भाजपा ने किया तीन वादे पूरे, चौथे की बारी - क्या बिहार बनेगा UCC की अग्निपरीक्षा?

Jitendra Kumar Sinha
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देश की राजनीति को करीब से देखने-समझने वाले लोग एक बात अच्छी तरह जानते हैं कि भारतीय राजनीति में कुछ नेताओं के बयान केवल बयान नहीं होते हैं, बल्कि आने वाले राजनीतिक फैसलों की आहट भी होते हैं। खासकर जब बात भारतीय जनता पार्टी के सबसे प्रभावशाली रणनीतिकारों में गिने जाने वाले केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की हो, तो उनके शब्दों को राजनीतिक संकेतों के संदर्भ में पढ़ा जाना स्वाभाविक है। इसीलिए तीन दिन पहले अमित शाह के एक बयान ने देश की राजनीति में हलचल पैदा कर दी है। राजनीतिक गलियारों से लेकर मीडिया के विमर्श तक इसकी चर्चा होने लगी है। लेकिन इस बयान का सबसे ज्यादा असर यदि कहीं दिखाई देता है तो वह ‘बिहार’ है। बिहार में तो ऐसा लगता है मानो राजनीतिक समुद्र में अचानक ज्वार आ गया हो। कहीं सुनामी की आशंका व्यक्त की जा रही है तो कहीं सत्ता के गलियारों में भविष्य की संभावनाओं का हिसाब-किताब शुरू हो गया है। प्रश्न केवल समान नागरिक संहिता यानि Uniform Civil Code (UCC) का नहीं है। सवाल उससे कहीं बड़ा है कि क्या ‘बिहार’ भाजपा के उस बड़े राजनीतिक संकल्प की प्रयोगशाला बनने जा रहा है, जिसकी घोषणा राष्ट्रीय स्तर पर हो चुकी है? और यदि ऐसा है तो मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के सामने आने वाली चुनौती साधारण नहीं होगी।


बिहार की मौजूदा राजनीति को समझने के लिए एक विरोधाभास पर नजर डालना जरूरी है। कागज पर सत्ता की कमान भाजपा के हाथ में है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी हैं और जनता दल यूनाइटेड सहयोगी की भूमिका में है। लेकिन शासन की शैली और कई पुराने नीतिगत निर्णयों को देखकर राजनीतिक पर्यवेक्षकों के मन में एक सवाल उठता है कि क्या वास्तव में सत्ता की कार्यशैली बदली है? बिहार की राजनीति में लंबे समय तक नीतीश कुमार की अपनी प्रशासनिक शैली रही है। शराबबंदी हो, सामाजिक समीकरण हो, प्रशासनिक नियंत्रण हो या किसी संवेदनशील विषय पर सरकार का रुख, नीतीश कुमार के शासनकाल में स्थापित कई व्यवस्थाएं इतनी मजबूत हुई है कि सत्ता परिवर्तन के बाद भी उनमें बड़े बदलाव करना आसान नहीं हो पा रहा है। यही कारण है कि भाजपा के मुख्यमंत्री के नेतृत्व वाली सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल सरकार चलाने की नहीं है, बल्कि अपनी राजनीतिक पहचान स्थापित करने की भी है। सम्राट चौधरी के सामने एक तरफ भाजपा की विचारधारा और राष्ट्रीय नेतृत्व के संकल्प हैं, तो दूसरी तरफ बिहार की अपनी राजनीतिक परिस्थितियां और सहयोगी दल की संवेदनशीलताएं। यही वह बिंदु है जहां से असली परीक्षा शुरू होती है।


भाजपा की राजनीति को यदि उसके लंबे वैचारिक और चुनावी एजेंडे के संदर्भ में देखा जाए तो राम मंदिर, अनुच्छेद 370, राष्ट्रवाद और समान नागरिक संहिता जैसे मुद्दों ने उसके राजनीतिक विमर्श को गहराई से प्रभावित किया है। राम मंदिर का निर्माण हुआ है। अनुच्छेद 370 के संबंध में बड़ा संवैधानिक निर्णय लिया गया है। राष्ट्रवाद भाजपा की राजनीति का केंद्रीय आधार बना रहा है। अब समान नागरिक संहिता की बारी है। यही कारण है कि UCC का मुद्दा भाजपा के लिए महज एक चुनावी घोषणा नहीं माना जा सकता है। यह उसके लंबे राजनीतिक एजेंडे का महत्वपूर्ण हिस्सा है। भाजपा और उसके नेतृत्व की ओर से लगातार यह बात कही जाती रही है कि देश में अलग-अलग धार्मिक समुदायों के लिए अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों के बजाय नागरिकों के लिए समान नागरिक कानून की व्यवस्था होनी चाहिए। समर्थकों के लिए यह समानता और लैंगिक न्याय का प्रश्न है। विरोधियों के लिए यह धार्मिक और व्यक्तिगत कानूनों से जुड़ा संवेदनशील विषय है और बिहार जैसे सामाजिक एवं राजनीतिक रूप से जटिल राज्य में यह बहस और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।


अमित शाह का यह कथन कि भाजपा और एनडीए शासित सभी 21 राज्यों में समान नागरिक संहिता लागू की जाएगी, राजनीतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण संदेश है। इसका सीधा अर्थ यह है कि भाजपा शासित राज्यों में UCC को लेकर केवल चर्चा नहीं है, बल्कि आगे बढ़ने की राजनीतिक इच्छाशक्ति मौजूद है। उत्तराखंड पहले ही इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठा चुका है। अब प्रश्न उन राज्यों का है जहां राजनीतिक समीकरण अलग हैं। बिहार उनमें सबसे दिलचस्प मामला है। क्योंकि यहां भाजपा और जदयू का गठबंधन है। दोनों दल राष्ट्रीय स्तर पर एनडीए का हिस्सा हैं, लेकिन कई मुद्दों पर उनकी राजनीतिक प्राथमिकताएं हमेशा एक जैसी नहीं रही हैं। यहीं से वह प्रश्न पैदा होता है जो बिहार की राजनीति को आने वाले दिनों में गर्म कर सकता है कि क्या बिहार में UCC लागू होगा? यदि होगा तो कब? और उससे भी बड़ा प्रश्न है कि इसे लागू कौन करेगा?


मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के सामने स्थिति किसी आसान परीक्षा जैसी नहीं है। एक तरफ भाजपा का स्पष्ट राजनीतिक एजेंडा है। पार्टी का शीर्ष नेतृत्व किसी मुद्दे को लेकर सार्वजनिक रूप से संकल्प व्यक्त कर चुका हो तो राज्य नेतृत्व के लिए उसकी अनदेखी करना आसान नहीं होता है। दूसरी तरफ बिहार का राजनीतिक समीकरण है। यहां सरकार केवल भाजपा के बल पर नहीं है, बल्कि गठबंधन की राजनीति के सहारे चलती है। इसलिए मुख्यमंत्री को हर बड़े निर्णय में राजनीतिक संतुलन बनाना पड़ता है। UCC जैसा विषय तो और भी संवेदनशील है। यदि भाजपा अपने वैचारिक एजेंडे को आगे बढ़ाती है तो उसे अपने समर्थक वर्ग के सामने जवाब देना होगा कि उसने अपने वादे को पूरा करने की दिशा में क्या कदम उठाए और यदि सरकार पीछे हटती है तो सवाल उठेगा कि सत्ता में रहते हुए भाजपा अपने घोषित एजेंडे पर आगे क्यों नहीं बढ़ रही? यानि रास्ता दोनों तरफ से कठिन है। इसीलिए कहा जा सकता है कि सम्राट चौधरी आज जिस मोड़ पर खड़े हैं, वहां एक तरफ कुआं है तो दूसरी तरफ खाई।


राजनीति में कई बार निर्णय लेना कठिन नहीं होता है, बल्कि उसके परिणामों को संभालना कठिन होता है। UCC पर बिहार सरकार के सामने भी यही स्थिति बन सकती है। यदि सरकार UCC की दिशा में तेजी से आगे बढ़ती है तो उसे गठबंधन के भीतर राजनीतिक सहमति बनानी होगी। समाज के विभिन्न वर्गों के बीच संवाद करना होगा। विरोध की आशंकाओं को दूर करना होगा और प्रशासनिक स्तर पर भी व्यापक तैयारी करनी होगी। दूसरी ओर यदि सरकार इसे टालती है तो भाजपा के पारंपरिक समर्थक पूछ सकते हैं कि जब पार्टी दूसरे राज्यों में UCC लागू करने की बात कर रही है तो बिहार में चुप्पी क्यों? यही राजनीतिक दबाव मुख्यमंत्री के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन सकता है। क्योंकि मुख्यमंत्री का पद केवल फैसले लेने का पद नहीं है। वह विभिन्न राजनीतिक हितों, सामाजिक संवेदनशीलताओं और गठबंधन की मजबूरियों के बीच संतुलन बनाने की जिम्मेदारी भी है।


समान नागरिक संहिता का मूल विचार यह है कि विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, गोद लेने और परिवार से जुड़े कुछ व्यक्तिगत कानूनों के क्षेत्र में नागरिकों के लिए समान कानूनी व्यवस्था हो। भारत में अलग-अलग धार्मिक समुदायों के व्यक्तिगत कानूनों की ऐतिहासिक व्यवस्था रही है। UCC समर्थकों का तर्क है कि एक आधुनिक लोकतांत्रिक राष्ट्र में नागरिक अधिकार और दायित्व धर्म के आधार पर अलग नहीं होने चाहिए। विशेष रूप से महिलाओं के अधिकार, विवाह की उम्र, तलाक, उत्तराधिकार और संपत्ति से जुड़े मामलों में समानता की बात इसके समर्थन का प्रमुख आधार है। लेकिन दूसरी तरफ धार्मिक स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों का प्रश्न भी उतना ही महत्वपूर्ण है। इसलिए UCC को केवल राजनीतिक नारे के रूप में देखने के बजाय इसे व्यापक संवैधानिक, सामाजिक और कानूनी विमर्श के रूप में देखना जरूरी होगा। यही कारण है कि बिहार में इसके लागू होने की प्रक्रिया केवल विधानसभा में कानून पारित करने तक सीमित नहीं होगी। इसके सामाजिक प्रभावों को भी समझना होगा।


बिहार भारत के उन राज्यों में है जहां जातीय, सामाजिक और धार्मिक समीकरण राजनीति पर गहरा प्रभाव डालते हैं। यहां कोई भी बड़ा सामाजिक कानून केवल कानूनी प्रावधान नहीं रहता है। बल्कि वह चुनावी विमर्श का हिस्सा बन जाता है। UCC भी इससे अलग नहीं होगा। राजनीतिक दल अपने-अपने तरीके से इसकी व्याख्या करेंगे। समर्थक इसे समानता और न्याय से जोड़ेंगे, जबकि विरोधी इसे व्यक्तिगत कानूनों और धार्मिक स्वतंत्रता से जोड़कर सवाल उठाएंगे। इसके बीच सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी ‘विश्वास पैदा करना’। यदि जनता को यह भरोसा हो कि कानून किसी धर्म विशेष के विरुद्ध नहीं है, बल्कि सभी नागरिकों के लिए समान अधिकार और समान जिम्मेदारी सुनिश्चित करने के उद्देश्य से बनाया जा रहा है, तो संवाद का रास्ता खुल सकता है। लेकिन यदि इसे केवल राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन के रूप में प्रस्तुत किया गया तो विवाद और बढ़ सकता है।


बिहार की राजनीति में भाजपा और जदयू का गठबंधन अपने आप में महत्वपूर्ण राजनीतिक प्रयोग है। दोनों दलों की अपनी राजनीतिक विरासत और अपना समर्थक आधार है। ऐसे में UCC केवल भाजपा की विचारधारा की परीक्षा नहीं होगी, बल्कि गठबंधन धर्म की भी परीक्षा होगी। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को यह तय करना होगा कि राष्ट्रीय नेतृत्व की अपेक्षाओं, भाजपा के कार्यकर्ताओं की आकांक्षाओं और गठबंधन की राजनीतिक वास्तविकताओं के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। यहीं उनकी प्रशासनिक और राजनीतिक क्षमता की असली परीक्षा होगी। मुख्यमंत्री के लिए चुनौती यह नहीं होगी कि वह किसी एक पक्ष को संतुष्ट कर दें। चुनौती यह होगी कि सभी पक्षों के बीच ऐसा रास्ता निकले जिससे सरकार भी चले और राजनीतिक एजेंडा भी आगे बढ़े।


राजनीति में समय बहुत महत्वपूर्ण होता है। किसी मुद्दे को कब उठाया जाए, कब कानून बनाया जाए और कब उसे जमीन पर उतारा जाए, इन तीनों का राजनीतिक प्रभाव अलग-अलग होता है। UCC के मामले में भी यही लागू होगा। यदि भाजपा नेतृत्व ने राष्ट्रीय स्तर पर इसे अपने एजेंडे का अगला बड़ा लक्ष्य मान लिया है तो आने वाले समय में राज्यों पर इसका दबाव बढ़ना स्वाभाविक है और जब बात भाजपा-एनडीए शासित राज्यों की हो, तब बिहार को लंबे समय तक इस प्रश्न से अलग रखना आसान नहीं होगा। अब देखना यह है कि बिहार इस चुनौती का सामना किस तरीके से करता है।


किसी भी बड़े राजनीतिक वादे को पूरा करना केवल घोषणा से संभव नहीं होता है। राम मंदिर का मुद्दा दशकों तक राजनीतिक विमर्श में रहा। अनुच्छेद 370 पर वर्षों तक बहस हुई। उसी तरह UCC की राह भी लंबी हो सकती है। कानून बनाना एक चरण है। उसकी संवैधानिक मजबूती दूसरा चरण है। सामाजिक स्वीकार्यता तीसरा चरण है और प्रभावी क्रियान्वयन चौथा चरण। यदि भाजपा सचमुच अपने घोषित लक्ष्य के अनुसार सभी एनडीए शासित राज्यों में UCC लागू करना चाहती है, तो उसे इन सभी स्तरों पर तैयारी करनी होगी।


बिहार भारतीय राजनीति में अक्सर राष्ट्रीय राजनीति की प्रयोगशाला रहा है। यहां सामाजिक न्याय की राजनीति ने नई दिशा दी है। गठबंधन राजनीति ने कई बार राष्ट्रीय समीकरण बदले हैं। जातीय राजनीति ने देश की चुनावी रणनीतियों को प्रभावित किया है। अब यदि UCC बिहार में आता है तो इसका प्रभाव केवल बिहार तक सीमित नहीं रहेगा। यह देश के दूसरे राज्यों के लिए भी राजनीतिक संदेश होगा। यदि बिहार जैसा जटिल सामाजिक और राजनीतिक राज्य UCC को लागू करने की दिशा में सफलतापूर्वक आगे बढ़ता है तो भाजपा के राष्ट्रीय एजेंडे को नई ताकत मिल सकती है। लेकिन यदि गठबंधन की राजनीति, सामाजिक विरोध या राजनीतिक मतभेद इसके रास्ते में बाधा बनते हैं तो यह भी भाजपा के लिए एक महत्वपूर्ण राजनीतिक सबक होगा।


राजनीति में भविष्य की भविष्यवाणी करना आसान है, लेकिन उसे सही साबित करना कठिन। आज बिहार की राजनीति जिस मोड़ पर खड़ी है, वहां कई सवाल हैं और उनके उत्तर अभी भविष्य के गर्भ में हैं। क्या भाजपा अपने चौथे बड़े वैचारिक स्तंभ “समान नागरिक संहिता” को भी स्थापित कर पाएगी? क्या अमित शाह का शंखनाद आने वाले दिनों में बिहार की विधानसभा और सरकार की कार्यवाही में सुनाई देगा? क्या सम्राट चौधरी राष्ट्रीय नेतृत्व की अपेक्षाओं और बिहार की गठबंधन राजनीति के बीच रास्ता निकाल पाएंगे? क्या जदयू इस मुद्दे पर भाजपा के साथ पूरी तरह खड़ा होगा? और सबसे महत्वपूर्ण यह है कि क्या बिहार में UCC को लेकर व्यापक सामाजिक सहमति बनाई जा सकेगी? इन प्रश्नों के उत्तर आज किसी के पास निश्चित रूप से नहीं हैं। लेकिन इतना जरूर है कि राजनीति में जब कोई बड़ा नेता किसी संकल्प को सार्वजनिक रूप से दोहराता है, तो उसके बाद राजनीतिक घड़ी की सुइयां तेज हो जाती हैं।


सम्राट चौधरी के लिए आने वाला समय केवल मुख्यमंत्री के रूप में प्रशासन चलाने की परीक्षा नहीं है। यह उनके राजनीतिक नेतृत्व की परीक्षा है। एक ओर भाजपा का वैचारिक एजेंडा है, दूसरी ओर गठबंधन की वास्तविकता। एक ओर पार्टी के कार्यकर्ताओं और समर्थकों की अपेक्षाएं हैं, दूसरी ओर बिहार का जटिल सामाजिक समीकरण। एक ओर राष्ट्रीय नेतृत्व का आदेश है, दूसरी ओर राज्य की राजनीतिक जमीन। यही कारण है कि आने वाले दिनों में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी का हर कदम राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होगा। उन्हें तय करना होगा कि कुएं में उतरना है, खाई से बचना है या फिर ऐसा पुल बनाना है जो दोनों के बीच से सुरक्षित रास्ता निकाल दे।


इतिहास किसी नेता को केवल उसके भाषणों से नहीं, बल्कि उसके निर्णयों से याद रखता है। भाजपा ने जिन मुद्दों को लंबे समय तक अपने राजनीतिक संकल्प के रूप में प्रस्तुत किया है, उनमें से कई पर उसने निर्णायक कदम उठाए हैं। अब समान नागरिक संहिता का प्रश्न उसके सामने है। यदि अमित शाह का यह संकल्प आने वाले समय में वास्तविक नीति और कानून में बदलता है तो यह भाजपा के राजनीतिक इतिहास का एक और महत्वपूर्ण अध्याय होगा और यदि इस अध्याय की शुरुआत बिहार से होती है, तो इसका सबसे बड़ा राजनीतिक किरदार मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी होंगे। फिलहाल बिहार की राजनीति सांस रोके खड़ी है।


अब देखना केवल यह है कि उसकी गूंज पटना तक कब पहुंचती है और पहुंचने के बाद सत्ता के गलियारों में क्या फैसला होता है। भविष्य के पन्नों पर क्या लिखा है, यह तो काल के गाल में छिपा है। लेकिन इतना तय है कि UCC की राह में बिहार की परीक्षा हुई तो यह परीक्षा केवल एक कानून की नहीं होगी बल्कि यह भाजपा की विचारधारा, एनडीए के गठबंधन धर्म और सम्राट चौधरी के नेतृत्व, तीनों की अग्निपरीक्षा होगी।


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