, दीर्घायु, सुखी और सफल जीवन की प्रार्थना करती है। हालांकि धार्मिक व्रतों से जुड़े फल मुख्यतः आस्था और परंपरा का विषय है। इनके माध्यम से भारतीय समाज में मातृत्व, त्याग, संयम और पारिवारिक मंगलकामना जैसे मूल्यों की अभिव्यक्ति अवश्य दिखाई देती है।


जिउतिया व्रत का विधान तीन प्रमुख चरणों में पूरा होता है। प्रत्येक चरण का अपना धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है। पहला चरण  2 अक्तूबर को व्रत की तैयारी के रूप में ‘सरगही-ओठगन’ की परंपरा होगी। यह व्रत की शुरुआत से पहले का समय माना जाता है। व्रती महिलाएं निर्धारित परंपरा के अनुसार भोजन ग्रहण करती हैं और इसके बाद उपवास का संकल्प लेती है। बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश सहित कई क्षेत्रों में सरगही की परंपरा परिवार और स्थानीय रीति-रिवाज के अनुसार अलग-अलग रूपों में दिखाई देती है। कहीं महिलाएं भोर में उठकर भोजन करती है, तो कहीं विशेष पकवानों का भी विधान होता है। सरगही केवल भोजन करने की प्रक्रिया नहीं है। यह उस कठिन संकल्प की शुरुआत है, जिसके बाद व्रती महिला पूरे दिन निर्जला रहकर पूजा और उपासना करती है। दूसरा चरण 3 अक्तूबर को जिउतिया व्रत का मुख्य दिन होगा। इस दिन महिलाएं निर्जला उपवास रखेंगी। आश्विन कृष्ण अष्टमी को मनाये जाने वाले इस पर्व में भगवान जीमूतवाहन की पूजा की जाती है। आर्द्रा नक्षत्र और वरीयान योग में पड़ने वाले इस पर्व को लेकर श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह रहता है। दिनभर व्रती महिलाएं धार्मिक गतिविधियों में लगी रहती हैं। घरों में पूजा की तैयारी की जाती है और परिवार की महिलाएं एक-दूसरे को पर्व की शुभकामनाएं देती हैं। शाम या निर्धारित पूजा-विधि के अनुसार भगवान जीमूतवाहन की पूजा की जाती है। इसके बाद व्रत कथा सुनी जाती है। कई स्थानों पर महिलाएं सामूहिक रूप से कथा श्रवण करती है, जिससे पर्व का सामाजिक और सामुदायिक स्वरूप भी उभरकर सामने आता है।


जिउतिया व्रत का संबंध राजा जीमूतवाहन की कथा से माना जाता है। धार्मिक और लोकपरंपरा में जीमूतवाहन को त्याग, करुणा और परोपकार का प्रतीक माना गया है। कथा के अनुसार जीमूतवाहन अत्यंत दयालु और परोपकारी थे। उन्होंने दूसरों के जीवन की रक्षा के लिए स्वयं को संकट में डालने का साहस दिखाया। उनके इसी त्याग और करुणा की स्मृति से जुड़ी कथा जिउतिया व्रत में सुनाई जाती है। इस कथा का मूल संदेश केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है। इसमें दूसरों के जीवन की रक्षा, त्याग, करुणा और कर्तव्य को महत्वपूर्ण बताया गया है। यही कारण है कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी माताएं अपने बच्चों को भी इस पर्व की कथा और उसके भावार्थ से परिचित कराती रही है।


भारतीय लोकपर्वों की विशेषता यह है कि उनके पीछे कही जाने वाली कथाएं जीवन के गहरे मूल्यों को सरल भाषा में समाज तक पहुंचाती हैं। जिउतिया की कथा भी इसी परंपरा का हिस्सा है। जीमूतवाहन का चरित्र यह संदेश देता है कि वास्तविक महानता केवल अपने लिए सुख प्राप्त करने में नहीं, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर दूसरों के लिए त्याग करने में भी है। यही भाव जिउतिया व्रत की धार्मिक भावना से जुड़ जाता है। मां जब अपनी संतान के लिए निर्जला उपवास करती है, तो वह भी एक प्रकार से त्याग और समर्पण की भावना का प्रदर्शन करती है। इसलिए जिउतिया को केवल व्रत के रूप में देखने के बजाय मातृत्व की श्रद्धा और त्याग की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति के रूप में भी समझा जा सकता है।


बिहार में जिउतिया का पर्व विशेष लोकमहत्व रखता है। गांवों से लेकर शहरों तक महिलाएं इस अवसर पर पारंपरिक रीति-रिवाजों का पालन करती हैं। परिवारों में कई दिन पहले से इसकी तैयारी शुरू हो जाती है। जिन घरों में जिउतिया का व्रत रखा जाता है, वहां पर्व को लेकर विशेष वातावरण दिखाई देता है। महिलाएं पूजा सामग्री की व्यवस्था करती है, घर की साफ-सफाई करती हैं और व्रत से जुड़ी परंपराओं का पालन करती है। कई परिवारों में माताएं अपनी संतान को साथ बैठाकर व्रत की कथा सुनाती हैं। इस प्रकार धार्मिक कथा केवल पूजा का हिस्सा नहीं रहती, बल्कि एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक सांस्कृतिक स्मृति पहुंचाने का माध्यम बन जाती है। बिहार की लोकसंस्कृति में ऐसे पर्वों का महत्व इसलिए भी अधिक है, क्योंकि यहां धार्मिक परंपराएं अक्सर पारिवारिक और सामाजिक जीवन के साथ गहराई से जुड़ी हुई है।


जिउतिया केवल पूजा और उपवास का पर्व नहीं है। इससे जुड़े लोकगीत भी इसकी सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करते हैं। ग्रामीण बिहार और पूर्वांचल के कई क्षेत्रों में महिलाएं व्रत के अवसर पर पारंपरिक गीत गाती है। इन गीतों में संतान के लिए मंगलकामना, मां की चिंता, परिवार की खुशहाली और भगवान के प्रति श्रद्धा की भावनाएं व्यक्त होती है। लोकगीतों के माध्यम से पर्व का भावनात्मक पक्ष और अधिक गहरा हो जाता है। लोकगीतों की यही परंपरा बताती है कि भारतीय पर्व केवल धार्मिक कैलेंडर की तारीखें नहीं हैं। वे समाज की सामूहिक स्मृति, भावनाओं और जीवन-पद्धति का हिस्सा होते है।


जिउतिया व्रत का कठिन निर्जला चरण 3 अक्तूबर को रहेगा। इसके बाद 4 अक्तूबर को सुबह 7 बजकर 38 के बाद पारण किया जाएगा। पारण व्रत की पूर्णता का महत्वपूर्ण चरण है। व्रती महिलाएं निर्धारित समय के बाद व्रत खोलेगी और फिर सामान्य भोजन ग्रहण करेगी। परिवार के अन्य सदस्य भी इस अवसर पर व्रती महिला की सेवा और सहायता करते हैं। चूंकि व्रत में निर्जला रहने की परंपरा है, इसलिए पारण के समय स्वास्थ्य का ध्यान रखना भी आवश्यक है। विशेष रूप से अधिक उम्र की महिलाओं, गर्भवती महिलाओं अथवा किसी बीमारी से पीड़ित लोगों को कठोर उपवास करने से पहले चिकित्सकीय सलाह लेना उचित है। धर्म में श्रद्धा महत्वपूर्ण है, लेकिन शरीर की क्षमता और स्वास्थ्य की उपेक्षा करना आवश्यक नहीं है।


जिउतिया का सबसे बड़ा सामाजिक पक्ष यह है कि यह पूरे परिवार को एक भावनात्मक सूत्र में बांधता है। व्रत मां रखती है, लेकिन उसकी चिंता पूरे परिवार की होती है। संतान भी अपनी मां के संकल्प को देखकर उसके प्रति सम्मान और कृतज्ञता महसूस करती है। आज जब जीवनशैली तेजी से बदल रही है और परिवारों का स्वरूप भी बदल रहा है, ऐसे पर्व पारिवारिक संवाद के अवसर प्रदान करते हैं। बच्चे अपनी दादी, नानी या मां से परंपराओं के बारे में सुनते हैं। इससे उन्हें अपने परिवार और सांस्कृतिक विरासत को समझने का अवसर मिलता है। इस दृष्टि से जिउतिया केवल धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि पीढ़ियों के बीच संवाद का अवसर भी है।


आधुनिक जीवन में कामकाज, शहरों की व्यस्तता और बदलती जीवनशैली के बावजूद जिउतिया की परंपरा कायम है। आज शहरों में रहने वाली महिलाएं भी अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार व्रत रखती है। सोशल मीडिया और डिजिटल माध्यमों ने भी पर्व से जुड़ी जानकारी को व्यापक बनाया है। व्रत कथा, पूजा विधि और लोकगीत अब मोबाइल फोन के माध्यम से भी आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं। इससे नई पीढ़ी को अपनी पारंपरिक मान्यताओं से जुड़ने का अवसर मिलता है। हालांकि परंपरा को निभाते समय उसके मूल भाव को समझना भी जरूरी है। जिउतिया का मूल भाव संतान के प्रति प्रेम, परिवार के प्रति जिम्मेदारी, संयम और त्याग से जुड़ा है।


जिउतिया की धार्मिक कथा और मातृ-संकल्प को व्यापक अर्थ में देखें तो यह पर्व हमें करुणा, त्याग और जीवन के सम्मान का संदेश देता है। मां अपने बच्चे के लिए मंगलकामना करती है, लेकिन भगवान जीमूतवाहन की कथा दूसरों के जीवन की रक्षा का आदर्श भी सामने रखती है। यही दो भाव ‘मातृत्व और परोपकार’ जिउतिया को विशिष्ट बनाते हैं। आज के समय में जब परिवार और समाज दोनों तेजी से परिवर्तन के दौर से गुजर रहे हैं, ऐसे पर्व हमें अपने सांस्कृतिक मूल्यों से जोड़ते हैं। वे बताते हैं कि समृद्धि केवल धन में नहीं, बल्कि स्वस्थ परिवार, अच्छे संस्कार, आपसी सम्मान और करुणा में भी निहित है।


3 अक्तूबर को जब माताएं निर्जला रहकर भगवान जीमूतवाहन की पूजा करेगी और संतान की लंबी आयु तथा सुखी जीवन की कामना करेगी, तब यह दृश्य भारतीय पारिवारिक संस्कृति की उस परंपरा को जीवंत करेगा जिसमें मां का स्थान केवल परिवार की देखभाल करने वाली महिला के रूप में नहीं, बल्कि त्याग, प्रेम और मंगलकामना की धुरी के रूप में देखा गया है। 2 अक्तूबर की सरगही-ओठगन से शुरू होकर 3 अक्तूबर के निर्जला उपवास और 4 अक्तूबर को सुबह 7 बजकर 38 के बाद पारण तक चलने वाला यह पर्व आस्था और अनुशासन की यात्रा है। जिउतिया की परंपरा का सार यही है कि संतान का जीवन सुखी हो, परिवार में मंगल रहे और आने वाली पीढ़ियां स्वस्थ, संस्कारित और यशस्वी बनें। भगवान जीमूतवाहन की कथा त्याग और करुणा का संदेश देती है, जबकि माताओं का व्रत प्रेम और समर्पण की भावना को अभिव्यक्त करता है। इसलिए जिउतिया केवल एक कठिन उपवास नहीं है बल्कि यह मां की ममता, परिवार की एकजुटता, लोकसंस्कृति की जीवंतता और सनातन परंपरा में निहित त्याग-भाव का पर्व है।



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