अंग्रेजी का एक शब्द है ‘नैरेटिव’। सामान्य अर्थ में इसका मतलब किसी घटना, व्यक्ति या परिस्थिति को एक खास दृष्टिकोण से प्रस्तुत करने वाली कहानी या विमर्श से है। लेकिन राजनीति में नैरेटिव केवल कहानी नहीं होता है। यह धारणा बनाने की एक ऐसी कला है, जिसमें किसी व्यक्ति की खूबियों को पृष्ठभूमि में धकेलकर उसकी कमियों, विवादों या छोटी घटनाओं को इतना बड़ा बना दिया जाता है कि धीरे-धीरे वही उसकी पूरी पहचान बन जाती है। राजनीति में यह कला जिसको आ गई, वह किसी भी व्यक्तित्व की तस्वीर को 360 डिग्री तक बदल सकता है। कल तक जो व्यक्ति सक्षम, लोकप्रिय और निर्णायक माना जाता था, उसे कुछ ही समय में असफल, विवादास्पद या जनविरोधी बताने का वातावरण तैयार किया जा सकता है। इसके लिए हमेशा विरोधियों की जरूरत नहीं होती है। कई बार अपने लोग ही इस खेल के सबसे प्रभावी खिलाड़ी बन जाते हैं और मीडिया उसका मंच। यह कोई आज की उपज नहीं है। भारतीय राजनीति में इसके अनेक उदाहरण मिलते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले नैरेटिव बनाने में अखबार, रेडियो और टेलीविजन की भूमिका प्रमुख थी, जबकि आज सोशल मीडिया ने इसकी गति और पहुंच दोनों को कई गुना बढ़ा दिया है।
पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी का उदाहरण आज भी राजनीतिक नैरेटिव के प्रभाव को समझने के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। बोफोर्स सौदे को लेकर उठे सवालों ने जिस तरह राजनीतिक माहौल बनाया, उसने राजीव गांधी की छवि को गहरे प्रभावित किया। स्वीडिश रेडियो की रिपोर्ट से शुरू हुआ विवाद भारत में राजनीतिक तूफान में बदल गया। विपक्ष ने इसे मुद्दा बनाया और सरकार पर गंभीर आरोप लगे। मीडिया में लगातार बहस हुई। आरोप, प्रत्यारोप और राजनीतिक अभियान के बीच बोफोर्स धीरे-धीरे केवल एक रक्षा सौदे का विषय नहीं रहा, बल्कि राजीव गांधी सरकार की पहचान से जोड़ दिया गया। बाद की राजनीतिक घटनाओं ने दिखाया कि किसी मुद्दे का राजनीतिक नैरेटिव किस तरह चुनावी परिणामों को प्रभावित कर सकता है। यहां यह सवाल अलग है कि आरोपों की कानूनी परिणति क्या हुई और इतिहास ने अंततः किसे सही या गलत माना। महत्वपूर्ण यह है कि जनमानस में किसी घटना की धारणा कैसे बनाई गई। यही नैरेटिव की शक्ति है।
आज स्थिति पहले से कहीं अधिक जटिल है। सोशल मीडिया ने हर व्यक्ति को प्रकाशक, संपादक और प्रसारक बना दिया है। किसी घटना का वीडियो कुछ ही मिनटों में लाखों लोगों तक पहुंच सकता है। एक पोस्ट हजारों बार साझा हो सकती है और कुछ ही घंटों में किसी व्यक्ति के पक्ष या विपक्ष में माहौल बनाया जा सकता है। सबसे बड़ी समस्या यह है कि सोशल मीडिया पर संपूर्ण सत्य की तुलना में अधूरा सत्य ज्यादा तेजी से दौड़ता है। किसी घटना के दस पहलू हो सकते हैं, लेकिन नैरेटिव केवल एक पहलू को चुनता है। फिर उसी को बार-बार दोहराया जाता है। लगातार दोहराव से धारणा बनती है और धारणा धीरे-धीरे ‘सत्य’ का रूप लेने लगती है। राजनीति में यह और अधिक प्रभावशाली है क्योंकि यहां समर्थक और विरोधी दोनों अपने-अपने नैरेटिव के साथ सक्रिय रहते हैं। किसी नेता के दस अच्छे काम हो, लेकिन उनमें से किसी एक पर चर्चा न हो और उसकी सरकार के दौरान हुई कोई छोटी आपराधिक घटना लगातार सुर्खियों में रहे, तो जनता के एक वर्ग के मन में वही घटना पूरी सरकार का प्रतीक बन सकती है। यही नैरेटिव का खेल है।
बिहार की वर्तमान राजनीति में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को लेकर भी एक अलग तरह का नैरेटिव दिखाई देता है। जब से उन्होंने बिहार की कमान संभाली है, उनके फैसलों और कामकाज को लेकर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर बहस जारी है। यह स्वाभाविक भी है। लोकतंत्र में मुख्यमंत्री से सवाल होना चाहिए। सरकार की आलोचना भी होनी चाहिए। विपक्ष को सरकार की कमियां उजागर करनी चाहिए और मीडिया को भी सत्ता से कठिन सवाल पूछने चाहिए। लेकिन सवाल तब उठता है जब सरकार के कामों का मूल्यांकन संतुलित तरीके से न होकर पहले से तय धारणा के आधार पर होने लगे। मुख्यमंत्री के कई ऐसे फैसले और पहल हैं, जिनका प्रभाव तत्काल सुर्खियों में भले दिखाई न दे, लेकिन उनका महत्व आने वाले समय में महसूस किया जा सकता है।
बिहार और झारखंड के बीच सोन नदी से जुड़े लंबे समय से चले आ रहे विवाद का समाधान एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में देखा जा सकता है। करीब ढाई दशक से अधिक समय से लंबित विषय का समाधान केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं है। नदी, जल और सिंचाई से जुड़े विवादों का सीधा संबंध किसानों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से होता है। ऐसे मामलों में राज्यों के बीच सहमति बनाना आसान नहीं होता। इसलिए यदि लंबे समय से अटका कोई विषय आगे बढ़ता है तो उसकी राजनीतिक चमक से अधिक उसका दीर्घकालिक महत्व समझना चाहिए। लेकिन नैरेटिव की दुनिया में ऐसे काम अक्सर उस तरह जगह नहीं बना पाते, जिस तरह कोई विवादित बयान या राजनीतिक टकराव बना लेता है।
बिहार की त्रासदी का एक बड़ा नाम है ‘बाढ़’। हर वर्ष नदियां लाखों लोगों के जीवन को प्रभावित करती हैं। खेत, सड़क, घर, पशुधन और स्थानीय अर्थव्यवस्था बाढ़ की चपेट में आते हैं। ऐसे में फरक्का बराज के गेटों से जुड़े निर्णय और जल प्रवाह का प्रबंधन बिहार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है। यदि किसी सरकार की तत्परता से बाढ़ की स्थिति में राहत मिलती है तो उसका मूल्य केवल सरकारी फाइलों में दर्ज आंकड़ों से नहीं लगाया जा सकता। उस किसान से पूछना चाहिए जिसका खेत बच गया, उस परिवार से पूछना चाहिए जिसका घर सुरक्षित रहा और उस गांव से पूछना चाहिए जहां पानी का दबाव कम हुआ। लेकिन ऐसी उपलब्धियां कैमरे पर उतनी आकर्षक नहीं होती जितनी राजनीतिक बयानबाजी।
नेपाल में आई आपदा का असर सीमावर्ती बिहार पर पड़ना स्वाभाविक है। ऐसी परिस्थितियों में प्रशासनिक मशीनरी की गति और सरकार की तत्परता बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। आपदा प्रबंधन का वास्तविक परीक्षण प्रेस कॉन्फ्रेंस में नहीं, बल्कि संकट के समय होता है। समय पर सूचना, राहत, प्रशासनिक समन्वय, स्थानीय मशीनरी की सक्रियता और प्रभावित लोगों तक सहायता पहुंचाना, ये सभी ऐसे काम हैं जिनका श्रेय अक्सर किसी एक व्यक्ति को नहीं मिलता। लेकिन सरकार की कार्यशैली का मूल्यांकन करते समय इनका महत्व अवश्य देखा जाना चाहिए।
शिक्षा किसी भी राज्य के भविष्य का सबसे बड़ा आधार है। शिक्षक भर्ती हो या विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा के लिए आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने वाली योजनाएं, इनका प्रभाव तत्काल राजनीतिक नारों में दिखाई नहीं देता। स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड जैसी योजनाएं उन परिवारों के लिए महत्वपूर्ण हो सकती हैं जिनके बच्चे आर्थिक कारणों से उच्च शिक्षा से वंचित रह जाते हैं। इसी तरह शिक्षक भर्ती का प्रभाव केवल नियुक्ति पत्र तक सीमित नहीं है। इसका सीधा संबंध विद्यालयों में शिक्षकों की उपलब्धता और शिक्षा व्यवस्था की गुणवत्ता से है। ऐसे कार्यों की सफलता का वास्तविक मूल्यांकन वर्षों बाद होता है। इसलिए हर उपलब्धि को केवल आज की सुर्खियों से मापना उचित नहीं होगा।
महिला सुरक्षा आज केवल कानून-व्यवस्था का विषय नहीं है, बल्कि सामाजिक विश्वास का प्रश्न है। ‘पुलिस दीदी’ जैसे अभियानों का उद्देश्य यदि महिलाओं और पुलिस के बीच संवाद तथा भरोसा बढ़ाना है, तो यह निश्चित रूप से उस दिशा में महत्वपूर्ण पहल हो सकती है। महिला तब ही अपनी शिकायत लेकर आगे आएगी जब उसे विश्वास होगा कि उसकी बात सुनी जाएगी और उसे सम्मान मिलेगा। नैरेटिव की समस्या यही है कि ऐसी पहलों का प्रभाव धीरे-धीरे दिखाई देता है। इसके विपरीत कोई आपराधिक घटना तत्काल चर्चा का विषय बन जाती है।
किसी सरकार की पहचान केवल योजनाओं से नहीं होती है। उसकी असली पहचान प्रशासन के व्यवहार से बनती है। भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस, कानून-व्यवस्था के मामलों में कठोरता, शिकायतों का निवारण और अधिकारियों की जवाबदेही, ये ऐसे क्षेत्र हैं जहां बदलाव धीरे-धीरे दिखाई देता है। यदि मुख्यमंत्री प्रशासनिक तंत्र में कसावट लाने की कोशिश करते हैं तो उसका प्रभाव सरकारी कार्यालयों से लेकर आम नागरिक के अनुभव तक पहुंच सकता है। लेकिन इन सुधारों की चर्चा अक्सर किसी वायरल वीडियो जितनी नहीं होती है।
कानून-व्यवस्था में एक भी अपराध गंभीर है। पीड़ित को न्याय मिलना चाहिए और अपराधी को कानून के अनुसार सजा मिलनी चाहिए। लेकिन एक घटना को पूरे राज्य की व्यवस्था का प्रमाण मान लेना भी उचित नहीं है। बिहार में कोई अपराध होता है तो उस पर सवाल उठना चाहिए। पुलिस की जवाबदेही तय होनी चाहिए। लेकिन यह भी देखना होगा कि अपराध का समग्र आंकड़ा क्या है, पुलिस की कार्रवाई कितनी तेज है, न्यायिक प्रक्रिया क्या है और प्रशासन की प्रतिक्रिया कैसी है। यदि किसी छोटी घटना को इस तरह प्रस्तुत किया जाए कि लगे पूरा बिहार फिर 1990 के दशक में लौट गया है, तो यह पत्रकारिता के बजाय नैरेटिव निर्माण की ओर कदम हो सकता है।
नैरेटिव की सबसे दिलचस्प बात यही है कि कई बार विरोधियों से अधिक नुकसान अपने लोग करते हैं। राजनीति में हर दल के भीतर अलग-अलग समूह, महत्वाकांक्षाएं और हित होते हैं। किसी नेता के उभरने से कुछ लोगों को अवसर मिलते हैं तो कुछ को लगता है कि उनका प्रभाव कम हो रहा है। ऐसे में अंदर से पैदा होने वाली असहमति मीडिया और सोशल मीडिया के जरिए बाहर आती है। धीरे-धीरे वह धारणा बन सकती है कि सरकार असफल है, नेतृत्व कमजोर है या फैसले गलत हैं। यह लोकतंत्र का हिस्सा भी हो सकता है, लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब आलोचना तथ्य से हटकर छवि निर्माण का हथियार बन जाए।
किसी भी सरकार का मूल्यांकन केवल भाषणों और सुर्खियों से नहीं होना चाहिए। इसके लिए आंकड़े चाहिए। विकास योजनाओं की स्थिति क्या है? कितनी नौकरियां मिली? शिक्षा में क्या सुधार हुआ? स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार कितना हुआ? सड़क और शहरी विकास की स्थिति क्या है? बाढ़ नियंत्रण में क्या प्रगति हुई? भ्रष्टाचार की शिकायतों पर कितनी कार्रवाई हुई? कानून-व्यवस्था की स्थिति क्या रही? इन सवालों के जवाब किसी नैरेटिव से नहीं, बल्कि सरकारी आंकड़ों, स्वतंत्र विश्लेषण और जनता के अनुभव से मिलने चाहिए। इसलिए 15 अप्रैल 2027 का वार्षिक लेखा-जोखा महत्वपूर्ण होगा। तब पिछले कार्यकाल और एक वर्ष के कामकाज की उपलब्धियों और कमियों को आंकड़ों के आधार पर परखा जा सकेगा। हो सकता है तब यह स्पष्ट हो कि बिहार ने कितनी मंजिल तय की है और कहां अभी लंबा रास्ता बाकी है।
राजनीति में नैरेटिव कभी खत्म नहीं होगा। सत्ता पक्ष अपना नैरेटिव बनाएगा, विपक्ष अपना। मीडिया अपने दृष्टिकोण से घटनाओं को प्रस्तुत करेगा और सोशल मीडिया उन्हें अपने तरीके से आगे बढ़ाएगा। इसलिए समाधान नैरेटिव को खत्म करना नहीं है। समाधान है नैरेटिव के पार जाकर तथ्य देखना। सम्राट चौधरी की सरकार के अच्छे काम हैं तो उनकी चर्चा होनी चाहिए। कमियां हैं तो उनकी आलोचना भी होनी चाहिए। अपराध हुआ है तो सरकार से सवाल होना चाहिए। प्रशासन ने अच्छा काम किया है तो उसका श्रेय भी मिलना चाहिए। लोकतंत्र में किसी मुख्यमंत्री को देवता बनाने की जरूरत नहीं और किसी मुख्यमंत्री को खलनायक बनाने की भी नहीं। जरूरत केवल इतनी है कि व्यक्ति नहीं, काम का मूल्यांकन हो। क्योंकि राजनीति में छवि बदलने की ताकत नैरेटिव के पास जरूर है, लेकिन लंबे समय में इतिहास वही याद रखता है जिसे आंकड़े, परिणाम और जनता का अनुभव प्रमाणित करते हैं। नैरेटिव कुछ समय के लिए सच पर पर्दा डाल सकता है, लेकिन सच को हमेशा के लिए ढक नहीं सकता है। नैरेटिव जिंदा रहेगा, यह भी सत्य है। लेकिन उसके साथ सवाल यह भी जिंदा रहना चाहिए कि आखिर वास्तविकता क्या है? और शायद यही किसी लोकतांत्रिक समाज की सबसे बड़ी ताकत है।

